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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

४३० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २

४३०बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २
भोक्तृत्व उपरतकरणत्वं सम्बोधनाग्रहणं वा युक्तम् ।माननेपर उनमें उपरतकरणत्व और सम्बोधनके अग्रहणकी उपपत्ति नहीं हो सकती ।
अप्रसिद्धनामभिः सम्बोधनमयुक्तमिति चेत्—सन्ति हि प्राणविषयाणि प्रसिद्धानि प्राणादिनामानि, तान्यपोह्य अप्रसिद्धैर्बृहत्त्वादिनामभिः सम्बोधनमयुक्तम्, लौकिकन्यायापोहात् । तस्माद्भोक्तुरेव सतः प्राणस्याप्रतिपत्तिरिति चेत् ?पूर्व०—किंतु अप्रसिद्ध नामोंसे सम्बोधन करना तो उचित नहीं है। प्राणसम्बन्धी प्राण आदि प्रसिद्ध नाम भी हैं ही; उन्हें छोड़कर बृहत्त्वादि अप्रसिद्ध नामोंसे पुकारना तो उचित नहीं है, क्योंकि इससे लौकिक न्याय भी भंग होता है। इसीसे भोक्ता होनेपर भी प्राणको उसकी अप्रतिपत्ति हुई—ऐसा कहें तो ?
न देवताप्रत्याख्यानार्थत्वात् । केवलसम्बोधनमात्राप्रतिपत्त्यैव असुप्तस्याध्यात्मिकस्य प्राणस्याभोक्तृत्वे सिद्धे यच्चन्द्रदेवताविषयैर्नामभिःसम्बोधनम्, तच्चन्द्रदेवता प्राणोऽस्मिञ्शरीरे भोक्तेति गार्ग्यस्य विशेषप्रतिपत्तिनिराकरणार्थम् । न हि तल्लौकिकनाम्ना सम्बोधने शक्यं कर्तुम् । प्राणप्रत्याख्याने-सिद्धान्ती—ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि वह सम्बोधन देवताका प्रत्याख्यान (निषेध) करनेके लिये था। केवल सम्बोधनमात्रकी अप्रतिपत्तिसे ही असुप्त आध्यात्मिक प्राणका अभोक्तृत्व सिद्ध हो सकनेपर भी जो उसे चन्द्रदेवतासम्बन्धी नामोंसे सम्बोधन किया गया है, वह गार्ग्यकी इस विशेष प्रतिपत्तिका निराकरण करनेके लिये है कि इस शरीरमें चन्द्रदेवता ही भोक्ता प्राण है। यह निराकरण [प्राणादि] लौकिक नाम-से सम्बोधन करनेपर नहीं किया जा सकता था। प्राणके प्रत्याख्यानसे