सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

१०७२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४

१०७२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४

| न केवलं मया लब्धः किं त्वनुवित्तो मयैव; अनुवेदनं नाम विद्यायाः परिपाकापेक्षया फलावसानतानिष्ठाप्राप्तिः, भुजेरिव तृप्त्यवसानता; पूर्वं तु ज्ञानप्राप्तिसंबन्धमात्रमेवेति विशेषः । | मैंने इसे केवल प्राप्त ही नहीं किया है अपि तु मैंने ही इसका अनुवेदन भी किया है। विद्याके परिपाककी अपेक्षासे जो उसकी फलपर्यन्त स्थितिकी प्राप्ति है, उसे अनुवेदन कहते हैं, जैसे भोजनका पर्यवसान तृप्तिमें होनेवाला है। 'मां स्पृष्टः' इस पूर्ववाक्यमें तो केवल ज्ञानप्राप्तिका सम्बन्धमात्र ही बतलाया गया है—इतना उससे इसका अन्तर है। |
| किम् असावेव मन्त्रदृगेको ब्रह्मविद्याफलं प्राप्तः, नान्यः प्राप्तवान्, येन 'अनुवित्तो मयैव' इत्यवधारयति ? | शङ्का—क्या अकेले इस मन्त्र-द्रष्टाने ही ब्रह्मविद्याका फल प्राप्त किया है, किसी दूसरेने प्राप्त नहीं किया, जिससे कि वह 'मेरेद्वारा ही अनुवित्त है' ऐसा निश्चय करता है। |
| नैष दोषः, अस्याः फलम् आत्मसाक्षिकमनुत्तममिति ब्रह्मविद्यायाः स्तुतिपरत्वात्; एवं हि कृतार्थात्माभिमानकरम् आत्मप्रत्ययसाक्षिकमात्मज्ञानम्, किमतः परमन्यत् स्यात्—इति ब्रह्मविद्यां स्तौति । न तु पुनरन्यो ब्रह्मवित् तत्फलं न प्राप्नोतीति, "तद्यो यो देवानाम्" (बृ० उ० १ । ४ । १०) इति सर्वार्थश्रुतेः । | समाधान—यह कोई दोष नहीं है; क्योंकि यह वाक्य 'इस विद्याका अनुत्तम फल आत्मसाक्षिक है' इस प्रकार ब्रह्मविद्याकी स्तुति करनेवाला है। इस प्रकार आत्मज्ञान 'मैं कृतार्थ हूँ' ऐसा आत्माभिमान करनेवाला और स्वानुभवसिद्ध है, इससे बढ़कर और क्या हो सकता है?—इस प्रकार श्रुति ब्रह्मविद्याकी स्तुति करती है। कोई अन्य ब्रह्मवेत्ता इस फलको प्राप्त नहीं करता--ऐसी बात नहीं है; क्योंकि "देवताओंमेंसे जिस-जिसने उसे जाना" ऐसी सबके कृतार्थत्वका प्रतिपादन करनेवाली श्रुति है। |