सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

४०८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २

४०८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २

| सर्वमेतदहं जाने यद्ब्रवीषि । कथम्? अतिष्ठाः—अतीत्य भूतानि तिष्ठतीत्यतिष्ठाः । सर्वेषां च भूतानां मूर्धा शिरो राजेति वै— राजा दीप्तिगुणोपेतत्वात्, एतैर्विशेषणैर्विशिष्टमेतद्ब्रह्म अस्मिन्कार्यकरणसङ्घाते कर्तृ भोक्तृ चेत्यहमेतमुपास इति । फलमप्येवं विशिष्टोपासकस्य—स य एतमेवमुपास्तेऽतिष्ठाः सर्वेषां भूतानां मूर्धा राजा भवति । यथागुणोपासनमेव हि फलम्; "तं यथा यथोपासते तदेव भवति" (मण्डल-ब्राह्मण) इति श्रुतेः ॥ २ ॥ | तुम जो कुछ कह रहे हो यह सभी मैं जानता हूँ। किस प्रकार?—यह अतिष्ठा है, अर्थात् समस्त भूतोंका अतिक्रमण करके स्थित है, इसलिये 'अतिष्ठा' कहा गया है। समस्त भूतोंका मस्तक है और दीप्ति-गुणयुक्त होनेके कारण राजा है—इन विशेषणोंसे विशिष्ट इस ब्रह्मकी, जो देहेन्द्रियसंग्‍हातमें कर्ता और भोक्ता है, मैं उपासना करता हूँ। इस प्रकारके विशेषणोंसे विशिष्ट ब्रह्मकी उपासना करनेवालेको फल भी ऐसा ही मिलता है—जो इसकी इस प्रकार उपासना करता है, वह सबका अतिक्रमण करके स्थित समस्त भूतोंका मस्तक और राजा होता है। जैसे गुणवालेकी उपासना की जाती है, वैसा ही फल होता है; जैसा कि, "उसकी जो जिस प्रकार उपासना करता है, तद्रूप ही हो जाता है" इस श्रुतिसे सिद्ध होता है ॥ २ ॥ |

गार्ग्यद्वारा चन्द्रान्तर्गत ब्रह्मका प्रतिपादन तथा अजातशत्रुद्वारा उसका प्रत्याख्यान

| संवादेनादित्यब्रह्मणि प्रत्याख्यातेऽजातशत्रुणा चन्द्रमसि ब्रह्मान्तरं प्रतिपेदे गार्ग्यः । | संवादके द्वारा जब अजातशत्रुने आदित्यब्रह्मका निषेध कर दिया तो गार्ग्यने चन्द्रान्तर्गत दूसरे ब्रह्मका प्रतिपादन किया । |