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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

१८२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १

१८२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १

इदँ् सर्वमन्नं चैवान्नादश्च सोम एवान्नमनिरन्नादः
सैषा ब्रह्मणोऽतिसृष्टिः । यच्छ्रेयसो देवानसृजताथ
यन्मर्त्यः सन्नमृतानसृजत तस्मादतिसृष्टिरतिसृष्ट्यां
हास्यैतस्यां भवति य एवं वेद ॥ ६ ॥

फिर उसने इस प्रकार मन्थन किया। उसने मुखरूपी योनिसे दोनों हाथोंद्वारा [ मन्थन करके ] अग्निको रचा। इसलिये ये दोनों भीतरकी ओरसे लोमरहित हैं, क्योंकि योनि भी भीतरसे लोमरहित ही होती है। अतः [ याज्ञिक लोग अग्नि, इन्द्र आदिको ] एक-एक (भिन्न-भिन्न) देवता मानते हुए जो ऐसा कहते हैं कि 'इस ( अग्नि ) का यजन करो, इस ( इन्द्र ) का यजन करो' सो वह तो इस एक ही देवकी विसृष्टि है। यह [ प्रजापति ] ही सर्वदेवरूप है। इसके बाद जो कुछ यह गीला है उसे उसने वीर्यसे उत्पन्न किया, वही सोम है। इतना ही यह सब अन्न और अन्नाद है। सोम ही अन्न है और अग्नि ही अन्नाद है। यह ब्रह्माकी अतिसृष्टि है कि उसने अपनेसे उत्कृष्ट देवताओंकी रचना की—स्वयं मर्त्य होनेपर भी अमृर्तोंको उत्पन्न किया। इसलिये यह अतिसृष्टि है। जो इस प्रकार जानता है वह इसकी इस अतिसृष्टिमें ही हो जाता है ॥ ६ ॥

संस्कृत भाष्यहिन्दी अनुवाद
एवं स प्रजापतिर्जगदिदं मिथुनात्मकं सृष्ट्वा ब्राह्मणादिवर्णनियन्त्रीर्देवताः सिसृक्षुरादौ, अथेति शब्दद्वयमभिनयप्रदर्शनार्थम्, अनेन प्रकारेण मुखे हस्तौ प्रक्षिप्याभ्यमन्थदभिमुख्येन मन्थनमकरोत् । स मुखहस्ताभ्यां मथित्वा मुखाच्च योनेर्हस्ताभ्यांइस प्रकार उस प्रजापतिने इस मिथुनात्मक जगत्की रचना कर ब्राह्मणादि वर्णोंका नियन्त्रण करनेवाली देवताओंकी रचना करनेकी इच्छासे पहले—यहाँ 'अथ' और 'इति' ये दो शब्द अभिनय प्रदर्शित करनेके लिये हैं—इस प्रकारसे मुखमें हाथ डालकर 'अभ्यमन्थत्'—अभिमुखतासे मन्थन किया। उसने मुखको हाथोंसे मथकर मुखरूप योनिसे हाथरूप योनियोंके द्वारा