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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
४२४ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय २
पृष्ठ 430स्थायी लिंक
४२४ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय २
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| ष्विव राजा संनिहित एव । किं तु भृत्यस्वामिनोर्गार्ग्याजातशत्र्वभिप्रेतयोर्विवेकावधारणकारणं तत्सङ्कीर्णत्वादनवधारितविशेषम् । यद्द्रष्टृत्वमेव भोक्तुर्न दृश्यत्वम्, यच्चाभोक्तुर्द्दश्यत्वमेव न तु द्रष्टृत्वम्, तच्चोभयमिह सङ्कीर्णत्वाद्विविच्य दर्शयितुमशक्यमिति सुप्तपुरुषगमनम् । | सन्निहित ही है। किंतु गार्ग्यके माने हुए भृत्यस्थानीय ब्रह्म और अजातशत्रुके अभिमत स्वामिस्थानीय ब्रह्मके पार्थक्यनिश्चयका जो कारण है, वह संकीर्ण (मिला हुआ) है, इसलिये उनके भेदका निश्चय नहीं होता। भोक्तामें द्रष्टृत्व (साक्षित्व) ही है; दृश्यत्व नहीं है, इस प्रकारके विवेक-निश्चयका जो कारण है तथा अभोक्तामें दृश्यत्व ही है, द्रष्टृत्व नहीं है—ऐसे विवेकके निश्चयका जो कारण है, वे दोनों ही यहाँ जागरित अवस्थामें मिले होनेके कारण अलग-अलग करके नहीं दिखाये जा सकते; इसीसे उन दोनोंको सोये हुए पुरुषके पास जाना पड़ा। |
| [प्राणस्य भोक्तृत्वाभोक्तृत्वविवेचनम्]<br><br>ननु सुप्तेऽपि पुरुषे विशिष्टैर्नामभिरामन्त्रितो भोक्तैव प्रतिपत्स्यते नाभोक्तेति नैष निर्णयः स्यादिति । | पूर्व०—किंतु सुषुप्त पुरुषमें भी विशिष्ट नामोंसे पुकारे जानेपर [चेतन] भोक्ता ही समझेगा, [अचेतन] अभोक्ता नहीं। इसलिये तब भी निर्णय नहीं होगा। |
| न, निर्धारितविशेषत्वाद्गार्ग्याभिप्रेतस्य; यो हि सत्येनच्छन्नः प्राण आत्मामृतो वागादिष्वनस्तमितो निम्लोचत्सु, यस्यापः | सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है; क्योंकि गार्ग्यके अभिमत ब्रह्मका विशेषरूप निश्चित कर दिया गया है। जो सत्यसे आच्छादित प्राण आत्मा अर्थात् अमृत वागादिके अस्त हो जानेपर भी अस्त नहीं होता, जिसका जल |