सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

८८६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४

८८६बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ४
संस्कृतहिन्दी
स्मरद् रूपं पश्यति तदेवानिमीलितेऽपि चक्षुषि द्रष्टृ आसीदित्यवगम्यते।हैं, जो नेत्रोंके मूँदनेपर स्मरण किये जानेवाले रूपको देखता है, वही नेत्रोंके न मूँदनेपर भी द्रष्टा था—ऐसा जाना जाता है।
मृते च देहेऽविकलस्यैव च रूपादिदर्शनाभावात्—देहस्यैव द्रष्टृत्वे मृतेऽपि दर्शनादिक्रिया स्यात्। तस्माद् यदपाये देहे दर्शनं न भवति, यद्भावे च भवति, तद् दर्शनादिक्रियाकर्तृ न देह इत्यवगम्यते।इसके सिवा शरीरके मर जानेपर उसमें कोई विकार न होनेपर भी वह रूपाधिका दर्शन नहीं करता—यदि देह ही द्रष्टा होता तो उसके मरनेपर भी उसमें दर्शनादि क्रिया होती। अतः जिसके देहमें न रहनेपर दर्शन नहीं होता और रहनेपर होता है, वही दर्शनादि क्रियाका कर्ता है, देह नहीं—ऐसा ज्ञात होता है।
चक्षुरादीन्येव दर्शनादिक्रियाकर्तॄणीति चेन्न, यदहमद्राक्षं तत् स्पृशामीति भिन्नकर्तृकत्वे प्रतिसंधानानुपपत्तेः मनस्तर्हीति चेन्न, मनसोऽपि विषयत्वाद् रूपाविवद् द्रष्टृत्वाद्यनुपपत्तिः।यदि कहो कि नेत्रादि इन्द्रियां ही दर्शनादि क्रिया करनेवाली हैं, तो ऐसी बात नहीं है, क्योंकि [वैसी स्थितिमें] दर्शन और स्पर्श भिन्न कर्ताओंकी क्रिया होनेके कारण 'जिसे मैंने देखा था, उसका स्पर्श करता हूँ' ऐसा अनुभव नहीं हो सकता था; अच्छा तो, मन ही द्रष्टा है—ऐसा मानें तो यह भी ठीक नहीं, क्योंकि रूप आदिकी भांति विषय (दृश्य) होनेके कारण मनका भी द्रष्टा होना सम्भव नहीं है।
तस्मादन्तःस्थं व्यतिरिक्तमादित्यादिवदिति सिद्धम्।अतः यह सिद्ध हुआ कि चैतन्य-ज्योति अन्तःस्थ है और आदित्यादिके समान शरीरसे भिन्न है।