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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

४९० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २

४९०बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय २
संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
अविद्याप्रत्युपस्थापितस्य क्रियाकारकफलस्याश्रयणेन इष्टानिष्टप्राप्तिपरिहारोपायसामान्ये प्रवृत्तस्य तद्विशेषमजानतः तदाचक्षाणा श्रुतिः क्रियाकारकफलभेदस्य लोकप्रसिद्धस्य सत्यतामसत्यतां वा नाचष्टे न च वारयति, इष्टानिष्टफलप्राप्तिपरिहारोपायविधिपरत्वात् । <br><br> यथा काम्येषु प्रवृत्ता श्रुतिः कामानां मिथ्याज्ञानप्रभवत्वे सत्यपि यथाप्राप्तानेव कामानुपादाय तत्साधनान्येव विधत्ते, न तु कामानां मिथ्याज्ञानप्रभवत्वादन्‌अर्थरूपत्वं चेति न विदधाति । तथा नित्याग्निहोत्रादिशास्त्रमपि मिथ्याज्ञानप्रभवं क्रियाकारकभेदं यथाप्राप्तमेवादाय इष्टविशेषप्राप्तिमनिष्टविशेषपरिहारं वा किमपि प्रयोजनं पश्यदग्निहोत्रादीनि कर्माणि विधत्ते । नाविद्यागोच-अविद्याद्वारा प्रस्तुत किये हुए यथाप्राप्त क्रिया, कारक और फलका आश्रय करके इष्टप्राप्ति और अनिष्टनिवृत्तिके सामान्य उपायमें प्रवृत्त है तथा उसका विशेष उपाय नहीं जानता, उसे वह (विशेष उपाय) बतलानेवाली श्रुति लोकप्रसिद्ध क्रिया, कारक और फलभेदकी सत्यता एवं असत्यताका न तो प्रतिपादन ही करती है और न निषेध ही; क्योंकि वह तो इष्टप्राप्ति और अनिष्टनिवृत्तिके उपायका विधान करनेमें ही तत्पर है। <br><br> जिस प्रकार काम्यकर्मोंमें प्रवृत्त हुई श्रुति कामनाओंके मिथ्याज्ञानजनित होनेपर भी यथाप्राप्त कामनाओंको ही लेकर उनके साधनोंका ही विधान करती है, किंतु 'कामनाएँ मिथ्याज्ञानजनित होनेके कारण अनर्थरूप नहीं हैं' ऐसा विधान नहीं करती । इसी प्रकार अग्निहोत्रादि नित्यकर्मोंका निरूपण करनेवाला शास्त्र भी मिथ्याज्ञानजनित यथाप्राप्त क्रिया, कारक और फलरूप भेदको ही लेकर इष्टविशेषकी प्राप्ति और अनिष्टविशेषके परिहाररूप किसी प्रयोजनको देखकर अग्निहोत्रादि कर्मोंका विधान करता है। इस प्रयोजनका अविद्याविषयक