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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

५८८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २

५८८बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय २

अयं चन्द्रः सर्वेषां भूतानां मध्वस्य चन्द्रस्य सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिँश्चन्द्रे तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं मानसस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदँ सर्वम् ॥ ७ ॥

यह चन्द्रमा समस्त भूतोंका मधु है और समस्त भूत इस चन्द्रमाके मधु हैं। यह जो इस चन्द्रमामें तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह अध्यात्म मनःसम्बन्धी तेजोमय अमृतमय पुरुष है यही वह है जो कि 'यह आत्मा है' [ इस वाक्यसे बतलाया गया है ]। यह अमृत है, यह ब्रह्म है, यह सर्व है ॥ ७ ॥

तथा चन्द्रः । अध्यात्मं मानसः ॥ ७ ॥इसी प्रकार चन्द्रमा मधु है। यहाँ अध्यात्म मानस पुरुष है ॥ ७ ॥

इयं विद्युत्सर्वेषां भूतानां मध्वस्यै विद्युतंः सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्यां विद्युति तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं तैजसस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदँ सर्वम् ॥ ८ ॥

यह विद्युत् समस्त भूतोंका मधु है और समस्त भूत इस विद्युत्‌के मधु हैं। यह जो इस विद्युत्‌में तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह अध्यात्म तैजस तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो कि 'यह आत्मा है' [ इस वाक्यसे बतलाया गया है ] यह अमृत है, यह ब्रह्म है, यह सर्व है ॥ ८ ॥

तथा विद्युत् । त्वक्तेजसि भवस्तैजसोऽध्यात्मम् ॥ ८ ॥इसी प्रकार विद्युत् मधु है। त्वचाके तेजमें रहनेवाला तैजस पुरुष अध्यात्म है ॥ ८ ॥