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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

७३२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३

७३२बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ३

| सर्वस्मात्साधनफलस्वरूपादेषणा- | जानकर एषणालक्षण साधन और |
| लक्षणाद् व्युत्थाय भिक्षाचर्यं | फलस्वरूप समस्त विषयोंसे ऊपर |
| चरन्ति स्म, दृष्टादृष्टार्थं कर्म | उठकर अर्थात् दृष्ट और अदृष्ट फल- |
| तत्साधनं च हित्वा, तस्माद् | वाले सम्पूर्ण कर्म और उसके |
| अद्यत्वेऽपि ब्राह्मणो ब्रह्मवित् | साधनको छोड़कर भिक्षाचर्या |
| पाण्डित्यं पण्डितभावम्, एतदा- | करते थे, इसलिये इस समय भी |
| त्मविज्ञानं पाण्डित्यम्, निर्विद्य | ब्राह्मण यानी ब्रह्मवेत्ता पाण्डित्य— |
| निःशेषं विदित्वा आत्मविज्ञानं | पण्डितभावको—यह आत्मज्ञान ही |
| निरवशेषं कृत्वेत्यर्थः— | पाण्डित्य है, इसे निर्विद्य—निःशेष- |
| आचार्यत आगमतश्च, एषणाभ्यो | तया जानकर अर्थात् आचार्य और |
| व्युत्थाय—एषणाव्युत्थानाव- | शास्त्रसे पूर्णतया आत्मज्ञान सम्पा- |
| सानमेव हि तत् पाण्डित्यम् | दन करके एषणाओंसे व्युत्थान कर, |
| एषणातिरस्कारोद्भवत्वादेषणावि- | क्योंकि उस पाण्डित्यका पर्यवसान |
| रुद्धत्वात्; एषणामतिरस्कृत्य न | एषणाओंसे व्युत्थान करनेमें ही है, |
| ह्यात्मविषयस्य पाण्डित्यस्योद्भव | कारण, वह एषणाओंके तिरस्कारसे |
| इत्यात्मज्ञानेनैव विहितमेषणा- | ही उत्पन्न होता है और एषणाओं- |
| व्युत्थानम् आत्मज्ञानसमान- | से विरुद्ध भी है, एषणाओंका |
| कर्तृकत्वाप्रत्ययोपादानलिङ्ग- | तिरस्कार किये बिना तो आत्म- |
| श्रुत्या दृढीकृतम्। तस्मादेष- | विषयक पाण्डित्यका उदय ही नहीं |
| णाभ्यो व्युत्थाय ज्ञानबलभावेन | हो सकता; अतः आत्मज्ञानद्वारा |
| बाल्येन तिष्ठासेत् स्थातुमिच्छेत्। | ही एषणाओंसे व्युत्थान सम्पादित |
| | होता है; आत्मज्ञान और व्युत्थान- |
| | का एक ही कर्ता है—यह सूचित |
| | करनेके लिये 'व्युत्थाय' इस पदमें |
| | 'क्त्वा' प्रत्ययका प्रयोग किया गया |
| | है, इसलिये इस लिङ्गभूता श्रुतिने |
| | उक्त अभिप्रायको और भी पुष्ट कर |
| | दिया है। अतः एषणाओंसे उत्थान |
| | कर बाल्यसे—ज्ञानबलभावसे |
| | 'तिष्ठासेत्'—स्थित रहनेकी इच्छा |
| | करे। |