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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

२७६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १

२७६बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

| (मु० उ० २।२।८)। “तत्र को मोहः” (ईशा० ७) इत्यादि श्रुतिभ्यश्च। | टूट जाती है,” “उस अवस्था में क्या मोह है” इत्यादि श्रुतियोंसे [ज्ञान-द्वारा अज्ञानकी निवृत्ति] सिद्ध होती है। |
| अर्थवाद इति चेत् ? | पूर्व०—वे श्रुतियाँ अर्थवाद हों तो ? |
| न, सर्वशाखोपनिषदामर्थवादत्वप्रसङ्गात्। एतावन्मात्रार्थत्वोपपत्तीणा हि सर्वशाखोपनिषदः। | सिद्धान्ती—ऐसा मत कहो, क्योंकि इस प्रकार तो समस्त शाखाओंकी उपनिषदोंके अर्थवाद होनेका प्रसंग उपस्थित होगा; क्योंकि समस्त शाखाओंकी उपनिषदोंका पर्यवसान केवल इतने ही अर्थमें है। |
| प्रत्यक्षप्रमितात्मविषयत्वादस्त्येवेति चेत् ? | पूर्व०—यदि कहें, प्रत्यक्ष प्रमाणसे ज्ञात होनेवाले आत्मासे सम्बद्ध होनेके कारण उनका अर्थवादत्व है ही, तो ? |
| न, उक्तपरिहारत्वात्। अविद्याशोकमोहभयादिदोषनिवृत्तेः प्रत्यक्षत्वादिति चोक्तः परिहारः। तस्मादाद्योऽन्त्यः सन्ततोऽसन्ततश्चेत्यचोद्यमेतत्। अविद्यादिदोषनिवृत्तिफलावसानत्वाद्धिद्यायाः। य एवाविद्यादिदोषनिवृत्तिफलकृत्प्रत्यय आद्योऽन्त्यः सन्ततोऽसन्ततो वा स एव विद्येत्यभ्युप- | सिद्धान्ती—नहीं, इसका परिहार पहले किया जा चुका है। इसके सिवा आत्मज्ञानसे अविद्या, शोक, मोह एवं भय आदि दोषोंकी निवृत्तिका प्रत्यक्ष अनुभव होनेसे भी इस शङ्काका परिहार किया जा चुका है। अतः आद्य हो, अन्त्य हो, अविच्छिन्न हो, विच्छिन्न हो, उसके विषयमें शङ्का नहीं की जा सकती, क्योंकि ज्ञान तो अविद्यादि दोषोंकी निवृत्तिरूप फलमें ही पर्यवसित होनेवाला है। जो भी प्रत्यय अविद्यादि दोषोंकी निवृत्तिरूप फल प्रदान करनेवाला हो वह आद्य, अन्त्य, अविच्छिन्न, विच्छिन्न कैसा ही हो, वही ज्ञान माना जाता है; |