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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

९२४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४

९२४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४

हीको देखता है। जिस समय यह सोता है, उस समय इस सर्ववान् लोककी मात्रा (एकदेश) को लेकर, स्वयं ही इस स्थूलशरीरको अचेत करके तथा स्वयं अपने वासनामय देहको रचकर, अपने प्रकाशसे अर्थात् अपने ज्योतिःस्वरूपसे शयन करता है; इस अवस्थामें यह पुरुष स्वयं ज्योतिःस्वरूप होता है ॥ ९ ॥

| तस्यैतस्य पुरुषस्य वै द्वे एव स्थाने भवतः, न तृतीयं चतुर्थं वा, के ते ? इदं च यत् प्रतिपन्नं वर्तमानं जन्म शरीरेन्द्रियविषयवेदनाविशिष्टं स्थानं प्रत्यक्षतोऽनुभूयमानम्, परलोक एव स्थानं परलोकस्थानम्—तच्च शरीरादिवियोगोत्तरकालानुभाव्यम्। | उस इस पुरुषके निश्चय दो ही स्थान होते हैं; न तो तीसरा होता है और न चौथा ही। वे कौन-से हैं ? यह जो प्राप्त वर्तमान जन्म है, अर्थात् जो शरीर, इन्द्रिय, विषय और वेदनायुक्त प्रत्यक्षतया अनुभव होनेवाला स्थान है तथा परलोक-स्थान—जिसमें परलोक ही स्थान है; वह शरीरादिके वियोगके पश्चात् अनुभव होनेवाला है। |
| ननु स्वप्नोऽपि परलोकः, तथा च सति द्वे एवेत्यवधारणमयुक्तम्। | शङ्का—किंतु स्वप्न भी तो परलोक है और यदि ऐसी बात है तो दो ही इस प्रकार निश्चय करना उचित नहीं है। |
| न, कथं तर्हि ? संध्यं तत्—इहलोकपरलोकयोर्यः संधिस्तस्मिन् भवं संध्यं यत् तृतीयं तत् स्वप्नस्थानम्, तेन स्थानद्वित्वावधारणम्, न हि ग्रामयोः संधिस्तावेव ग्रामावपेक्ष्य तृतीयत्वपरिगणनमर्हति। | समाधान—ऐसी बात नहीं है, तो फिर कैसी बात है ? वह संध्य है—इहलोक और परलोककी जो संधि है, उसमें रहनेवाला जो तीसरा संध्यस्थान है, वह स्वप्नस्थान है। इसीसे स्थानोंके दो होनेका निश्चय किया गया है; क्योंकि दो ग्रामोंकी संधि उन ग्रामोंकी अपेक्षा तृतीयरूपसे गिनने योग्य नहीं मानी जाती। |