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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

१४६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १

१४६बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

| इत्युच्यते—समः प्लुषिणा पुत्तिकाशरीरेण, समो मशकेन मशकशरीरेण, समो नागेन हस्तिशरीरेण, सम एभिस्त्रिभिर्लोकैस्त्रैलोक्यशरीरेण प्राजापत्येन, समोऽनेन जगद्रूपेण हैरण्यगर्भेण। पुत्तिकादिशरीरेषु गोत्वादिवत्कार्त्स्न्येन परिसमाप्त इति समत्वं प्राणस्य; न पुनः शरीरमात्रपरिमाणेनेव, अमूर्तत्वात्सर्वगतत्वाच्च। न च घटप्रासादादिप्रदीपवत्संकोचविकासितया शरीरेषु तावन्मात्रं समत्वम्। “त एते सर्व एव समाः सर्वेऽनन्ताः” (बृह०उ० १।५।१३) इति श्रुतेः। सर्वगतस्य तु शरीरपरिमाणवृत्तिलाभो न विरुध्यते। | अब बतलाया जाता है--[ यह प्राण ] प्लुषि--पुत्तिका (छोटी मक्खी) के शरीरके समान है, मशक अर्थात् मच्छरके शरीरके समान है, नाग--हाथीके शरीरके समान है, इन तीनों लोकों अर्थात् त्रिलोकीरूप प्रजापतिके शरीरके समान है तथा इस जगद्रूप हिरण्यगर्भके शरीरके समान है। जिस प्रकार गोशरीरमें गोत्वकी पूर्णतया व्याप्ति होती है उसी प्रकार यह पुत्तिकादि शरीरोंमें पूर्णतया व्याप्त है--इसलिये ही प्राण उनके समान है, शरीरमात्रके बराबर होनेके कारण ही नहीं; क्योंकि यह अमूर्त्त और सर्वगत है। घट और महल आदिके दीपकके समान संकुचित और विकसित होनेवाला होनेसे शरीरोंमें उन्हींके बराबर रहनेसे इसका समत्व नहीं है; जैसा कि “वे ये सभी समान हैं और सभी अनन्त हैं” इस श्रुतिसे सिद्ध होता है। सर्वगत प्राणका शरीरके परिमाणानुसार वृत्ति लाभ करनेमें कोई विरोध नहीं है। |
| एवं समत्वात्सामाख्यं प्राणं वेद यः श्रुतिप्रकाशितमहत्त्वं तस्यै- | इस प्रकार सम होनेके कारण सामसंज्ञक प्राणको, जिसका महत्त्व श्रुतिने प्रकाशित किया है, जो पुरुष |