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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

१२२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १

१२२बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

| ननु परिहृतमेतद्वागादीनां कल्याणवदनाद्यासङ्गवत्प्राणस्य आसङ्गास्पदत्वाभावेन । | सिद्धान्ती—किंतु वागादिके शुभभाषणादिविषयक अभिनिवेशके समान प्राणमें किसी प्रकारकी अभिनिवेशास्पदता नहीं है - ऐसा बतलाकर हम इस शङ्काका परिहार कर चुके हैं। |
| बाढम्, किं त्वाङ्गिरसत्वेन वागादीनामात्मत्वोक्त्या वागादिद्वारेण शवस्पृष्टितत्स्पृष्टेरिवाशुद्धता शङ्क्यते—इत्याह—शुद्ध एव प्राणः। कुतः ? | पूर्व०—ठीक है, किंतु जिस प्रकार शवका स्पर्श होनेसे उसे स्पर्श करनेवालेकी अशुद्धता मानी जाती है उसी प्रकार आङ्गिरस होनेसे वागादिका आत्मा बतलाया जानेसे वागादिके द्वारा उसकी भी अशुद्धताकी शङ्का होती है; इसपर श्रुति कहती है—प्राण शुद्ध ही है। क्यों शुद्ध है ?— |

सा वा एषा देवता दूर्नाम दूरं ह्यस्या मृत्युर्दूरं ह वा अस्मान्मृत्युर्भवति य एवं वेद ॥ ६ ॥

वह यह देवता 'दूर्' नामवाली है, क्योंकि इससे मृत्यु दूर है। जो ऐसा जानता है, उससे मृत्यु दूर रहता है ॥ ६ ॥

| सा वा एषा देवता दूर्नाम । यं प्राणं प्राप्याश्मानमिव लोष्टवद्विध्वस्ता असुरास्तं परामृशति सेति । सैवैषा येयं वर्तमानयजमानशरीरस्था देवैर्निर्धारिता “अयमास्येऽन्तः” इति । देवता च सा | वह यह देवता 'दूर्' नामवाली है। जिस प्राणको प्राप्त होकर पत्थरको प्राप्त हुए मृत्पिण्डके समान असुरगण नष्ट हो गये थे उसीका श्रुति ‘सा (वह)’ ऐसा कहकर परामर्श करती है। वह यही है जिसे कि देवोंने “यह आस्यके भीतर है” इस प्रकार वर्तमान यजमानके शरीरमें स्थित निश्चय किया है। |