बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
८१८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३
| ८१८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३ |
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एतान्यष्टावायतनान्यष्टौ लोका अष्टौ देवा अष्टौ पुरुषाः स यस्तान् पुरुषान्निरुह्य प्रत्युह्यात्यक्रामत्तं त्वौपनिषदं पुरुषं पृच्छामि तं चेन्मे न विवक्ष्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति । तꣳह न मेने शाकल्यस्तस्य ह मूर्धा विपपातापि हास्य परिमोषिणोऽस्थीन्यप जहुरन्यन्मन्यमानाः ॥ २६ ॥
'तुम (शरीर) और आत्मा (हृदय) किसमें प्रतिष्ठित हो।' [याज्ञवल्क्य—] 'प्राणमें।' [शाकल्य—] 'प्राण किसमें प्रतिष्ठित है?' 'अपानमें।' 'अपान किसमें प्रतिष्ठित है?' 'व्यानमें।' 'व्यान किसमें प्रतिष्ठित है?' 'उदानमें।' 'उदान किसमें प्रतिष्ठित है?' 'समानमें।' जिसका [मधुकाण्डमें] 'नेति-नेति' ऐसा कहकर निरूपण किया गया है, वह आत्मा अगृह्य है—वह ग्रहण नहीं किया जा सकता, अशीर्य है—वह शीर्ण (नष्ट) नहीं होता, असङ्ग है—वह संसक्त नहीं होता, असित है—वह व्यथित और हिंसित नहीं होता। ये आठ आयतन हैं, आठ लोक हैं, आठ देव हैं और आठ पुरुष हैं। वह जो उन पुरुषोंको निश्चयपूर्वक जानकर उनका अपने हृदयमें उपसंहार करके औपाधिक धर्मोंका अतिक्रमण किये हुए है, उस औपनिषद पुरुषको मैं पूछता हूँ; यदि तुम मुझे उसे स्पष्टतया न बतला सकोगे तो तुम्हारा मस्तक गिर जायगा। किंतु शाकल्य उसे नहीं जानता था, इसलिये उसका मस्तक गिर गया। यही नहीं, अपितु चोरलोग उसकी हड्डियोंको कुछ और समझकर चुरा ले गये ॥ २६ ॥
| कस्मिन्नु त्वं च शरीरमात्मा च तव हृदयं प्रतिष्ठितौ स्थ इति ? प्राण इति; देहात्मानौ प्राणे प्रतिष्ठितौ स्यातां प्राणवृत्तौ । कस्मिन्नु प्राणः प्रतिष्ठित इति अपान इति—सापि प्राणवृत्तिः | 'तुम शरीर और तुम्हारा आत्मा-हृदय किसमें प्रतिष्ठित हो?' 'प्राणमें; देह और आत्मा—ये दोनों प्राणमें—प्राणवृत्तिमें प्रतिष्ठित हैं।' 'प्राण किसमें प्रतिष्ठित है?' 'अपानमें, —क्योंकि वह प्राणवृत्ति भी यदि |
आख्यान चित्र माला
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