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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

७७० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३

७७०बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३

च्योऽन्या यां यां च दिशमन्वेतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि ददतो मनुष्याः प्रशꣳसन्ति यजमानं देवा दर्वी पितरोऽन्वायत्ताः ॥ ९ ॥

हे गार्गि ! इस अक्षरके ही प्रशासनमें सूर्य और चन्द्रमा विशेषरूपसे धारण किये हुए स्थित रहते हैं। हे गार्गि ! इस अक्षरके ही प्रशासनमें द्युलोक और पृथिवी विशेषरूपसे धारण किये हुए स्थित रहते हैं। हे गार्गि ! इस अक्षरके ही प्रशासनमें निमेष, मुहूर्त, दिन-रात, अर्धमास ( पक्ष ) मास, ऋतु और संवत्सर विशेषरूपसे धारण किये हुए स्थित रहते हैं। हे गार्गि ! इस अक्षरके ही प्रशासनमें पूर्ववाहिनी एवं अन्य नदियां श्वेत पर्वतोंसे बहती हैं तथा अन्य पश्चिमवाहिनी नदियां जिस-जिस दिशाको बहने लगती हैं, उसीका अनुसरण करती रहती हैं। हे गार्गि ! इस अक्षरके ही प्रशासनमें मनुष्य दाताकी प्रशंसा करते हैं तथा देवगण यजमानका और पितृगण दर्वीहोमका अनुवर्तन करते हैं ॥ ९ ॥

शाङ्करभाष्यम्भाषानुवाद
एतस्य वा अक्षरस्य; यदेतदधिगतमक्षरं सर्वान्तरं साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म, य आत्मा अशनायादिधर्मातीतः, एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने— यथा राज्ञः प्रशासने राज्यमस्फुटितं नियतं वर्तते, एवमेतस्याक्षरस्य प्रशासने हे गार्गि सूर्याचन्द्रमसौ, सूर्यश्च चन्द्रमाश्च सूर्याचन्द्रमसौ अहोरात्रयोर्लोकप्रदीपौ, तादर्थ्येन प्रशासित्रा ताभ्यां निर्वर्त्यमानलोकप्रयोजनविज्ञान-'एतस्य वा अक्षरस्य' इत्यादि; यह जो सर्वान्तर साक्षात् अपरोक्ष ब्रह्मरूप अक्षर जाना गया है, जो क्षुधादि धर्मोंसे रहित आत्मा है, हे गार्गि ! इस अक्षरके प्रशासनमें— जैसे कि राजाके प्रशासनमें राज्य अखण्ड और नियमितरूपसे रहता है, इसी प्रकार इस अक्षरके प्रशासनमें सूर्याचन्द्रमसौ— सूर्य और चन्द्र, जो दिन और रातके समय लोकके दीपक ही हैं और जिन्हें उनके द्वारा सिद्ध होनेवाले लोकके प्रयोजनको जाननेवाले शासनकर्ताने उस उद्देश्यकी पूर्तिका

ब्राह्मण ८ ]          शाङ्करभाष्यार्थ          ७७१


संस्कृत-भाष्यहिन्दी-भाष्यार्थ
वता निर्मितौ च, स्यातां साधारणसर्वप्राणिप्रकाशोपकारकत्वान्लौकिकप्रदीपवत् । तस्मादस्ति तद् येन विधृतावीश्वरौ स्वतन्त्रौ सन्तौ निर्मितौ तिष्ठतो नियतदेशकालनिमित्तोदयास्तमयवृद्धिक्षयाभ्यां वर्तेते; तदस्त्येवमेतयोः प्रशासित्रक्षरम्, प्रदीपकर्तृविधारयितृवत् ।लिये रचा है, साधारणतया समस्त प्राणियोंका प्रकाशरूप उपकार करनेवाले होनेसे लौकिक दीपकोंके समान धारण किये हुए स्थित हैं। अतः ये दोनों (सूर्य और चन्द्र) स्वतन्त्र ईश्वर होनेपर भी जिसके द्वारा निर्मित और विधृत होकर नियत देश, काल और [प्राणियोंके अदृष्टरूप] निमित्तसे उदय-अस्त एवं वृद्धि-क्षयको प्राप्त होते हुए विद्यमान रहते हैं, वह अक्षर है तथा इस प्रकार वह अक्षर दीपकके कर्ता और विधारयिताके समान इन दोनोंका प्रशासनकर्ता है।
एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि द्यावापृथिव्यौ द्यौश्च पृथिवी च सावयवत्वात् स्फुटनस्वभावे अपि सत्यौ गुरुत्वात् पतनस्वभावे संयुक्तत्वाद् वियोगस्वभावे चेतनावदभिमानिदेवताधिष्ठितत्वात् स्वतन्त्रे अपि एतस्याक्षरस्य प्रशासने वर्तेते विधृते तिष्ठतः; एतद्ध्यक्षरं सर्वव्यवस्थासेतुः सर्वमर्यादाविधारणम्, अतो नास्याक्षरस्य प्र-**हे गार्गि ! इस अक्षरके ही प्रशासनमें 'द्यावापृथिव्यौ'—**द्युलोक और पृथिवी सावयव होनेके कारण फूटनेके स्वभाववाले, भारी होनेके कारण गिरनेके स्वभाववाले, संयुक्त होनेके कारण वियुक्त होनेके स्वभाववाले और चेतनावान् अभिमानी देवतासे अधिष्ठित होनेके कारण स्वतन्त्र होनेपर भी इस अक्षरके प्रशासनमें विधृत होकर स्थित हैं। यह अक्षर ही समस्त व्यवस्थाओंका सेतु—समस्त मर्यादाओंका विधारक है; अतः द्युलोक और पृथिवी इसके