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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

७५२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३

७५२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३

न वेद यस्य तमः शरीरं यस्तमोऽन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥ १३ ॥ यस्तेजसि तिष्ठꣳस्तेजोऽन्तरो यं तेजो न वेद यस्य तेजः शरीरं यस्तेजोऽन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृत इत्यधिदैवतमथाधिभूतम् ॥ १४ ॥

जो जलमें रहनेवाला जलके भीतर है, जिसे जल नहीं जानता, जल जिसका शरीर है और जो भीतर रहकर जलका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है ॥४॥ जो अग्निमें रहनेवाला अग्निके भीतर है, जिसे अग्नि नहीं जानता, अग्नि जिसका शरीर है और जो भीतर रहकर अग्निका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है ॥५॥ जो अन्तरिक्षमें रहनेवाला अन्तरिक्षके भीतर है, जिसे अन्तरिक्ष नहीं जानता, अन्तरिक्ष जिसका शरीर है और जो भीतर रहकर अन्तरिक्षका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है ॥६॥ जो वायुमें रहनेवाला वायुके भीतर है, जिसे वायु नहीं जानता, वायु जिसका शरीर है और जो भीतर रहकर वायुका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है ॥७॥ जो द्युलोकमें रहनेवाला द्युलोकके भीतर है, जिसे द्युलोक नहीं जानता, द्युलोक जिसका शरीर है और जो भीतर रहकर द्युलोकका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है ॥८॥ जो आदित्यमें रहनेवाला आदित्यके भीतर है, जिसे आदित्य नहीं जानता, आदित्य जिसका शरीर है और जो भीतर रहकर आदित्यका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है ॥९॥ जो दिशाओंमें रहनेवाला दिशाओंके भीतर है, जिसे दिशाएँ नहीं जानतीं, दिशाएँ जिसका शरीर हैं और जो भीतर रहकर दिशाओंका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है ॥१०॥ जो चन्द्रमा और ताराओंमें रहनेवाला चन्द्रमा और ताराओंके भीतर है, जिसे चन्द्रमा और ताराएँ नहीं जानतीं, चन्द्रमा और ताराएँ जिसका