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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

७३८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३ ]

७३८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३ ]


संस्कृतहिन्दी
गीतं वा—अद्भिः सर्वतोऽन्तर्बहिर्भूताभिव्याप्तमित्यर्थः; अन्यथा सक्तुमुष्टिवद् विशीर्येत।बाहर-भीतर सब ओर विद्यमान हुए जलसे ही व्याप्त है, नहीं तो यह सत्तूकी मुट्ठीके समान छिन्न-भिन्न हो जाता।
इदं तावदनुमानमुपन्यस्तम्— यत् कार्यं परिच्छिन्नं स्थूलम्, कारणेनापरिच्छिन्नेन सूक्ष्मेण व्याप्तमिति दृष्टम्—यथा पृथिवी अद्भिः; तथा पूर्वं पूर्वमुत्तरेणोत्तरेण व्यापिना भवितव्यम्, इत्येष आ सर्वान्तरादात्मनः प्रश्नार्थः।यह तो अनुमानका उपन्यास किया गया, इससे यह देखा गया कि जो कार्य, परिच्छिन्न और स्थूल तत्त्व है, वह कारण, अपरिच्छिन्न और सूक्ष्म तत्त्वसे व्याप्त रहता है—जिस प्रकार पृथिवी जलसे व्याप्त है; उसी प्रकार पूर्व-पूर्व जलादि अपने उत्तरोत्तरवर्ती कारण वायु आदिसे व्याप्त हैं; सर्वान्तर आत्मापर्यन्त इस प्रश्नका यही तात्पर्य है।
तत्र भूतानि पञ्च संहतान्येवोत्तरमुत्तरं सूक्ष्मभावेन व्यापकेन कारणरूपेण च व्यवतिष्ठन्ते; न च परमात्मनोऽर्वाक् तद्व्यतिरेकेण वस्त्वन्तरमस्ति "सत्यस्य सत्यम्" (बृ० उ० २।१।२०) इति श्रुतेः। सत्यं च भूतपञ्चकम्, सत्यस्य सत्यं च पर आत्मा।तहाँ, भूत पाँच हैं, जो परस्पर मिलकर ही उत्तरोत्तर व्यापक सूक्ष्मभावसे और कारणरूपसे विद्यमान हैं। परमात्मासे नीचे उससे भिन्न और कोई वस्तु नहीं है जैसा कि "वह सत्य-का-सत्य है" इस श्रुतिसे प्रमाणित होता है। पाँचों भूत तो सत्य हैं और परमात्मा सत्य-का-सत्य है।
कस्मिन्नु खल्वाप ओताश्च प्रोताश्चेति—तासामपि कार्यत्वात् स्थूलत्वात् परिच्छिन्नत्वाच्च क्वचिद्धि ओतप्रोतभावेन भवितव्यम्;[ अतः प्रश्न होता है कि ] जल किसमें ओत-प्रोत हैं? कार्य स्थूल और परिच्छिन्न होनेके कारण उन्हें भी किसीमें ओतप्रोतभावसे रहना चाहिये;