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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

७३० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३

७३०बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ३

| कदेशं भिक्षाचर्यं ग्राहयन्ती तत्स- | भिक्षाचर्याका ग्रहण करानेके कारण उससे सम्बद्ध अन्य एषणाओं- |
| म्बद्धमन्यदपि ग्राहयतीति चेत् ? | का भी ग्रहण कराती ही है—यदि ऐसा कहें तो ! |
| न, भिक्षाचर्यस्याप्रयोजकत्वाद् | सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि हवनके पश्चात् भोजन |
| हुत्वोत्तरकालभक्षणवत्। शेषप्रति- | करनेके समान भिक्षाचर्या किसी फलकी प्रयोजिका नहीं है, हवनके |
| पत्तिकर्मत्वादप्रयोजकं हि तत्; | पश्चात् भोजन कराना भी शेषप्रतिपत्तिकर्म होनेके कारण किसी |
| असंस्कारकत्वाच्च—भक्षणं पुरुष- | फलका प्रयोजक नहीं है; इसके सिवा संस्कार न करनेवाली होनेसे |
| संस्कारकमपि स्यात्, न तु | भी भिक्षाचर्या प्रयोजिका नहीं है, हुतशेषका भक्षण तो पुरुषके संस्कार- |
| भिक्षाचर्यम्; नियमादृष्टस्यापि | का हेतु भी होता है, किंतु भिक्षाचर्या वैसी भी नहीं है; क्योंकि नियमविधिजनित अदृष्ट भी ब्रह्म- |
| ब्रह्मविदोऽनिष्टत्वात् । | वेत्ताको अनिष्ट ही है। |
| नियमादृष्टस्यानिष्टत्वे किं | पूर्व०—यदि उसे नियमविधिजनित अदृष्ट इष्ट नहीं है तो भिक्षा- |
| भिक्षाचर्येणेति चेत् ! | चर्याका क्या प्रयोजन है?—ऐसा कहें तो ? |
| न, अन्यसाधनाद् व्युत्थानस्य | सिद्धान्ती—यह ठीक नहीं, क्योंकि अन्य साधनोंसे तो व्युत्थान करनेका विधान किया गया है। |
| विहितत्वात् । तथापि किं तेनेति | इसपर भी यदि तुम कहो कि निष्क्रिय आत्मज्ञानसे सर्वनिवृत्ति तो हो ही जायगी फिर भिक्षा- |
| चेत् ? यदि स्यात्, बाढमभ्यु- | चर्यासे क्या प्रयोजन है ? तो ठीक हे, यदि ऐसा हो जाय तो हम भी |