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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
७२० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३
पृष्ठ 730स्थायी लिंक
| ७२० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३ |
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| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
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| पठितत्वादेषणामध्ये दैवस्य वित्तस्य; हिरण्यगर्भादिदेवताविषयैव विद्या वित्तमित्युच्यते; देवलोकहेतुत्वात्; न हि निरुपाधिकप्रज्ञानघनविषया ब्रह्मविद्या देवलोकप्राप्तिहेतुः, “तस्मात्तत्सर्वमभवत्” (बृ०उ० १।४।१०) “आत्मा ह्येषां स भवति” (१।४।१०) इति श्रुतेः तद्बलेन हि व्युत्थानम्, “एतं वै तमात्मानं विदित्वा” (३।५।१) इति विशेषवचनात् । | श्रुतिद्वारा दैववित्तको एषणाके बीचमें ही पढ़ा गया है और हिरण्यगर्भादि देवताविषयिणी विद्या ही दैववित्त कही जाती है, क्योंकि वह देवलोकप्राप्तिकी हेतु है। निरुपाधिक प्रज्ञानघनविषयिणी ब्रह्मविद्या देवलोककी प्राप्तिकी हेतु नहीं है, जैसा कि “अतः वह सर्व हो गया” “वह इनका आत्मा ही हो जाता है” इत्यादि श्रुतियोंसे प्रमाणित होता है। और व्युत्थान भी ब्रह्मविद्याके ही बलसे होता है, क्योंकि इस विषयमें “उस इस आत्माको जानकर” ऐसा विशेष वाक्य है। |
| तस्मात् त्रिभ्योऽप्येतेभ्योऽनात्मलोकप्राप्तिसाधनेभ्य एषणाविषयेभ्यो व्युत्थाय—एषणा कामः “एतावान् वै कामः” (१।४।१७) इति श्रुतेः— एतस्मिंस्त्रिविधेऽनात्मलोकप्राप्तिसाधने तृष्णामकृत्वेत्यर्थः । | अतः एषणाके विषयभूत इन तीनों ही अनात्मलोकप्राप्तिके साधनोंसे व्युत्थान करके—“निश्चय इतना ही काम है” इस श्रुतिके अनुसार एषणा कामका ही नाम है—तात्पर्य यह है कि अनात्मलोककी प्राप्तिके इस त्रिविध साधनमें तृष्णा न करके [भिक्षाचर्या करते हैं।] |
| सर्वा हि साधनेच्छा फलेच्छैव, (एषणात्रयस्यैकत्वम्) अतो व्याचष्टे श्रुतिः एकैव एषणेति; कथम् ? या ह्येव पुत्रैषणा सा | साधनसम्बन्धिनी सारी इच्छा फलेच्छा ही है, इसलिये श्रुति ऐसी व्याख्या करती है कि एक ही एषणा है; किस प्रकार?—जो भी पुत्रैषणा है, वही वित्तैषणा है; क्योंकि |