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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

७०६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३

७०६बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३
संस्कृतहिन्दी
दृष्टेरिति कर्मणि षष्ठी; सा दृष्टिः क्रियमाणा घटवत् कर्म भवति; द्रष्टारमिति तृजन्तेन द्रष्टुर्दृष्टिकर्तृत्वमाचष्टे; तेनासौ दृष्टेर्द्रष्टा दृष्टेः कर्तेति व्याख्यातॄणामभिप्रायः।‘दृष्टेः’ इस पदमें कर्ममें षष्ठी है, वह दृष्टि क्रियमाण होनेसे घटके समान कर्म है और ‘द्रष्टारम्’ इस तृजन्त-पदसे द्रष्टाका दृष्टिकर्तृत्व बतलाया गया है; अतः उन व्याख्याताओंका अभिप्राय यह है कि यह दृष्टिका द्रष्टा—दृष्टिका कर्ता है।
तत्र दृष्टेरिति षष्ठ्यन्तेन दृष्टिग्रहणं निरर्थकमिति दोषं न पश्यन्ति; पश्यतां वा पुनरुक्तमसारः प्रमादपाठ इति वा न आदरः; कथं पुनराधिक्यम् ? तृजन्तेनैव दृष्टिकर्तृत्वस्य सिद्धत्वादृष्टेरिति निरर्थकम्; तदा ‘द्रष्टारं न पश्येः’ इत्येतावदेव वक्तव्यम्; यस्माद्धातोः परस्तृच् श्रूयते, तद्धातवर्थकर्तरि हि तृच् स्मर्यते; ‘गन्तारं भेत्तारं वा नयति’ऐसी व्याख्या करनेमें वे यह दोष नहीं देखते कि ‘दृष्टेः’ इस षष्ठ्यन्तरूपसे ‘दृष्टि’ पदका ग्रहण निरर्थक हो जाता है। अथवा यदि देखते होंगे तो 'यह पुनरुक्त है, असार है, प्रमादपाठ है' ऐसा समझकर उसपर ध्यान नहीं देते। यह अधिक पाठ किस प्रकार है? दृष्टिकर्तृत्वरूप अर्थ तो [ ‘द्रष्टारम्’ इस ] तृजन्त पदसे ही सिद्ध हो जाता है¹ इसलिये ‘दृष्टेः’ यह पद निरर्थक ही है; उस स्थितिमें तो ‘द्रष्टारं न पश्येः’ केवल इतना ही कहना चाहिये था; क्योंकि जिस धातुसे परे ‘तृच्’ प्रत्यय सुना जाता है, वहाँ वह ‘तृच्’ उस धात्वर्थके कर्ता-अर्थमें ही होती है; जैसे गन्ता (गमन करनेवाले) को अथवा भेत्ता (भेदन करनेवाले ) को ले जाता

१. क्योंकि ‘ण्वुल्तृचौ कर्तरि’ इस पाणिनिसूत्रके अनुसार ‘तृच्’ प्रत्यय कर्ता-अर्थमें ही होता है।