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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

६३८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३

६३८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३

| पुरोनुवाक्या च—प्राग् यागकालाद् याः प्रयुज्यन्ते ऋचः, सा ऋग्जातिः पुरोनुवाक्येत्युच्यते। यागार्थं याः प्रयुज्यन्ते ऋचः, सा ऋग्जातिर्याज्या। शस्त्रार्थं याः प्रयुज्यन्ते ऋचः, सा ऋग्जातिः शस्या। सर्वास्तु याः काश्चन ऋचः, ताः स्तोत्रिया वा अन्या वा सर्वा एतास्वेव तिसृषु ऋग्जातिष्वन्तर्भवन्ति। | ‘पुरोनुवाक्या च’—जो ऋचाएँ यागकालसे पहले प्रयुक्त होती हैं, वह ऋग्जाति ‘पुरोनुवाक्या’ कही जाती हैं। जो ऋचाएँ यागके लिये प्रयुक्त होती हैं, वह ऋग्जाति ‘याज्या’ कहलाती हैं। तथा जो ऋचाएँ शस्त्रकर्मके लिये प्रयुक्त होती हैं, वह ऋग्जाति ‘शस्या’ कही जाती हैं। जितनी भी ऋचाएँ हैं—वे स्तोत्रिया हों अथवा कोई अन्य—इन तीन ऋग्जातियोंके ही अन्तर्गत हैं। |
| किं ताभिर्जयतीति यत्किञ्चेदं प्राणभृदिति—अतश्च सङ्ख्यासामान्याद् यत्किञ्चित्प्राणभृज्जातम्, तत् सर्वं जयति तत् सर्वं फलजातं सम्पादयति सङ्ख्यादिसामान्येन ॥ ७॥ | ‘उनके द्वारा पुरुष किसपर जय प्राप्त करता है’ इसपर कहते हैं—यह जो कुछ प्राणिसमुदाय है, उसे जीत लेता है। अतः [तीन ऋग्जाति और तीन लोकोंकी ] संख्यामें समानता होनेके कारण यह जितना प्राणिसमुदाय है, वह इस सबको जीत लेता है। अर्थात् संख्यादिमें समानता होनेके कारण वह उस समस्त फलसमूहका सम्पादन कर लेता है ॥ ७ ॥ |

होमसम्वन्धिनी आहुतियाँ और उनसे प्राप्त होनेवाले फल

याज्ञवल्क्येति होवाच कत्ययमद्याध्वर्युरस्मिन् यज्ञ आहुतीर्होष्यतीति तिस्र इति कतमास्तास्तिस्र इति या