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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

६०६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २

६०६बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २

| अवोचत्-उक्तवान्। कथम् ? तद्दंस इति व्यवहितेन सम्बन्धः। दंस इति कर्मणो नामधेयम्। | देखते हुए कहा। किस प्रकार कहा ? ‘तद्दंस’ इस प्रकार यहाँ ‘तत्’ और ‘दंस’ इन दूरवर्ती पदोंका अन्वय है। ‘दंस’ यह उस कर्मका नाम है। |
| तच्च दंसः किंविशिष्टम् ? उग्रं क्रूरम्। वां युवयोः। हे नरा नराकारावश्विनौ। तच्च कर्म किंनिमित्तम् ? सनये लाभाय ! | वह दंस कर्म किस विशेषणसे युक्त है ? उग्र-क्रूर। वाम्-तुम दोनोंका। हे नरा-नराकार अश्विनीकुमारो ! वह कर्म किसलिये था ? सनये—लाभके लिये। |
| लाभलुब्धो हि लोकेऽपि क्रूरं कर्माचरति, तथैवैतावुपलभ्येते यथा लोके। | क्योंकि लाभका लोभी पुरुष लोकमें भी क्रूर कर्म कर बैठता है। जिस प्रकार लोकमें होते हैं, वैसे ही ये दोनों भी देखे जाते हैं। |
| तदाविः प्रकाशं कृणोमि करोमि यद्रहसि भवद्भ्यां कृतम्, किमिव ? इत्युच्यते—तन्यतुः पर्जन्यः, न इव। नकारस्तूपरिष्टादुपचार उपमार्थीयो वेदे, न प्रतिषेधार्थः; यथाश्वं न। अश्वमिवेति यद्वत्। | [ मन्त्र कहता है-] तुमने जो एकान्तमें किया है, उसे मैं प्रकट किये देता हूँ। किसके समान ? सो बतलाया जाता है—‘तन्यतुः’ ‘न’ अर्थात् मेघके समान। वेदमें जो नकार किसी पदके पीछे रहता है वह उपचारमात्रमें उपमाके अर्थमें होता है, निषेध अर्थमें नहीं होता। जैसे—‘अश्वं न’ यह वाक्य अश्वके समान-इस अर्थमें है, उसी प्रकार। |
| तन्यतुरिव वृष्टिं यथा पर्जन्यो वृष्टिं प्रकाशयति स्तनयित्न्वादि-शब्दैः, तद्वदहं युवयोः क्रूरं कर्म आविष्कृणोमीति सम्बन्धः। | जैसे मेघ गर्जनादि शब्दोंके सहित वृष्टिको प्रकाशित करता है, उसी प्रकार मैं तुम दोनोंके क्रूर कर्मको प्रकट करता हूँ—ऐसा इसका सम्बन्ध है। |