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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

५२८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २

५२८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २
कल्पनानुपपन्नैव । न च वास्यदेशव्यतिरेकेण वासनाया वस्त्वन्तरसञ्चरणं मनसापि कल्पयितुं शक्यम् ।इत्यादि कल्पना असंगत ही ठहरेगी। इसके सिवा अपने निवासयोग्य स्थानको छोड़कर किसी अन्य वस्तुमें वासनाके सञ्चरित होनेकी तो मनसे भी कल्पना नहीं की जा सकती ।
न च श्रुतयो गच्छन्ति "कामः संकल्पो विचिकित्सा" बृ० उ० १ । ५ । ३) "हृदये ह्येव रूपाणि" (३ । ९ । २०) "ध्यायतीव लेलायतीव" (४ । ३ । ७) "कामा येऽस्य हृदि श्रिताः" (४ । ४ । ७) "तीर्णो हि तदा सर्वाञ्छोकान्हृदयस्य" (४ । ३ । २२) इत्याद्याः । न चासां श्रुतीनां श्रुतादर्थान्तरकल्पना न्याय्या, आत्मनः परब्रह्मत्वोपपादनार्थपरत्वाद्रासाम्, एतावान्मात्रार्थोपपत्तयत्वाच्च सर्वोपनिषदाम् । तस्माच्छ्रुत्यर्थकल्पनाकुशलाः सर्व एवोपनिषदर्थमन्यथा कुर्वन्ति । तथापि वेदार्थश्चेत्स्यात्कामं भवतु, न मे द्वेषः ।तथा इस विषयमें "काम, संकल्प और संशय," "हृदयमें ही रूप प्रतिष्ठित हैं", "मानो ध्यान करता है, मानो वेगसे चल रहा है" "जो संकल्प इसके हृदयमें स्थित हैं", "उस समय वह हृदयके समस्त शोकोंसे पार हो जाता है" इत्यादि श्रुतियाँ भी सहमत नहीं हैं। इन श्रुतियोंका यथाश्रुत अर्थ छोड़कर किसी दूसरे अर्थकी कल्पना करनी उचित नहीं है; क्योंकि ये आत्माका परब्रह्मत्व प्रतिपादन करनेमें प्रवृत्त हैं तथा इसी अर्थमें समस्त उपनिषदोंका पर्यवसान होता है। अतः श्रुतिके अर्थकी कल्पना करनेमें कुशल ये सभी लोग उपनिषद्के अर्थको उलटा कर देते हैं। तो भी यदि वह वेदका तात्पर्य हो तो भले ही रहे, मेरा उससे कोई द्वेष नहीं है।
न च 'द्वे वाव ब्रह्मणो रूपे' इति राशित्रयपक्षे समञ्जसम्;किंतु [भर्तृप्रपञ्चके] राशित्रयसिद्धान्तमें ब्रह्मके दो ही रूप हैं' ऐसा कहना उचित नहीं है; जब कि