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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

४९४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २

४९४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २

| द्युपलब्धारः कर्तारश्च धर्माधर्मयोः प्रतिशरीरं भिन्ना अनुमीयन्ते संसारिणः; तत्र ब्रह्मैकत्वं ब्रुवतामनुमानविरोधश्च । तथा च आगमविरोधं वदन्ति—"ग्रामकामो यजेत" "पशुकामो यजेत" "स्वर्गकामो यजेत" इत्येवमादिवाक्येभ्यो ग्रामपशुस्वर्गादिकामास्तत्साधनाद्यनुष्ठातारश्च भिन्ना अवगम्यन्ते । <br><br> (उक्ताक्षेप-निरासः) <br> अत्रोच्यते—ते तु कुतर्कदूषितान्तःकरणा ब्राह्मणादिवर्णापसदा अनुकम्पनीया आगमार्थविच्छिन्नसम्प्रदायबुद्धय इति । कथम् ? श्रोत्रादिद्वारैः शब्दादिभिः प्रत्यक्षत उपलभ्यमानैर्ब्रह्मण एकत्वं विरुध्यत इति वदन्तो वक्तव्याः—किं शब्दादीनां भेदेनाकाशैकत्वं विरुध्यत | से शब्दादिको उपलब्ध करनेवाले तथा धर्माधर्मका अनुष्ठान करनेवाले संसारी जीव भी प्रत्येक शरीरमें भिन्न-भिन्न हैं—ऐसा अनुमान होता है। ऐसी स्थितिमें ब्रह्मकी एकता बतलानेवाले वाक्योंका अनुमान प्रमाणसे भी विरोध है। इसी तरह वे उनका शास्त्रप्रमाणसे भी विरोध बतलाते हैं, [ क्योंकि ] "ग्रामकी कामनावाला यज्ञ करे", "पशुकी कामनावाला यज्ञ करे", "स्वर्गकी कामनावाला यज्ञ करे", इत्यादि वाक्योंद्वारा ग्राम, पशु और स्वर्गकी कामनावाले तथा उनके साधनोंका अनुष्ठान करनेवाले पुरुष भिन्न-भिन्न जान पड़ते हैं। <br><br> अब इसके उत्तरमें कहा जाता है—कुतर्कके कारण जिनके अन्तःकरण दूषित हैं तथा जिनकी बुद्धि वेदार्थविषयक सम्प्रदायसे दूर है, ऐसे वे ये ब्राह्मणादि वर्णाधम दयाके ही पात्र हैं। सो कैसे ?—श्रोत्रादि द्वारोंसे प्रत्यक्ष उपलब्ध होनेवाले शब्दादिसे ब्रह्मकी एकताका विरोध है—इस प्रकार कहनेवाले उन पुरुषोंसे यह कहना चाहिये कि क्या शब्दादिके भेदसे आकाशकी एकताका भी विरोध है ? यदि उसका |