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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

३८२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १

३८२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १

द्योऽयं मध्यमः प्राणस्तानि ज्ञातुं दधिरे । अयं वै नःश्रेष्ठो यः सञ्चरँश्चासञ्चरँश्च न व्यथतेऽथो न रिष्यति हन्तास्यैव सर्वे रूपमसामेति त एतस्यैव सर्वे रूपमभवँस्तस्मादेत एतेनाख्यायन्ते प्राणा इति तेन ह वाव तत्कुलमाचक्षते यस्मिन्कुले भवति य एवं वेद य उ हैवंविदा स्पर्धतेऽनुशुष्यत्यनुशुष्य हैवान्ततो म्रियत इत्यध्यात्मम् ॥ २१ ॥

अब यहाँसे व्रतका विचार किया जाता है। प्रजापतिने कर्मों (कर्मके साधनभूत वागादि करणों) की रचना की। रचे जानेपर वे एक दूसरेसे स्पर्धा करने लगे। वाक्ने व्रत किया कि 'मैं बोलती ही रहूँगी' तथा 'मैं देखता ही रहूँगा' ऐसा नेत्रने और 'मैं सुनता ही रहूँगा' ऐसा श्रोत्रने व्रत किया। इसी प्रकार अपने-अपने कर्मके अनुसार अन्य इन्द्रियोंने भी व्रत किया तब मृत्युने श्रम होकर उनसे सम्बन्ध किया और उनमें व्याप्त हो गया। उनमें व्याप्त होकर मृत्युने उनका अवरोध किया, इसीसे वाक् श्रमित होती ही है, नेत्र श्रमित होता ही है, श्रोत्र श्रमित होता ही है। किंतु यह जो मध्यम प्राण है, इसीमें वह व्याप्त न हो सका। तब उन इन्द्रियोंने उसे जाननेका निश्चय किया। निश्चय यही हममें श्रेष्ठ है, जो सञ्चार करते और सञ्चार न करते हुए भी व्यथित नहीं होता और न क्षीण ही होता है। अच्छा, हम सब भी इसीके रूप हो जायँ—ऐसा निश्चय कर वे सब इसीके रूप हो गयीं। अतः वे इसीके नामसे 'प्राण' इस प्रकार कही जाती हैं, इसीसे जो ऐसा जानता है, वह जिस कुलमें होता है, वह कुल उसीके नामसे बोला जाता है तथा जो ऐसे विद्वान्से स्पर्धा करता है, वह सूख जाता है और सूखकर अन्तमें मर जाता है। यह अध्यात्मप्राणदर्शन है ॥ २१ ॥

अथातोऽनन्तरं व्रतमीमांसा उपासनकर्मविचारणेत्यर्थः। एषां प्राणानां कस्य कर्म व्रतत्वेनअब यहाँसे आगे व्रतमीमांसा अर्थात् उपासना-कर्मका विचार किया जाता है। यानी इन प्राणोंमेंसे किस