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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

३७६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १

३७६बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १
त्र्यन्नात्मफलमित्यस्मादेव वाक्यादवगन्तुं शक्यम्, पुत्रादिसाधनानां त्र्यन्नात्मफलदर्शनेनैवोपक्षीणत्वाद् वाक्यस्य।होते हैं और किसीके लिये त्र्यन्नात्मरूप फलवाले होते हैं, क्योंकि पुत्रादि साधनोंका त्र्यन्नात्मफल दिखाते हुए ही यह वाक्य समाप्त होता है।

पृथिव्यै चैनमग्नेश्च दैवी वागाविशति सा वै दैवी वाग्यया यद्यदेव वदति तत्तद्भवति ॥ १८ ॥

पृथिवी और अग्निसे इसमें दैवी वाक्‌का आवेश होता है। दैवी वाक् वही है, जिससे पुरुष जो-जो भी बोलता है, वही-वही हो जाता है ॥ १८ ॥

पृथिव्यै पृथिव्याः च एनम् अग्नेश्च <br><br> दैवी अधिदैवात्मिका वागेनं कृतसम्प्रत्तिकमाविशति। सर्वेषां हि वाच उपादानभूता दैवी वाक्पृथिव्यग्निलक्षणा, सा ह्याध्यात्मिकासङ्गादिदोषैर्निरुद्धा। विदुषस्तदोषापगमे आवरणभङ्ग इवोदकप्रदीपप्रकाशवच्च व्याप्नोति। तदेतदुच्यते—पृथिव्या अग्नेश्चैनं दैवी वागाविशतीति। <br><br> सा च दैवी वागनृतादिदोषरहिता शुद्धा, यया वाचा दैव्या यद्यदेव आत्मने परस्मै वा वदतिपृथिवी और अग्निसे इस सम्प्रत्तिकर्म करनेवालेमें दैवी—आधिदैविक वाक्‌का आवेश होता है। पृथिवी और अग्निरूपा दैवी वाक् सभीकी वाणीकी उपादानभूता है, निश्चय ही वह आध्यात्मिक (दैहिक) आसक्ति आदि दोषोंसे आवृत्त है, किंतु आवरण (व्यवधान) के निवृत्त होनेपर जैसे जल और प्रकाश फैल जाते हैं उसी प्रकार विद्वान्‌के उस (आध्यात्मिक आसक्तिरूप) दोषके निवृत्त हो जानेपर वह उसमें आविष्ट हो जाती है। इसीसे यह कहा है कि उसमें पृथिवी और अग्निसे दैवी वाक्‌का आवेश होता है। <br><br> वह दैवी वाक् अनृतादि दोषसे रहित और शुद्ध होती है, जिस दैवी वाणीसे वह अपने या दूसरेके लिये जो-