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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

१३६० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६

१३६०बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ६

अथवा आवश्यक कर्ममें भी जो न्यूनता (त्रुटि) कर दी हो, हमारे उस कर्मको विद्वान् अग्निदेव स्विष्टकृत् (अभीष्टसाधक) होकर स्विष्ट और सुहुत (न्यूनातिरिक्त दोषसे रहित) कर दें—स्वाहा ॥ २४ ॥

जातेऽग्निमुपसमाधायाङ्क<br>आधाय पुत्रं कंसे पृषदाज्यं संनीय<br>संयोज्य दधि घृते पृषदाज्यस्योप-<br>घातं जुहोत्यस्मिन् सहस्रमित्या-<br>द्यावापस्थाने ॥ २४ ॥पुत्र जन्म होनेपर अग्निस्थापन करके पुत्रको गोदमें लेकर और काँसके कटोरेमें दधिमिश्रित घृत रखकर दहीको घीमें मिलाकर उसका थोड़ा-थोड़ा-सा अंश लेकर 'अस्मिन् सहस्रम्' इत्यादि मन्त्रसे अग्निके आवाप स्थानमें आहुति दे ॥ २४ ॥

अथास्य दक्षिणं कर्णमभिनिधाय वाग् वागिति त्रिरथ दधि मधु घृतँ संनीयानन्तर्हितेन जातरूपेण प्राशयति। भूस्ते दधामि भुवस्ते दधामि स्वस्ते दधामि भूर्भुवः स्वः सर्वं त्वयि दधामीति ॥ २५ ॥

स्विष्टकृत् होमके अनन्तर पिता शिशुके दाहिने कानको अपने मुखके पास ले आकर 'वाक् वाक् वाक्' इस प्रकार तीन बार कहे¹। तत्पश्चात् दही, मधु और घी एकमें मिलाकर उसे दूसरे धातुओंके मेलसे रहित विशुद्ध सोनेकी चम्मचसे बालकको चटावे [ उस समय इन चार मन्त्रोंका पाठ करे ] 'भूस्ते दधामि' 'भुवस्ते दधामि' 'स्वस्ते दधामि' 'भूर्भुवः स्वः सर्वं त्वयि दधामि'² ॥ २५ ॥

अथास्य दक्षिणं कर्णम-<br>भिनिधाय स्वं ' मुखं<br>वाग् वागिति त्रिजपेत् ।तदनन्तर इस बालकके दाहिने<br>कानको अपने मुखके पास ले जाकर<br>'वाक् वाक्' यह तीन बार जपे ।

१. तीन बार कहनेका तात्पर्य यह है कि तेरी बुद्धिमें वेदत्रयीरूप वाणी प्रवेश करे।
२. मैं तुझमें भूर्लोककी स्थापना करता हूँ, भुवर्लोककी स्थापना करता हूँ, स्वर्लोककी स्थापना करता हूँ तथा भूर्भुवः स्वः सब लोकोंकी स्थापना करता हूँ।