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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
| ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ११९७ |
पृष्ठ 1211स्थायी लिंक
| ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ११९७ |
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| मध्येऽनृतम्, अनृतं हि मृत्युः; <br><br>मृत्य्वनृतयोस्तकारसामान्यात् । <br><br>तदेतदनृतं तकाराक्षरं मृत्युरूपमुभयतः सत्येन सकारयकारलक्षणेन परिगृहीतं व्याप्तमन्तर्भावितं सत्यरूपाभ्यामतोऽकिञ्चित्करं तत्, सत्यभूयमेव सत्यबाहुल्यमेव भवति । एवं सत्यबाहुल्यं सर्वस्य मृत्योरनृतस्याकिञ्चित्करत्वं च यो विद्वान्, तमेवं विद्वांसमनृतं कदाचित् प्रमादोक्तं न हिनस्ति ॥ १ ॥ | अर्थात् बीचमें अनृत है, अनृत मृत्यु है; क्योंकि मृत्यु और अनृत इनकी तकारमें समानता है। <br><br>वह यह मृत्युरूप अनृत तकार अक्षर दोनों ओरसे सकार-यकार-रूप सत्यसे परिगृहीत—व्याप्त है, अर्थात् इन सत्यरूप अक्षरोंसे अन्तर्भावित है, अतः वह अकिञ्चित्कर है; इसलिये 'सत्य' यह नाम सत्यभूय—सत्यप्राय ही है। इस प्रकार इस सम्पूर्ण अक्षरके सत्यबाहुल्य और मृत्युरूप अनृतके अकिञ्चित्करत्वको जो जानता है, उस इस प्रकार जाननेवालेको कभी प्रमादसे बोला हुआ अनृत (असत्य) नहीं मारता ॥ १ ॥ |
एक-दूसरेमें प्रतिष्ठित सत्यसंज्ञक आदित्यमण्डलस्थ और चाक्षुष पुरुष
| अस्याधुना सत्यस्य ब्रह्मणः संस्थानविशेष उपासनमुच्यते-- | अब उस सत्य-ब्रह्मकी संस्थान-विशेषमें उपासना बतलायी जाती है- |
तद् यत्तत् सत्यमसौ स आदित्यो य एष एतस्मिन् मण्डले पुरुषो यश्चायं दक्षिणेऽक्षन् पुरुषस्तावेतावन्योन्यस्मिन् प्रतिष्ठितौ रश्मिभिरेषोऽस्मिन् प्रतिष्ठितः प्राणैरयममुष्मिन् स यदोत्क्रमिष्यन् भवति शुद्धमेवैतन्मण्डलं पश्यति नैनमेते रश्मयः प्रत्यायन्ति ॥ २ ॥
वह जो सत्य है, सो यह आदित्य है। जो इस आदित्यमण्डलमें पुरुष है और जो भी यह दक्षिण नेत्रमें पुरुष है, वे ये दोनों पुरुष एक-दूसरेमें