सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ५१५

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ५१५


साधारणधर्मविशेषवत्, त्यच्च-तद्विपरीतम् 'त्यत्' इत्येव सर्वदा परोक्षाभिधानार्हम् ॥ १ ॥वाले असाधारण धर्मविशेषवाला और त्यत्—सत्‌से विपरीत स्वभाववाला अर्थात् 'वह' इस प्रकार सर्वदा परोक्षरूपसे कहे जाने योग्य ॥ १ ॥

मूर्तामूर्तके विभागपूर्वक मूर्तरूप और उसके रसका वर्णन

तत्र चतुष्टयविशेषणविशिष्टं मूर्तं तथा अमूर्तं च। तत्र कानि मूर्तविशेषणानि? कानि चेतराणि? इति विभज्यते—इस प्रकार मूर्त और अमूर्त चार विशेषण युक्त हैं। उनमें कौन-से विशेषण मूर्तके हैं और कौन-से अमूर्तके ? इसका विभाग किया जाता है—

तदेतन्मूर्तं यदन्यद्वायोश्चान्तरिक्षाच्चैतन्मर्त्यमेतत्स्थितमेतत्सत्तस्यैतस्य मूर्तस्यैतस्य मर्त्यस्यैतस्य स्थितस्यैतस्य सत एष रसो य एष तपति सतो ह्येष रसः ॥ २ ॥

जो वायु और अन्तरिक्षसे भिन्न है, वह मूर्त है। यह मर्त्य है, यह स्थित है और यह सत् है। उस इस मूर्तका, इस मर्त्यका, इस स्थितका, इस सत्‌का यह रस है, जो कि यह तपता है। यह सत्‌का ही रस है ॥ २ ॥

तदेतन्मूर्तं मूर्च्छितावयवम् इतरेतरानुप्रविष्टावयवं घनं संहतमित्यर्थः । किं तत् ? यदन्यत्; कस्मादन्यत् ? वायोश्चान्तरिक्षाच्च भूतद्वयात्—परिशेषात् पृथिव्यादिभूतत्रयम् ।वह यह मूर्त अर्थात् मिले हुए अवयवोंवाला है, इसके अवयव एक दूसरेमें अनुप्रविष्ट रहते हैं, यह घनीभूत अर्थात् संहत है। वह क्या है ? जो अन्य है; किससे अन्य है ? वायु और अन्तरिक्ष इन दो भूतोंसे; अतः बचे हुए पृथिवी आदि तीन भूत ही मूर्त हैं।