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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished711 pages

About this granth

Sri Ramakrishna Vachanamrita (श्री रामकृष्ण वचनामृत) is the Hindi version of the Sri Sri Ramakrishna Kathamrita, the record of Sri Ramakrishna Paramahamsa's conversations kept by his householder disciple Mahendranath Gupta, who wrote as 'M'. Gupta noted the talks at Dakshineswar and Calcutta between 1882 and 1886 in his diary, with dates, which gives the work the feel of an eyewitness account.

This first part is the translation by the Hindi poet Suryakant Tripathi 'Nirala'. It is arranged in numbered sections, each tied to a date such as 11 March, 16 October or 28 October 1882, and covers Ramakrishna's teaching on God-realisation, devotion and knowledge, spiritual life for householders, maya and the harmony of religions, told through his everyday parables. A foreword and introduction open the volume.

The copy comes from the library of Gurukul Kangri University, Haridwar, and has about 711 pages.

परिच्छेद ७२

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परिच्छेद ७२

दक्षिणेश्वर में राखाल, राम, केदार प्रभृति के साथ

ब्रह्मज्ञान के सम्बन्ध में वार्तालाप

(१)

श्रीरामकृष्ण गाड़ी पर बैठ रहे हैं। कालीमाता के दर्शन के लिए कालीघाट जाएँगे। श्री अधर सेन के घर होकर जायेंगे वहाँ से अधर भी साथ जायेंगे। आज शनिवार, अमावस्या है २९ दिसम्बर, १८८३। दिन के एक बजे का समय होगा।

गाड़ी उनके कमरे के उत्तर के तरफ के बरामदे के पास आकर खड़ी है। मणि गाड़ी के द्वार के पास आकर खड़े हुए।

मणि (श्रीरामकृष्ण से) – क्या मैं भी चलूँ?

श्रीरामकृष्ण – क्यों?

मणि – एक बार कलकत्ते के मकान से होकर आता।

श्रीरामकृष्ण (चिन्तित होकर) – फिर जाओगे? क्यों? यहाँ अच्छे तो हो।

मणि घर लौटेंगे, कुछ घण्टों के लिए; परन्तु श्रीरामकृष्ण की इसके लिए सम्मति नहीं है।

(२)

आज रविवार, ३० दिसम्बर, पूस की शुक्ला प्रतिपदा है। दिन के तीन बजे होंगे। मणि पेड़ के नीचे अकेले टहल रहे हैं। एक भक्त ने आकर कहा, “प्रभु बुलाते हैं।” कमरे में श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ बैठे हुए हैं। मणि ने जाकर प्रणाम किया और जमीन पर भक्तों के बीच बैठ गए।

कलकत्ते से राम, केदार आदि भक्त आये हुए हैं। उनके साथ एक वेदान्तवादी साधु भी आए हैं। श्रीरामकृष्ण जिस दिन रामचन्द्र का बगीचा देखने गए थे उस दिन उस साधु से भेंट हुई थी। साधु पासवाले बगीचे में एक पेड के नीचे अकेले एक चारपाई पर बैठे हुए थे। राम आज श्रीरामकृष्ण की आज्ञा से उस साधु को अपने साथ लेते आए हैं। साधु ने भी श्रीरामकृष्ण के दर्शन करने की इच्छा प्रकट की थी।

CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

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४२० श्रीरामकृष्णवचनामृत ३० दिसम्बर, १८८३

श्रीरामकृष्ण उस साधु के साथ आनन्दपूर्वक वार्तालाप कर रहे हैं। उन्होंने अपने पास छोटे तख्त पर साधु को बैठाया है। बातचीत हिन्दी में हो रही है।

श्रीरामकृष्ण – यह सब तुम्हें कैसा जान पड़ता है?

साधु – यह सब स्वप्नवत् है।

श्रीरामकृष्ण – ब्रह्म सत्य और संसार मिथ्या, यही न? अच्छा जी, ब्रह्म कैसा है?

साधु – शब्द ही ब्रह्म है। अनाहत शब्द।

श्रीरामकृष्ण – परन्तु शब्द का प्रतिपाद्य भी तो एक है। क्यों जी?

साधु – वही वाच्य है और वही वाचक भी है।

यह बात सुनते ही श्रीरामकृष्ण समाधिस्थ हो गए। चित्रवत् स्थिर बैठे हुए हैं। साधु और भक्तगण आश्चर्यचकित होकर श्रीरामकृष्ण की यह समाधि-अवस्था देख रहे हैं। केदार साधु से कह रहे हैं, “यह देखिए, इसे समाधि कहते हैं”।

साधु ने ग्रन्थों में ही समाधि की बात पढ़ी थी। समाधि कैसे होती है, यह उन्होंने कभी नहीं देखा था।

श्रीरामकृष्ण धीरे धीरे अपनी प्राकृत अवस्था में आ रहे हैं। अभी जगन्माता के साथ वार्तालाप कर रहे हैं। कहते हैं – “माँ, अच्छा हो जाऊँ, बेहोश न कर देना। साधु के साथ सच्चिदानन्द की बातें करूँगा। सच्चिदानन्द की बातें करते हुए आनन्द मनाऊँगा।”

साधु निर्वाक् होकर देख रहे हैं और ये सब बातें सुन रहे हैं। अब श्रीरामकृष्ण साधु से बातचीत करने लगे। कहते हैं – अब तुम ‘सोऽहम्’ उड़ा दो। अब ‘हम और तुम’ लेकर विलास करें।

जब तक ‘हम’ और ‘तुम’ यह भाव है, तब तक माँ भी हैं। आओ, उन्हें लेकर आनन्द किया जाय। श्रीरामकृष्ण के कथन का शायद यही मर्म है।

कुछ देर इस तरह बातचीत हो जाने के बाद श्रीरामकृष्ण पंचवटी में टहलने चले गए। राम, केदार, मास्टर आदि उनके साथ हैं।

श्रीरामकृष्ण (सहास्य) – साधु को तुमने कैसा देखा।

केदार – उसका शुष्क ज्ञान है। अभी उसने हण्डी चढ़ायी भर है – अभी चावल नहीं चढ़ाए गए।

श्रीरामकृष्ण – हाँ, यह ठीक है, परन्तु है त्यागी। जिसने संसार को त्याग दिया है, वह बहुत-कुछ आगे बढ़ गया है।

“साधु अभी प्रवर्त्तक है। उन्हें अगर कोई प्राप्त न कर सका, तो उसका कुछ भी नहीं हुआ। जब उनके प्रेम में मस्त हुआ जाता है, तब और कुछ नहीं सुहाता। तब तो – ‘आदरणीय श्यामा माँ को बड़े यत्न से हृदय में धारण किए रहो। मन तू देख और मैं देखूँ, और कोई न देखने पाए।’ ”

CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

३० दिसम्बर, १८८३ | परिच्छेद ७२ | ४२१

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३० दिसम्बर, १८८३ | परिच्छेद ७२ | ४२१

केदार श्रीरामकृष्ण के भाव के अनुरूप एक गीत गाते हैं -

(भावार्थ) – “सखि, मन की बात कैसे कहूँ? कहने की मनाई है। दर्द को समझनेवाले के बिना प्राण कैसे बच सकेंगे! जो मन का मीत होता है वह देखते ही पहचान में आ जाता है। वह विरला ही होता है।...”

श्रीरामकृष्ण अपने कमरे में लौट आए हैं। चार बजे का समय है - कालीमन्दिर खुल गया। श्रीरामकृष्ण साधु को लेकर कालीमन्दिर जा रहे हैं। मणि भी साथ हैं।

कालीमन्दिर में प्रवेश कर श्रीरामकृष्ण भक्तिपूर्वक माता को प्रणाम कर रहे हैं। साधु भी हाथ जोड़कर सिर झुका माता को बारम्बार प्रणाम कर रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण – क्यों जी, दर्शन कैसे हुए?

साधु (भक्तिभाव से) – काली प्रधान है।

श्रीरामकृष्ण – काली और ब्रह्म दोनों अभेद हैं। क्यों जी?

साधु – जब तक बहिर्मुख है तब तक काली को मानना होगा। जब तक बहिर्मुख है तब तक भले बुरे दोनों भाव हैं - तब तक एक प्रिय और दूसरा त्याज्य, यह भाव है ही।

“देखिये न, नाम और रूप ये सब तो मिथ्या ही हैं, परन्तु जब तक मैं बहिर्मुख हूँ तब तक मुझे स्त्रियों को त्याज्य समझना चाहिए। और उपदेश के लिए 'यह अच्छा है, यह बुरा है' यह भाव रखना चाहिए - नहीं तो भ्रष्टाचार फैलेगा।”

श्रीरामकृष्ण साधु के साथ बातचीत करते हुए कमरे में लौटे।

श्रीरामकृष्ण – देखा, साधु ने कालीमन्दिर में प्रणाम किया।

मणि – जी हाँ।

(३)

दूसरे दिन सोमवार, ३१ दिसम्बर है। दिन का तीसरा पहर, चार बजे का समय होगा। श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ कमरे में बैठे हुए हैं। बलराम, मणि, राखाल, लाटू, हरीश आदि भक्त भी हैं। श्रीरामकृष्ण मणि और बलराम से कह रहे हैं -

“हलधारी का ज्ञानियों जैसा भाव था। वह अध्यात्मरामायण, उपनिषद् – यही सब दिनरात पढ़ता था। इधर साकार की बातों से मुँह फेरता था। मैंने जब कंगालों के भोजन कर जाने पर उनकी पत्तलों से थोड़ा थोड़ा अन्न लेकर खाया, तब उसने कहा, 'तेरे लड़कों का विवाह कैसे होगा?' मैंने कहा, 'क्यों रे साला, मेरे लड़के-बच्चे भी होंगे! आग लगे तेरे गीता और वेदान्त पढ़ने में!' देखो न, इधर तो कहता है – संसार मिथ्या है और फिर विष्णुमन्दिर में नाक सिकोड़कर ध्यान!”

शाम हो गयी है। बलराम आदि भक्त कलकत्ता चले गये हैं। श्रीरामकृष्ण अपने

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४२२ श्रीरामकृष्णवचनामृत · ३० दिसम्बर, १८८३

कमरे में बैठे हुए माता का चिन्तन कर रहे हैं। कुछ देर बाद मन्दिर में आरती का मधुर शब्द सुनायी पड़ने लगा।

रात के आठ बज चुके हैं। श्रीरामकृष्ण भाव में आकर मधुर स्वर से माता के साथ वार्तालाप कर रहे हैं। मणि जमीन पर बैठे हुए हैं।

श्रीरामकृष्ण मधुर कण्ठ से नामोच्चारण कर रहे हैं – “हरि ॐ! हरि ॐ! हरि ॐ!”

माँ से कह रहे हैं – “माँ! ब्रह्मज्ञान देकर मुझे बेहोश न कर रखना। मैं ब्रह्मज्ञान नहीं चाहता माँ! मैं आनन्द करूँगा! विलास करूँगा!”

फिर कहते हैं – “माँ, मैं वेदान्त नहीं जानता – जानना भी नहीं चाहता! माँ, तुझे पाने पर वेद-वेदान्त कितने नीचे पड़े रहते हैं!”

“अरे कृष्ण! मैं तुझे कहूँगा, ‘यह ले – खा ले – बच्चे!’ कृष्ण! कहूँगा, ‘तू मेरे ही लिए देहधारण करके आया है।’ ”

परिच्छेद ७३

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परिच्छेद ७३

ईश्वर-दर्शन के उपाय

(१)

श्रीरामकृष्ण तथा तान्त्रिक भक्त

आज पौष शुक्ला चतुर्थी है; २ जनवरी १८८४। श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ दक्षिणेश्वर के कालीमन्दिर में निवास कर रहे हैं। आजकल राखाल, लाटू, हरीश, रामलाल, मास्टर दक्षिणेश्वर में निवास कर रहे हैं।

दिन के तीन बजे का समय होगा – श्रीरामकृष्ण का दर्शन करने के लिए मणि बेलतला से उनके कमरे की ओर आ रहे हैं। वे एक तान्त्रिक भक्त के साथ पश्चिम के बरामदे में बैठे हैं।

मणि ने आकर भूमि पर माथा टेककर प्रणाम किया। श्रीरामकृष्ण ने उन्हें अपने पास बैठने के लिए कहा। सम्भव है, तान्त्रिक भक्त के साथ वार्तालाप करते करते उन्हें भी उपदेश देंगे। श्री महिम चक्रवर्ती ने तान्त्रिक भक्त को श्रीरामकृष्ण का दर्शन करने के लिए भेजा है। भक्त गेरुआ वस्त्र धारण किये हैं।

श्रीरामकृष्ण – (तान्त्रिक भक्त के प्रति) – ये सब तान्त्रिक साधना के अंग हैं; कपाल-पात्र में सुधा का पान करना! उस सुधा को कारणवारि कहते हैं, है न?

तान्त्रिक – जी हाँ!

श्रीरामकृष्ण – ग्यारह पात्र, न?

तान्त्रिक – तीन तोला भर! शव-साधना के लिए।

श्रीरामकृष्ण – पर मैं तो सुरा छू तक नहीं सकता।

तान्त्रिक – आपका सहजानन्द है, यह आनन्द होने पर और फिर क्या चाहिए!

श्रीरामकृष्ण – फिर देखो, मुझे जप-तप भी अच्छे नहीं लगते। सदा स्मरण-मनन रहता है। अच्छा, षट्चक्र क्या चीज है?

तान्त्रिक – जी, वह सब अनेक तीर्थों की तरह है। प्रत्येक चक्र में शिव शक्ति विराजमान हैं, वे आँख से देखे नहीं जाते, शरीर काटने पर भी नहीं मिलते।

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४२४श्रीरामकृष्णवचनामृत२ जनवरी १८८४

मणि चुपचाप सब सुन रहे हैं, उनकी ओर देखकर श्रीरामकृष्ण तान्त्रिक भक्त से पूछ रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण – (तान्त्रिक के प्रति) – अच्छा, बीजमन्त्र पाये बिना क्या कुछ सिद्ध होता है?

तान्त्रिक – होता है, विश्वास द्वारा – गुरुवाक्य पर विश्वास!

श्रीरामकृष्ण – (मणि की ओर इशारा करके) – विश्वास!

तान्त्रिक भक्त के चले जाने पर ब्राह्म समाज के श्री जयगोपाल सेन आये। श्रीरामकृष्ण उनके साथ वार्तालाप कर रहे हैं। राखाल, मणि आदि भक्तगण पास बैठे हैं। तीसरे पहर का समय है।

श्रीरामकृष्ण – (जयगोपाल के प्रति) – किसी से, किसी मत से विद्वेष नहीं करना चाहिए। निराकारवादी, साकारवादी, सभी उन्हीं की ओर जा रहे हैं; ज्ञानी, योगी, भक्त सभी उन्हें खोज रहे हैं। ज्ञानमार्ग के लोग कहते हैं, ब्रह्म; योगीगण कहते हैं आत्मा, परमात्मा; भक्तगण कहते हैं, भगवान; फिर यह भी है, नित्यदेव नित्यदास।

जयगोपाल – कैसे जानूँ कि सभी पथ सत्य हैं?

श्रीरामकृष्ण – किसी एक पथ से ठीक-ठीक जा सकने पर उनके पास पहुँचा जा सकता है, उस समय सभी पथों का पता भी जाना जा सकता है। जैसे एक बार किसी तरह यदि छत पर उठना सम्भव हो सके, तो लकड़ी की सीढ़ी से भी उतरा जा सकता है, पक्की सीढ़ी से भी, एक बाँस के सहारे भी और एक रस्सी के द्वारा भी।

“उनकी कृपा होने पर भक्त सब कुछ जान सकता है। उन्हें एक बार प्राप्त करने पर सब कुछ जान सकोगे। एक बार किसी भी तरह बड़े बाबू के साथ साक्षात्कार करना चाहिए, उनसे बातचीत करनी चाहिए – तब बाबू स्वयं ही बता देंगे कि उनके कितने बगीचे, तालाब, या कम्पनी के काग़ज़ हैं।”

ईश्वर-दर्शन के उपाय

जयगोपाल – उनकी कृपा कैसे होती है?

श्रीरामकृष्ण – सदा उनके नाम व गुणों का कीर्तन करना चाहिए, जहाँ तक सम्भव हो सांसारिक चिन्तन का त्याग करना चाहिए। तुम खेती करने के लिए अनेक कष्ट से खेत में जल ला रहे हो, परन्तु खेत की मेंड़ पर के एक छेद में से सब जल बाहर निकल जा रहा है। तब तो नाली काटकर जल लाना व्यर्थ हुआ, वृथा श्रम ही हुआ।

“चित्तशुद्धि होने पर, विषय-भोग की आसक्ति दूर हो जाने पर व्याकुलता आयेगी। तुम्हारी प्रार्थना ईश्वर के पास पहुँचेगी। टेलिग्राफ का तार टूटा रहने पर अथवा उसमें अन्य कोई दोष रहने पर तार का समाचार नहीं पहुँचेगा।

२ जनवरी, १८८४ परिच्छेद ७३ ४२५

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२ जनवरी, १८८४ परिच्छेद ७३ ४२५

“मैं व्याकुल होकर एकान्त में रोता था। ‘कहाँ हो नारायण’ कह कर रोता था। रोते-रोते बाह्य ज्ञान लुप्त हो जाता था। मैं महावायु में लीन हो जाता था।

“योग कैसे होता है? टेलिग्राफ का तार टूटा न रहने पर या उसमें कोई दोष न रहने पर होता है। विषयों के प्रति आसक्ति का एकदम त्याग।

“किसी प्रकार की कामना-वासना नहीं रखनी चाहिए। कामना-वासना रहने पर उसे सकाम भक्ति कहते हैं, निष्काम भक्ति को अहेतुकी भक्ति कहते हैं। तुम प्यार करो या न करो फिर भी मैं तुम्हें प्यार करता हूँ – इसीका नाम है अहेतुक प्रेम!

“बात यह है, – उनसे प्रेम करना। प्रेम गहरा होने पर दर्शन होता है। पति पर सती का आकर्षण, सन्तान पर माँ का आकर्षण और विषयप्रिय व्यक्ति का सांसारिक विषयों के प्रति आकर्षण – ये तीन आकर्षण यदि एक ही साथ हो तो ईश्वर का दर्शन होता है।”

जयगोपाल विषयप्रिय व्यक्ति है, क्या इसीलिए श्रीरामकृष्ण उन्हीं के योग्य ये सब उपदेश दे रहे हैं?

ज्ञान-पथ और विचार-पथ। भक्तियोग और ब्रह्मज्ञान

श्रीरामकृष्ण अपने कमरे में बैठे हुए हैं। रात के आठ बजे होंगे। आज पूस की शुक्ला पञ्चमी है; बुधवार, २ जनवरी, १८८४। कमरे में राखाल और मणि हैं। श्रीरामकृष्ण के साथ रहने का मणि का आज इक्कीसवाँ दिन है।

श्रीरामकृष्ण ने मणि को तर्क-विचार करने से मना किया है।

श्रीरामकृष्ण – (राखाल से) – ज्यादा तर्क-विचार करना अच्छा नहीं। पहले ईश्वर है, फिर संसार। उन्हें पा लेने पर उनके संसार के सम्बन्ध में भी ज्ञान हो जाता है।

(मणि और राखाल से) “यदु मल्लिक से बातचीत करने पर उसके कितने मकान हैं, कितने बगीचे हैं, कम्पनी के कागजात कितने हैं – यह सब समझ में आ जाता है।

“इसीलिए तो ऋषियों ने वाल्मीकि को ‘मरा-मरा’ जपने के लिए उपदेश दिया था। इसका एक विशेष अर्थ है। ‘म’ का अर्थ है ईश्वर और ‘रा’ का अर्थ संसार, – पहले ईश्वर, फिर संसार।

“कृष्णकिशोर ने कहा था, ‘मरा-मरा’ शुद्ध मन्त्र है; क्योंकि वह ऋषि का दिया हुआ है। ‘म’ अर्थात् ईश्वर और ‘रा’ अर्थात् संसार।

“इसीलिए वाल्मीकि की तरह पहले सब कुछ छोड़कर निर्जन में व्याकुल हो रो-रोकर ईश्वर को पुकारना चाहिए। पहले आवश्यक है ईश्वर-दर्शन। उसके बाद है तर्क-विचार – शास्त्र और संसार के सम्बन्ध में।

(मणि के प्रति) “इसीलिए तुमसे कहता हूँ, अब और अधिक तर्क-विचार न करना। यही बात कहने के लिए मैं झाऊतल्ले से उठकर आया हूँ। ज्यादा तर्कविचार करने

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४२६ श्रीरामकृष्णवचनामृत २ जनवरी, १८८४

पर अन्त में हानि होती है। अन्त में हाजरा की तरह हो जाओगे। मैं रात में अकेला रास्ते पर रो-रोकर टहलता और कहता था, 'माँ, मेरी विचार-बुद्धि पर वज्रप्रहार कर दो।'

"कहो, अब तो तर्क-विचार न करोगे?"

मणि – जी नहीं।

श्रीरामकृष्ण – भक्ति से ही सब कुछ प्राप्त होता है। जो लोग ब्रह्मज्ञान चाहते हैं, यदि वे भक्तिमार्ग पकड़े रहें, तो उन्हें ब्रह्मज्ञान भी हो जाता है।

"उनकी दया रहने पर क्या कभी ज्ञान का अभाव भी होता है? उस देश में (कामारपुकुर में) धान नापते हैं। जब राशि चुक जाती है, तब एक आदमी और धान ठेल देता है, इस तरह राशि फिर तैयार हो जाती है। माँ ही ज्ञान की राशि पूरी करती जाती हैं।

"उन्हें प्राप्त कर लेने पर पण्डितगण सब घास-पात की तरह जान पड़ते हैं। पद्मलोचन ने कहा था, तुम्हारे साथ अछूतों के घर की सभा में भी जाऊँगा, इसमें भला हर्ज ही क्या है? – तुम्हारे साथ चमार के यहाँ भी जाकर मैं भोजन कर सकता हूँ।

"भक्ति के द्वारा सब मिलते हैं। उन्हें प्यार कर सकने पर फिर किसी चीज का अभाव नहीं रह जाता। माता भगवती के पास कार्तिकेय और गणेश बैठे हुए थे। उनके गले में मणियों की माला पड़ी थी। माता ने कहा, जो पहले इस ब्रह्माण्ड की परिक्रमा करके आ जायगा, उसी को मैं यह माला दे दूँगी। कार्तिक उसी समय फौरन ही मयूर पर चढ़कर चल दिये। गणेश ने धीरे-धीरे माता की परिक्रमा करके उन्हें प्रणाम किया। गणेश जानते थे, माता के भीतर ही ब्रह्माण्ड है। माँ ने प्रसन्न होकर गणेश को हार पहना दिया। बड़ी देर बाद कार्तिक ने आकर देखा कि उनके दादा हार पहने हुए बैठे थे।

"मैंने माँ से रो-रोकर कहा था, 'माँ! वेद-वेदान्त में क्या है, मुझे बता दो, – पुराण-तन्त्रों में क्या है, मुझे बता दो।'

"उन्होंने मुझे सब कुछ बता दिया है – कितनी बातें दिखायी हैं।

"सच्चिदानन्द गुरु को रोज प्रातःकाल पुकारते हो न?"

मणि – जी हाँ।

श्रीरामकृष्ण – गुरु कर्णधार हैं। फिर देखा, 'मैं' एक अलग हूँ, 'तुम' एक अलग। फिर कूदा और मछली बन गया। देखा कि सच्चिदानन्द-समुद्र में आनन्दपूर्वक विचर रहा हूँ।

"ये सब बड़ी ही गुह्य कथाएँ हैं। तर्क-विचार करके क्या समझोगे? वे जब दिखा देते हैं, तब सब प्राप्त होता है, किसी वस्तु का अभाव नहीं रहता।"

शुक्रवार, ४ जनवरी १८८४ ई.। दिन के चार बजे के समय श्रीरामकृष्ण पंचवटी में बैठे हैं। मुख पर हँसी है और साथ हैं मणि, हरिपद आदि। हरिपद के साथ स्व. आनन्द चॅटर्जी के बारे में बातें हो रही हैं और घोषपाड़ा के साधन-भजन की बातें।

२ जनवरी, १८८४ | परिच्छेद ७३ | ४२७

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२ जनवरी, १८८४ | परिच्छेद ७३ | ४२७

धीरे-धीरे श्रीरामकृष्ण अपने कमरे में आकर बैठे हैं। मणि, हरिपद, राखाल आदि भक्तगण भी उनके साथ रहते हैं। मणि अधिक समय बेलतला में रहते हैं।

साधनाकाल में श्रीरामकृष्ण के दर्शन

श्रीरामकृष्ण – एक दिन दिखाया चारों ओर शिव और शक्ति! शिव और शक्ति का रमण! मनुष्यों, जीव-जन्तुओं, वृक्षों और लताओं – सभी में वही शिव और शक्ति – पुरुष और प्रकृति – सर्वत्र इन्हीं का रमण।

“दूसरे दिन दिखाया कि नर-मुण्डों की राशि लगी हुई है! – पर्वताकार – और कहीं कुछ नहीं! उनके बीच में मैं अकेला बैठा हुआ हूँ।

“और एक बार दिखाया, महासमुद्र, मैं नमक का पुतला होकर उसकी थाह लेने जा रहा हूँ! थाह लेते समय श्रीगुरुकृपा से पत्थर बन गया! देखा, एक जहाज़ आ रहा है, बस उमड़ पड़ा! – श्रीगुरुदेव कर्णधार थे।”

श्रीरामकृष्ण – (मणि के प्रति) – और अधिक विचार न करो। उससे अन्त में हानि होती है। उन्हें बुलाते समय किसी एक भाव का सहारा लेना पड़ता है – सखीभाव, दासीभाव, सन्तानभाव या वीरभाव।

“मेरा सन्तानभाव है। इस भाव को देखने पर मायादेवी रास्ता छोड़ देती हैं – शर्म से!

“वीरभाव बहुत कठिन है। शाक्त तथा वैष्णव बाउलों का है। उस भाव में स्थिर रहना बहुत कठिन है। फिर हैं – शान्त, दास्य, सख्य और वात्सल्य तथा मधुरभाव। मधुरभाव में – शान्त, दास्य, सख्य और वात्सल्य – सब हैं। (मणि के प्रति) तुम्हें कौन भाव अच्छा लगता है?”

मणि – सभी भाव अच्छे लगते हैं।

श्रीरामकृष्ण – सब भाव सिद्ध स्थिति में अच्छे लगते हैं। उस स्थिति में काम की गन्ध तक नहीं रहेगी। वैष्णव-शास्त्र में चण्डीदास तथा धोबिन की कथा है – उनके प्रेम में काम की गन्ध तक न थी।

“इस स्थिति में प्रकृतिभाव होता है।

“अपने को पुरुष मानने की बुद्धि नहीं रहती। मीराबाई के स्त्री होने के कारण रूप गोस्वामीजी उनसे मिलना नहीं चाहते थे। मीराबाई ने कहला भेजा, ‘श्रीकृष्ण ही एकमात्र पुरुष है; वृन्दावन में सभी लोग उस पुरुष की दासियाँ हैं।’ क्या गोस्वामीजी को पुरुषत्व का अभिमान करना उचित था?

सायंकाल के बाद मणि फिर श्रीरामकृष्ण के चरणों के पास बैठे हैं। समाचार आया है कि श्री केशव सेन की अस्वस्थता बढ़ गयी है। उन्हीं के सम्बन्ध में वार्तालाप के

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४२८ श्रीरामकृष्णवचनामृत २ जनवरी, १८८४

सिलसिले में ब्राह्म समाज की बातें हो रही हैं।

श्रीरामकृष्ण – (मणि के प्रति) – हाँ, जी, उनके यहाँ क्या केवल व्याख्यान ही होते हैं, या ध्यान भी? वे अपनी प्रार्थना को शायद कहते हैं ‘उपासना’।

“केशव ने पहले ईसाई धर्म, ईसाई मत का बहुत चिन्तन किया था – उस समय तथा उससे पूर्व वे देवेन्द्र ठाकुर के यहाँ थे।”

मणि – केशव बाबू यदि पहले-पहल यहाँ आये होते, तो समाजसंस्कार पर माथापच्ची न करते। जातिभेद को उठा देना, विधवा विवाह, असवर्ण विवाह, स्त्री-शिक्षा आदि सामाजिक कामों में उतने व्यस्त न होते।

श्रीरामकृष्ण – केशव अब काली मानते हैं – चिन्मयी काली – आद्याशक्ति। और माँ माँ कहकर उनके नामगुणों का कीर्तन करते हैं। अच्छा, क्या ब्राह्म समाज बाद में सिर्फ सामाजिक संस्कार की ही एक संस्था बन जायगा?

मणि – इस देश की जमीन वैसी नहीं है। जो ठीक है वही यहाँ पर जड़ पा सकेगा।

श्रीरामकृष्ण – हाँ, सनातन धर्म, ऋषिलोग जो कुछ कह गये हैं वही रह जायगा। तथापि ब्राह्म समाज और उसी प्रकार के सम्प्रदाय भी कुछ-कुछ रहेंगे। सभी ईश्वर की इच्छा से हो रहे हैं, जा रहे हैं।

दोपहर के बाद कलकत्ते से कुछ भक्त आये हैं। उन्होंने श्रीरामकृष्ण को अनेक गीत सुनाये थे। उनमें से एक गीत का भावार्थ यह है – ‘माँ, तुमने हमारे मुँह में लाल चुसनी देकर भुला रखा है; हम जब चुसनी फेंककर चिल्लाकर रोयेंगे तब तुम हमारे पास अवश्य ही दौड़कर आओगी।’

श्रीरामकृष्ण – (मणि के प्रति) – उन्होंने लाल चुसनी का नया ही गाना गाया।

मणि – जी, आपने केशव सेन से इस लाल चुसनी की बात कही थी।

श्रीरामकृष्ण – हाँ, और चिदाकाश की बात – और भी कई बातें हुआ करती थीं – और बड़ा आनन्द होता था। गाना – नृत्य सब होता था।

□ □ □

परिच्छेद ७४

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परिच्छेद ७४

मणि के प्रति उपदेश

(१)

कामिनी-काञ्चन-त्याग

श्रीरामकृष्ण दोपहर का भोजन कर चुके हैं। एक बजे का समय होगा। शनिवार, ५ जनवरी १८८४ ई.। मणि को श्रीरामकृष्ण के साथ रहते हुए आज २३ वाँ दिन है।

मणि भोजन करके नौबतखाने में थे, वहीं से किसी को नाम लेकर पुकारते हुए सुना। बाहर आकर उन्होंने देखा कि घर के उत्तरवाले लम्बे बरामदे से श्रीरामकृष्ण स्वयं उन्हें पुकार रहे थे। मणि ने आकर उन्हें प्रणाम किया।

दक्षिण के बरामदे में श्रीरामकृष्ण मणि से वार्तालाप कर रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण – तुम लोग किस तरह ध्यान करते हो? – मैं तो बेल के नीचे कितने ही रूप साफ साफ देखता था। एक दिन देखा, सामने रुपये, दुशाला, एक थाल, सन्देश और दो औरतें! तब मैंने मन से पूछा, मन! तू इनमें से कुछ चाहता है? – फिर सन्देशों को देखा, विष्ठा है! औरतों में एक बुलाक पहने हुए थी। उनका भीतर बाहर सब मुझे दीख पड़ता था – आँतें-मल-मूत्र-हाड़-मांस-खून! मन ने कुछ न चाहा।

“मन उन्हीं के पाद-पद्मों में लगा रहा। निक्ती (काँटेवाला तराजू) के नीचे भी काँटा होता है और ऊपर भी। मन नीचेवाला काँटा है। मुझे सदा ही भय लगा रहता था कि कहीं ऐसा न हो कि ऊपरवाले काँटे से (ईश्वर से) मन विमुख हो जाय। तिस पर एक आदमी सदा ही हाथ में त्रिशूल लिये मेरे पास बैठा रहता था। उसने डराया, कहा, नीचेवाला काँटा ऊपरवाले काँटे से इधर-उधर झुका नहीं कि यही त्रिशूल भोंक दूँगा।

“बात यह है कि कामिनी-कांचन का त्याग हुए बिना कुछ होने का नहीं। मैंने तीन त्याग किये थे – जमीन, जोरू और रुपया। भगवान रघुवीर के नाम की जमीन रजिस्ट्री कराने के लिए मुझे उस देश में (कामारपुकुर में) जाना पड़ा था। मुझसे दस्तखत करने के लिए कहा गया। मैंने दस्तखत नहीं किये। मुझे यह ख्याल था ही नहीं कि यह मेरी जमीन है। रजिस्ट्री आफिसवालों ने केशव सेन का गुरु समझकर मेरा खूब आदर किया था। आम ला दिये, परन्तु घर ले जाने का अख्तियार था ही नहीं, क्योंकि संन्यासी को संचय नहीं

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४३० श्री श्रीरामकृष्णवचनामृत ५ जनवरी, १८८४

करना चाहिए।

“त्याग के बिना कोई कैसे उन्हें पा सकता है? अगर एक वस्तु के ऊपर दूसरी वस्तु रखी हो, तो पहली वस्तु को बिना हटाये दूसरी वस्तु कैसे मिल सकती है?

“निष्काम होकर उन्हें पुकारना चाहिए। परन्तु सकाम भजन करते करते भी निष्काम भजन होता है। ध्रुव ने राज्य के लिए तपस्या की थी, परन्तु उन्होंने ईश्वर को प्राप्त किया था। उन्होंने कहा था, अगर कोई काँच के लिए आकर कांचन पा जाय तो उसे क्यों छोड़े?

दया-दान आदि और श्रीरामकृष्ण। श्रीचैतन्य देव का दान

“सत्त्वगुण के पाने पर मनुष्य ईश्वर को पाता है। संसारी मनुष्यों के दानादि कर्म प्रायः सकाम ही होते हैं। यह अच्छा नहीं। निष्काम कर्म करना ही अच्छा है। परन्तु निष्काम भाव से करना है बड़ा कठिन।

“ईश्वर से भेंट होने पर क्या उनसे यह प्रार्थना करोगे कि मैं कुछ तालाब खुदवाऊँगा? या रास्ता, घाट, दवाखाना और अस्पताल बनवाऊँगा? क्या उनसे कहोगे, हे ईश्वर, मुझे ऐसा वर दीजिये कि मैं यही सब करूँ? उनका दर्शन होने पर ये सब वासनाएँ एक ओर पड़ी रहती हैं।

“परन्तु इसलिए क्या दया और दान के कर्म ही न करना चाहिए?

“नहीं, यह बात नहीं। आँखों के आगे दुःख और विपत्ति देखकर धन के रहते सहायता आवश्यक करनी चाहिए। ऐसे समय ज्ञानी कहता है, 'दे, इसे कुछ दे।' परन्तु भीतर ही भीतर 'मैं क्या कर सकता हूँ - कर्ता ईश्वर ही हैं, अन्य सब अकर्ता हैं' - ऐसा बोध उसे होता रहता है।

“महापुरुषगण जीवों के दुःख से दुःखी होकर उन्हें ईश्वर का मार्ग बतला जाते हैं। शंकराचार्य ने जीवों की शिक्षा के लिए 'विद्या का अहं' रखा था।

“अन्नदान की अपेक्षा ज्ञानदान और भक्तिदान अधिक ऊँचा है। चैतन्यदेव ने इसीलिए चाण्डालों तक में भक्ति का वितरण किया था। देह का सुख और दुःख तो लगा ही है। यहाँ आम खाने के लिए आये हो, आम खा जाओ। आवश्यकता ज्ञान और भक्ति की है। ईश्वर ही वस्तु है, और सब अवस्तु।

क्या स्वाधीन इच्छा (Free Will) है? श्रीरामकृष्ण का सिद्धान्त

“सब कुछ वे ही कर रहे हैं। अगर यह कहो कि सब कुछ उनके मत्थे मढ़कर फिर तो मनुष्य खूब पाप कर सकता है, तो यह ठीक न होगा; क्योंकि जिसने यह समझा है कि ईश्वर ही कर्ता है और जीव अकर्ता, उसका पैर कभी बेताल नहीं पड़ सकता।

“इंग्लिशमैन जिसे स्वाधीन इच्छा (Free Will) कहते हैं, वह उन्हींने दे रखी है।

“जिन लोगो ने उन्हें नहीं पाया, उनमें अगर इस स्वाधीन इच्छा का बोध न होता

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५ जनवरी, १८८४ | परिच्छेद ७४ | ४३१

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५ जनवरी, १८८४परिच्छेद ७४४३१

तो उनसे पाप की वृद्धि हो सकती थी। अपने दोषों से मैं पाप कर रहा हूँ – यह ज्ञान अगर उन्होंने न दिया होता तो पाप की और भी वृद्धि होती।

“जिन्होंने उन्हें पा लिया है, वे जानते हैं स्वाधीन इच्छा नाममात्र की है। वास्तव में वे ही यन्त्री हैं, मैं केवल यन्त्र हूँ; वे इंजिनियर हैं, मैं गाड़ी!”

(२)

दिन का पिछला पहर हैं। चार बजे का समय होगा। पंचवटीवाले कमरे में श्रीयुत राखाल तथा और भी दो-एक भक्त मणि का कीर्तन सुन रहे हैं।

गाना सुनकर राखाल को भावावेश हो गया है।

कुछ देर बाद श्रीरामकृष्ण पंचवटी में आये। उनके साथ बाबूराम और हरीश हैं।

राखाल – इन्होंने कीर्तन सुनाकर हम लोगों को खूब प्रसन्न किया।

श्रीरामकृष्ण भावावेश में गा रहे हैं – 'ऐ सखि, कृष्ण का नाम सुनकर मेरे जी में जी आ गया।' श्रीरामकृष्ण ने कहा, यही सब गाना चाहिए – 'सब सखि मिलि बैठला' फिर कहा – बात यही है कि भक्ति और भक्तों को लेकर रहना चाहिए।

“श्रीकृष्ण के मथुरा जाने पर यशोदा राधिका के पास गयी थीं। राधिका उस समय ध्यान में थीं। फिर उन्होंने यशोदा से कहा, मैं आदिशक्ति हूँ। तुम मुझसे वरयाचना करो। यशोदा ने कहा – वर और क्या दोगी, – यही कहो जिससे मन, वचन और कर्मों से उनकी सेवा कर सकूँ – इन्हीं आँखों से उनके भक्तों के दर्शन हों – इस मन से उनका ध्यान और उनका चिन्तन हो और वाणी से उनके नाम और गुणों का कीर्तन हो।

“परन्तु जिनकी भक्ति दृढ़ हो गयी है, उनके लिए भक्तों का संग न होने पर भी कुछ हर्ज नहीं है। कभी कभी तो भक्तों से विरक्ति भी हो जाती है। बहुत चिकनी दीवाल पर से चूनाकारी धस जाती है। अर्थात् वे जिनके अन्तर-बाहर सर्वत्र है, उन्हीं की यह अवस्था है।”

श्रीरामकृष्ण झाऊतल्ले से लौटकर पंचवटी के नीचे मणि से फिर कह रहे है – “तुम्हारी आवाज स्त्रियों जैसी है। तुम इस तरह के गानों का अभ्यास कर सकते हो? – (भावार्थ) सखि, वह बन कितनी दूर है जहाँ मेरे श्यामसुन्दर हैं?

(बाबूराम की ओर देखकर मणि से) “देखो, जो अपने आदमी हैं, वे पराये हो जाते हैं, – रामलाल तथा और सब लोग अब जैसे कोई दूसरे हों। फिर जो लोग दूसरे हैं, वे अपने हो जाते हैं। देखो न, बाबूराम से कहता हूँ, जंगल जा, हाथ-मुँह धो। अब तो भक्त ही अपने आत्मीय हैं।”

मणि – जी हाँ।

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४३२ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | ५ जनवरी, १८८४

चित्शक्ति और चिदात्मा

श्रीरामकृष्ण — (पंचवटी की ओर देखकर) — इस पंचवटी में मैं बैठता था — ऐसा भी समय आया कि मुझे उन्माद हो गया! वह समय भी बीत गया! काल ही ब्रह्म है। जो काल के साथ रमण करती है, वही काली है — आद्याशक्ति अटल को टाल देती हैं।

यह कहकर श्रीरामकृष्ण गाने लगे।

(भावार्थ) 'तुम्हारा भाव क्या है, यह सोचते हुए यहाँ तो प्राण ही निकलने पर आ गये! जिनके नाम से काल भी दूर हट जाता है, जिनके पैरों के नीचे महाकाल पड़े हुए हैं, उनका स्वरूप काला क्यों हुआ?'

श्रीरामकृष्ण — आज शनिवार है, आज काली मन्दिर जाना।

बकुल के पेड़ के नीचे आकर श्रीरामकृष्ण मणि से कह रहे हैं — "चिदात्मा और चित्-शक्ति। चिदात्मा पुरुष हैं और चित्-शक्ति प्रकृति। चिदात्मा श्रीकृष्ण हैं और चित्-शक्ति श्रीराधा। भक्तगण उसी चित्-शक्ति के एक-एक स्वरूप हैं। वे सखी-भाव या दासभाव को लेकर रहेंगे। यही असली बात है।"

सन्ध्या हो जाने पर श्रीरामकृष्ण काली-मन्दिर गये। मणि माता का स्मरण कर रहे हैं, यह देखकर श्रीरामकृष्ण प्रसन्न हुए।

सब देवालयों में आरती हो गयी। श्रीरामकृष्ण अपने कमरे में तख्त पर बैठे हुए माता का स्मरण कर रहे हैं। जमीन पर सिर्फ मणि बैठे हैं। श्रीरामकृष्ण समाधिस्थ हो गये हैं।

कुछ देर बाद वे समाधि से उतरने लगे; परन्तु फिर भी अभी भाव पूर्ण मात्रा में हैं। श्रीरामकृष्ण माँ से बातचीत कर रहे हैं, जैसे छोटा बच्चा माँ से दुलार करते हुए बातचीत करता है। माँ से करुण स्वर में कह रहे हैं — "माँ, क्यों तूने वह रूप नहीं दिखाया — वही भुवन-मोहन रूप! कितना मैंने तुझसे कहा। परन्तु कहने से तू सुनेगी काहे को? — तू इच्छामयी जो है।"

श्रीरामकृष्ण ने माँ से ऐसे स्वर में ये बातें कहीं कि जिसे सुनकर पत्थर भी पिघलकर पानी हो जाय!

श्रीरामकृष्ण फिर माँ से बातचीत कर रहे हैं —

"माँ! विश्वास चाहिए! यह साला तर्क-विचार दूर हो जाय! — उसका भरोसा क्या? वह तो जरा-सी बात से बदल जाता है! विश्वास चाहिए — गुरुवाक्य में विश्वास — बालक जैसा विश्वास! — माँ ने कहा, वहाँ भूत है — तो उसने ठीक समझ रखा है कि वहाँ भूत है! माँ ने कहा, वहाँ हौआ है! तो इसीको उसने ठीक समझ रखा है। माँ ने कहा, वह तेरा दादा है, तो समझ लिया कि बस सोलहों आने दादा है! विश्वास चाहिए!

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५ जनवरी, १८८४ परिच्छेद ७४ ४३३

"परन्तु माँ उन्हीं का क्या दोष है! वे क्या करेंगे! विचार एक बार तो कर लेना चाहिए! देखो न, अभी उस दिन इतना समझाकर कहा, परन्तु कुछ न हुआ - आज बिलकुल ...”

श्रीरामकृष्ण माँ के पास करुणापूर्ण गद्गद स्वर से रोते हुए प्रार्थना कर रहे हैं। क्या आश्चर्य है! भक्तों के लिए माँ के पास रो रहे हैं - "माँ, तुम्हारे पास जो लोग आते हैं उनका मनोरथ पूर्ण करो! - सब त्याग न करना, माँ! अच्छा, अन्त में जैसा तुम्हें समझ पड़े करना!

"माँ, संसार में अगर रखना तो एक एक बार दर्शन देना। नहीं तो कैसे रहेंगे? एक एक बार दर्शन दिये बिना उत्साह कैसे होगा, माँ! - इसके बाद अन्त में चाहे जो करना।"

श्रीरामकृष्ण अब भी भावावेश में हैं। उसी अवस्था में एकाएक मणि से कह रहे हैं - “देखो तुमने जो कुछ विचार किया वह बहुत हो गया है। अब बस करो। कहो, अब तो विचार नहीं करोगे?”

मणि हाथ जोड़कर कह रहे हैं "जी नहीं, अब नहीं करूँगा।"

श्रीरामकृष्ण - बहुत हो चुका! - तुम्हारे आते ही तो मैंने तुम्हें बतला दिया था - तुम्हारा आध्यात्मिक ध्येय। मैं यह सब तो जानता हूँ।

मणि - (हाथ जोड़कर) - जी हाँ।

श्रीरामकृष्ण - तुम्हारा ध्येय, तुम कौन हो, तुम्हारा अन्दर और बाहर, तुम्हारी पहले की बातें, आगे तुम्हारा क्या होगा यह सब मैं तो जानता हूँ।

मणि - (हाथ जोड़े हुए) - जी हाँ।

श्रीरामकृष्ण - तुम्हारे लड़के हुए हैं, सुनकर तुम्हें फटकारा था - अब जाकर घर में रहो - उन्हें दिखाना कि तुम उनके अपने आदमी हो, परन्तु भीतर से समझे रहना, तुम भी उनके अपने नहीं हो और वे भी तुम्हारे अपने नहीं।

मणि चुपचाप बैठे हैं। श्रीरामकृष्ण फिर कहने लगे -

"अपने पिता को सन्तुष्ट रखना। अब उड़ना सीखा हैं तो भी उनसे प्रेम रखना। तुम अपने पिता को साष्टांग प्रणाम कर सकोगे न?

मणि - (हाथ जोड़े हुए) - जी हाँ।

श्रीरामकृष्ण - तुम्हें और क्या कहूँ, तुम तो सब जानते हो - सब समझ गये हो। (मणि चुपचाप बैठे हैं।)

श्रीरामकृष्ण - सब समझ गये हो न?

मणि - जी हाँ, कुछ कुछ समझा हूँ।

श्रीरामकृष्ण - नहीं, तुम्हारी समझ में बहुत कुछ आता है। राखाल यहाँ है, इससे उसके पिता को सन्तोष है।

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४३४श्रीरामकृष्णवचनामृत५ जनवरी, १८८४

मणि हाथ जोड़े चुपचाप बैठे हैं।

श्रीरामकृष्ण फिर कह रहे हैं - तुम जो कुछ सोच रहे हो, वह भी हो जायगा।

श्रीरामकृष्ण अब अपनी साधारण दशा में आ गये हैं। कमरे में राखाल और रामलाल बैठे हैं। रामलाल से उन्होंने गाने के लिए कहा। रामलाल ने दो गाने गाये।

श्रीरामकृष्ण - माँ और जननी। जो संसार के रूप में सर्वव्यापिनी हैं वे माँ हैं, और जो जन्मस्थान हैं वे जननी। माँ कहते ही मुझे समाधि हो जाती थी। - माँ कहते हुए मानो जगज्जननी को आकर्षित कर लेता था! जैसे धीवर जाल फेंकते हैं, फिर बड़ी देर बाद जाल खींचते रहते हैं। फिर उसमें बड़ी-बड़ी मछलियाँ आ जाती हैं।

गौरी पण्डित का कथन। काली और श्रीगौरांग एक हैं।

“गौरी ने कहा था, काली और श्रीगौरांग को एक समझने पर ज्ञान पक्का होगा। जो ब्रह्म हैं, वही शक्ति काली है, वही नर के स्वरूप में श्रीगौरांग हैं।”

श्रीरामकृष्ण की आज्ञा पाकर रामलाल ने फिर गाना शुरू किया। गाना समाप्त होने पर श्रीरामकृष्ण ने मणि से कहा - “जो नित्य हैं, उन्हीं की लीला है - भक्तों के लिए। उन्हें जब नररूप में देख लेंगे तभी तो भक्त उन्हें प्यार कर सकेंगे? तभी तो उन्हें भाई, बहन, माँ, बाप और सन्तान की तरह प्यार कर सकेंगे? वे भक्तों की प्रीति के कारण छोटे होकर लीला करने के लिए आते हैं।”

□ □ □

परिच्छेद ७५

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परिच्छेद ७५

ईश्वर-दर्शन के लिए व्याकुलता

(१)

दक्षिणेश्वर में राखाल, लाटू, मास्टर, महिमा आदि के साथ

श्रीरामकृष्ण दक्षिणेश्वर-मन्दिर में अपने उसी कमरे में हैं। दिन के तीन बजे होंगे। आज शनिवार है, ता. २ फरवरी १८८४।

एक दिन श्रीरामकृष्ण भावावेश में झाऊतल्ले की ओर जा रहे थे। साथ में किसी के न रहने के कारण रेलिंग के पास गिर गये। इससे उनके बायें हाथकी हड्डी हट गयी और गहरी चोट आ गयी। मास्टर कलकत्ते से चोट में बाँधने का सामान लेने गये हैं।

श्रीयुत राखाल, महिमाचरण, हाजरा आदि भक्त कमरे में बैठे हैं। मास्टर ने आकर भूमिष्ठ हो श्रीरामकृष्ण को प्रणाम किया।

श्रीरामकृष्ण – क्यों जी, तुम्हें कौनसी बीमारी हुई थी? अब तो अच्छे हो न?

मास्टर – जी हाँ।

श्रीरामकृष्ण – (महिमाचरण से) – क्यों जी, यहाँ का भाव है, 'तुम यन्त्री हो – मैं यन्त्र हूँ।' फिर भी इस तरह क्यों हुआ?

श्रीरामकृष्ण खाट पर बैठे हैं। महिमाचरण अपने तीर्थ-दर्शन की बातें कह रहे हैं। श्रीरामकृष्ण सुन रहे हैं। बारह वर्ष पहले का तीर्थ-दर्शन।

महिमाचरण – काशी, सिकरौल में एक बगीचे में मैंने एक ब्रह्मचारी देखा। उसने कहा, इस बगीचे में मैं बीस साल से हूँ। परन्तु किसका बगीचा है, वह नहीं जानता था। मुझसे पूछा, क्यों बाबू, नौकरी करते हो? मैंने कहा – नहीं। तब उसने कहा, तो क्या परिव्राजक हो?

"नर्मदा-तट पर एक साधू देखा था। अन्तर में गायत्री का जप कर रहे थे, शरीर पुलकायमान हो रहा था! और वे इस तरह प्रणव और गायत्री का उच्चारण कर रहे थे कि सुननेवालों को भी रोमांच हो रहा था।"

श्रीरामकृष्ण का बालकों का सा स्वभाव है – भूख लगी है; मास्टर से कह रहे हैं, "क्यों कुछ लाये हो?" राखाल को देखकर श्रीरामकृष्ण समाधिमग्न हो गये।

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४३६ श्रीरामकृष्णवचनामृत २ फरवरी, १८८४

समाधि छूट रही है। प्रकृतिस्थ होने के लिए श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं - 'मैं जलेबी खाऊँगा', 'मैं जल पिऊँगा।'

बालस्वभाव श्रीरामकृष्ण जगन्माता से रोकर कह रहे हैं - 'ब्रह्ममयी! मुझे ऐसा क्यों कर दिया? मेरे हाथ में बड़ा दर्द हो रहा है!' (राखाल, महिमाचरण, हाजरा आदि के प्रति) - 'मेरा दर्द अच्छा हो जायगा?' भक्तगण, छोटे लड़के को जिस तरह लोग समझाते हैं, उसी तरह कहने लगे - 'अच्छा क्यों न होगा?'

श्रीरामकृष्ण - (राखाल से) - यद्यपि तू शरीर-रक्षा के लिए है, तथापि तेरा दोष नहीं, क्योंकि तू रहने पर भी रेलिंग तक तो जाता नहीं।

श्रीरामकृष्ण फिर भावाविष्ट हो गये। भावावेश में ही कह रहे हैं - 'ॐ, ॐ, ॐ, - माँ, मैं क्या कह रहा हूँ! माँ, मुझे ब्रह्मज्ञान देकर बेहोश न करना। मैं तेरा बच्चा जो हूँ! - डरता हूँ - मुझे माँ चाहिए। ब्रह्मज्ञान को मेरा कोटि कोटि नमस्कार! वह जिसे देना हो उसे दो। आनन्दमयी! - आनन्दमयी!'

श्रीरामकृष्ण उच्च स्वर से आनन्दमयी, आनन्दमयी कहकर रो रहे हैं और कह रहे हैं - 'इसीलिए तो मुझे दुःख है कि तुम जैसी माँ के रहते, मेरे जागते, घर में चोरी हो जाय।'

श्रीरामकृष्ण फिर माँ से कह रहे हैं - 'माँ, मैंने क्या अन्याय किया है? - क्या मैं कुछ करता हूँ, माँ! तू ही तो सब कुछ करती है। मैं यन्त्र हूँ, तू यन्त्री। (राखाल के प्रति हँसते हुए) देखना, तू कहीं गिर न जाना, अभिमानवश स्वयं को कहीं ठगना नहीं।'

श्रीरामकृष्ण माँ से फिर कह रहे हैं - "माँ, चोट लग जाने से मैं रोता हूँ? - नहीं। मैं तो इसलिए रोता हूँ कि 'तुम जैसी माँ के रहते, मेरे जागते, घर में चोरी हो।' "

(२)

ईश्वर को किस प्रकार पुकारना चाहिए। व्याकुल होओ।

श्रीरामकृष्ण बच्चे की तरह फिर हँस रहे हैं और बातचीत कर रहे हैं - जैसे बालक ज्यादा बीमार पड़ने पर भी कभी कभी हँसी-खेल की ओर चला जाता है। श्रीरामकृष्ण महिमा आदि भक्तों से बातचीत कर रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण - सच्चिदानन्द को प्राप्त नहीं किया तो कुछ न हुआ, भाई।

"विवेक और वैराग्य के सदृश और दूसरी चीज नहीं है।

"संसारियों का अनुराग क्षणिक है। तभी तक है जब तक तपे हुए तवे पर पानी रहता है! - कभी शायद एक फूल को देखकर कह दिया - अहा! ईश्वर की कैसी विचित्र सृष्टि है!

२ फरवरी १८८४ | परिच्छेद ७५ | ४३७

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२ फरवरी १८८४परिच्छेद ७५४३७

“व्याकुलता चाहिए। जब लड़का सम्पत्ति का अपना हिस्सा अलग कर देने के लिए अपने माँ-बाप को परेशान करने लगता है तब माँ-बाप दोनों आपस में सलाह करके लड़के का हिस्सा तुरन्त दे देते हैं। व्याकुल होने से ईश्वर जरूर सुनेंगे। जब उन्होंने हमें पैदा किया है, तब सम्पत्ति में हमारा भी हिस्सा है। वे अपने बाप, अपनी माँ हैं – उन पर अपना जोर चल सकता है। हम उनसे कह सकते हैं, ‘मुझे दर्शन दो, नहीं तो गले में छुरी मार लूँगा'।”

किस तरह माँ को पुकारना चाहिए, श्रीरामकृष्ण बतला रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण – मैं माँ को इस तरह पुकारता था – माँ आनन्दमयी, तुम्हें दर्शन देना होगा।

“फिर कभी कहता था – हे दीनानाथ! जगन्नाथ! मैं जगत् से अलग थोड़े ही हूँ? मैं ज्ञानहीन हूँ, भक्तिहीन हूँ, साधनहीन हूँ, मैं कुछ भी नहीं जानता – कृपा करके दर्शन देना होगा!”

श्रीरामकृष्ण अत्यन्त करुण स्वर में गाने के ढंग पर बतला रहे हैं, किस तरह उन्हें पुकारना चाहिए। वह करुण स्वर सुनकर भक्तों का हृदय द्रवीभूत हो रहा है, महिमाचरण की आँखों से धारा बह रही है।

महिमाचरण को देखकर श्रीरामकृष्ण फिर कह रहे हैं – “मन! जिस तरह पुकारना चाहिए, उसी तरह तुम पुकारो तो सही, फिर देखो, कैसे श्यामा रह सकती है!”

(३)

सदसद्-विचार

कुछ भक्त शिवपुर से आये हैं। वे लोग इतनी दूर से कष्ट उठाकर आये हैं, श्रीरामकृष्ण और अधिक चुप न रह सके। चुनी हुई बातें उनसे कह रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण – (शिवपुर के भक्तों से) – ईश्वर ही सत्य है, और सब अनित्य। बाबू और बगीचा। ईश्वर और उनका ऐश्वर्य। लोग बगीचा ही देख लेते हैं, पर बाबू को कितने लोग देखना चाहते हैं?

भक्त – अच्छा, फिर उपाय क्या है?

श्रीरामकृष्ण – सदसद्-विचार। वे ही सत्य हैं और सब अनित्य, इसका सर्वदा विचार करना, और व्याकुल होकर उन्हें पुकारना।

भक्त – जी, समय कहाँ है?

श्रीरामकृष्ण – जिन्हें समय है वे ध्यान-भजन करेंगे।

“जो लोग बिलकुल कुछ न कर सकें वे दोनों समय भक्तिपूर्वक दो बार प्रणाम करें। वे भी तो अन्तर्यामी हैं, वे समझते हैं कि ये क्या करते हैं। तुम्हें कितने ही काम हैं। तुम्हें

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४३८श्रीरामकृष्णवचनामृत२ फरवरी, १८८४

पुकारने का समय नहीं, तो उन्हें आममुख्तारी दे दो; परन्तु अगर उन्हें पा न सके, उनके दर्शन न कर सके, तो कुछ न हुआ।”

एक भक्त – आपको देखना और ईश्वर को देखना बराबर है।

श्रीरामकृष्ण – यह बात अब फिर न कहो। गंगा की ही तरंग है, परन्तु तरंगों की गंगा नहीं। मैं इतना बड़ा आदमी हूँ, मैं अमुक हूँ – यह सब अहंकार बिना गये उन्हें कोई पा नहीं सकता। ‘मैं’ रूपी मेंड़ को भक्ति के आँसुओं से भिगोकर बराबर जमीन बना दो।

संसार क्यों है? भोग के अन्त में व्याकुलता तथा ईश्वरलाभ

भक्त – संसार में क्यों उन्होंने रखा है?

श्रीरामकृष्ण – सृष्टि के लिए रखा है, उनकी इच्छा। उनकी माया। कामिनी-कांचन देकर उन्होंने रखा है।

भक्त – क्यों भुलाकर रखा है? क्या उनकी यह इच्छा है?

श्रीरामकृष्ण – वे अगर ईश्वरीय आनन्द एक बार दे दें तो फिर कोई संसार में ही न रहे – फिर सृष्टि ही न चले!

“चावल की आढ़त में बड़ी-बड़ी गोदामों में चावल रहता है। चावल का पता कहीं चूहों को ना लग जाय इस डर से दूकानदार गोदाम के सामने एक ओर गुड़ मिलाकर लावे (खीलें) रख देता है। मीठा लगने से चूहे रात भर वही खाते रहते हैं। चावल की खोज के लिए उतावले होते ही नहीं।

“परन्तु देखो, सेर भर चावल के १४ सेर लावे होते हैं। कामिनी-कांचन के आनन्द से ईश्वर का आनन्द कितना अधिक है! उनके स्वरूप का चिन्तन करने से रम्भा और तिलोत्तमा का रूप चिता की भस्म के समान जान पड़ता है।”

भक्त – उन्हें पाने के लिए व्याकुलता क्यों नहीं होती?

श्रीरामकृष्ण – भोग का अन्त हुए बिना व्याकुलता नहीं होती। कामिनी-कांचन की भोग-वासना जितनी है, उनकी तृप्ति हुए बिना जगन्माता की याद नहीं आती। बच्चा जब खेल में लगा रहता है तब वह माँ को नहीं चाहता। खेल समाप्त हो जाने पर वह कहता है – अम्मा के पास जाऊँगा। हृदय का लड़का कबूतर लेकर खेल रहा था, ‘आ-ती-ती’ करके कबूतर को बुला रहा था। जब उसे खेल से तृप्ति हो गयी तब उसने रोना शुरू कर दिया। तब एक बिना पहचान के आदमी ने आकर कहा – ‘आ, तुझे तेरी माँ के पास ले चलूँ।’ वह उसी के कन्धे पर चढ़कर चला गया, अनायास ही।

“जो नित्य-सिद्ध है, उन्हे संसार में नहीं घुसना पड़ता। जन्म से ही उनकी भोग-वासना मिट गयी है।”

पाँच बजे का समय है। मधु डाक्टर आये हैं। श्रीरामकृष्ण के हाथ में पटरियाँ