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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

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DevanagariHindipublished711 pages

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४२२ श्रीरामकृष्णवचनामृत · ३० दिसम्बर, १८८३

कमरे में बैठे हुए माता का चिन्तन कर रहे हैं। कुछ देर बाद मन्दिर में आरती का मधुर शब्द सुनायी पड़ने लगा।

रात के आठ बज चुके हैं। श्रीरामकृष्ण भाव में आकर मधुर स्वर से माता के साथ वार्तालाप कर रहे हैं। मणि जमीन पर बैठे हुए हैं।

श्रीरामकृष्ण मधुर कण्ठ से नामोच्चारण कर रहे हैं – “हरि ॐ! हरि ॐ! हरि ॐ!”

माँ से कह रहे हैं – “माँ! ब्रह्मज्ञान देकर मुझे बेहोश न कर रखना। मैं ब्रह्मज्ञान नहीं चाहता माँ! मैं आनन्द करूँगा! विलास करूँगा!”

फिर कहते हैं – “माँ, मैं वेदान्त नहीं जानता – जानना भी नहीं चाहता! माँ, तुझे पाने पर वेद-वेदान्त कितने नीचे पड़े रहते हैं!”

“अरे कृष्ण! मैं तुझे कहूँगा, ‘यह ले – खा ले – बच्चे!’ कृष्ण! कहूँगा, ‘तू मेरे ही लिए देहधारण करके आया है।’ ”