श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
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Read in context४२८ श्रीरामकृष्णवचनामृत २ जनवरी, १८८४
सिलसिले में ब्राह्म समाज की बातें हो रही हैं।
श्रीरामकृष्ण – (मणि के प्रति) – हाँ, जी, उनके यहाँ क्या केवल व्याख्यान ही होते हैं, या ध्यान भी? वे अपनी प्रार्थना को शायद कहते हैं ‘उपासना’।
“केशव ने पहले ईसाई धर्म, ईसाई मत का बहुत चिन्तन किया था – उस समय तथा उससे पूर्व वे देवेन्द्र ठाकुर के यहाँ थे।”
मणि – केशव बाबू यदि पहले-पहल यहाँ आये होते, तो समाजसंस्कार पर माथापच्ची न करते। जातिभेद को उठा देना, विधवा विवाह, असवर्ण विवाह, स्त्री-शिक्षा आदि सामाजिक कामों में उतने व्यस्त न होते।
श्रीरामकृष्ण – केशव अब काली मानते हैं – चिन्मयी काली – आद्याशक्ति। और माँ माँ कहकर उनके नामगुणों का कीर्तन करते हैं। अच्छा, क्या ब्राह्म समाज बाद में सिर्फ सामाजिक संस्कार की ही एक संस्था बन जायगा?
मणि – इस देश की जमीन वैसी नहीं है। जो ठीक है वही यहाँ पर जड़ पा सकेगा।
श्रीरामकृष्ण – हाँ, सनातन धर्म, ऋषिलोग जो कुछ कह गये हैं वही रह जायगा। तथापि ब्राह्म समाज और उसी प्रकार के सम्प्रदाय भी कुछ-कुछ रहेंगे। सभी ईश्वर की इच्छा से हो रहे हैं, जा रहे हैं।
दोपहर के बाद कलकत्ते से कुछ भक्त आये हैं। उन्होंने श्रीरामकृष्ण को अनेक गीत सुनाये थे। उनमें से एक गीत का भावार्थ यह है – ‘माँ, तुमने हमारे मुँह में लाल चुसनी देकर भुला रखा है; हम जब चुसनी फेंककर चिल्लाकर रोयेंगे तब तुम हमारे पास अवश्य ही दौड़कर आओगी।’
श्रीरामकृष्ण – (मणि के प्रति) – उन्होंने लाल चुसनी का नया ही गाना गाया।
मणि – जी, आपने केशव सेन से इस लाल चुसनी की बात कही थी।
श्रीरामकृष्ण – हाँ, और चिदाकाश की बात – और भी कई बातें हुआ करती थीं – और बड़ा आनन्द होता था। गाना – नृत्य सब होता था।
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