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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished711 pages

Page 446 of 711

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परिच्छेद ७३

ईश्वर-दर्शन के उपाय

(१)

श्रीरामकृष्ण तथा तान्त्रिक भक्त

आज पौष शुक्ला चतुर्थी है; २ जनवरी १८८४। श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ दक्षिणेश्वर के कालीमन्दिर में निवास कर रहे हैं। आजकल राखाल, लाटू, हरीश, रामलाल, मास्टर दक्षिणेश्वर में निवास कर रहे हैं।

दिन के तीन बजे का समय होगा – श्रीरामकृष्ण का दर्शन करने के लिए मणि बेलतला से उनके कमरे की ओर आ रहे हैं। वे एक तान्त्रिक भक्त के साथ पश्चिम के बरामदे में बैठे हैं।

मणि ने आकर भूमि पर माथा टेककर प्रणाम किया। श्रीरामकृष्ण ने उन्हें अपने पास बैठने के लिए कहा। सम्भव है, तान्त्रिक भक्त के साथ वार्तालाप करते करते उन्हें भी उपदेश देंगे। श्री महिम चक्रवर्ती ने तान्त्रिक भक्त को श्रीरामकृष्ण का दर्शन करने के लिए भेजा है। भक्त गेरुआ वस्त्र धारण किये हैं।

श्रीरामकृष्ण – (तान्त्रिक भक्त के प्रति) – ये सब तान्त्रिक साधना के अंग हैं; कपाल-पात्र में सुधा का पान करना! उस सुधा को कारणवारि कहते हैं, है न?

तान्त्रिक – जी हाँ!

श्रीरामकृष्ण – ग्यारह पात्र, न?

तान्त्रिक – तीन तोला भर! शव-साधना के लिए।

श्रीरामकृष्ण – पर मैं तो सुरा छू तक नहीं सकता।

तान्त्रिक – आपका सहजानन्द है, यह आनन्द होने पर और फिर क्या चाहिए!

श्रीरामकृष्ण – फिर देखो, मुझे जप-तप भी अच्छे नहीं लगते। सदा स्मरण-मनन रहता है। अच्छा, षट्चक्र क्या चीज है?

तान्त्रिक – जी, वह सब अनेक तीर्थों की तरह है। प्रत्येक चक्र में शिव शक्ति विराजमान हैं, वे आँख से देखे नहीं जाते, शरीर काटने पर भी नहीं मिलते।