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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

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DevanagariHindipublished711 pages

Page 457 of 711

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Page 457
४३४श्रीरामकृष्णवचनामृत५ जनवरी, १८८४

मणि हाथ जोड़े चुपचाप बैठे हैं।

श्रीरामकृष्ण फिर कह रहे हैं - तुम जो कुछ सोच रहे हो, वह भी हो जायगा।

श्रीरामकृष्ण अब अपनी साधारण दशा में आ गये हैं। कमरे में राखाल और रामलाल बैठे हैं। रामलाल से उन्होंने गाने के लिए कहा। रामलाल ने दो गाने गाये।

श्रीरामकृष्ण - माँ और जननी। जो संसार के रूप में सर्वव्यापिनी हैं वे माँ हैं, और जो जन्मस्थान हैं वे जननी। माँ कहते ही मुझे समाधि हो जाती थी। - माँ कहते हुए मानो जगज्जननी को आकर्षित कर लेता था! जैसे धीवर जाल फेंकते हैं, फिर बड़ी देर बाद जाल खींचते रहते हैं। फिर उसमें बड़ी-बड़ी मछलियाँ आ जाती हैं।

गौरी पण्डित का कथन। काली और श्रीगौरांग एक हैं।

“गौरी ने कहा था, काली और श्रीगौरांग को एक समझने पर ज्ञान पक्का होगा। जो ब्रह्म हैं, वही शक्ति काली है, वही नर के स्वरूप में श्रीगौरांग हैं।”

श्रीरामकृष्ण की आज्ञा पाकर रामलाल ने फिर गाना शुरू किया। गाना समाप्त होने पर श्रीरामकृष्ण ने मणि से कहा - “जो नित्य हैं, उन्हीं की लीला है - भक्तों के लिए। उन्हें जब नररूप में देख लेंगे तभी तो भक्त उन्हें प्यार कर सकेंगे? तभी तो उन्हें भाई, बहन, माँ, बाप और सन्तान की तरह प्यार कर सकेंगे? वे भक्तों की प्रीति के कारण छोटे होकर लीला करने के लिए आते हैं।”

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