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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished711 pages

Page 456 of 711

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Page 456

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५ जनवरी, १८८४ परिच्छेद ७४ ४३३

"परन्तु माँ उन्हीं का क्या दोष है! वे क्या करेंगे! विचार एक बार तो कर लेना चाहिए! देखो न, अभी उस दिन इतना समझाकर कहा, परन्तु कुछ न हुआ - आज बिलकुल ...”

श्रीरामकृष्ण माँ के पास करुणापूर्ण गद्गद स्वर से रोते हुए प्रार्थना कर रहे हैं। क्या आश्चर्य है! भक्तों के लिए माँ के पास रो रहे हैं - "माँ, तुम्हारे पास जो लोग आते हैं उनका मनोरथ पूर्ण करो! - सब त्याग न करना, माँ! अच्छा, अन्त में जैसा तुम्हें समझ पड़े करना!

"माँ, संसार में अगर रखना तो एक एक बार दर्शन देना। नहीं तो कैसे रहेंगे? एक एक बार दर्शन दिये बिना उत्साह कैसे होगा, माँ! - इसके बाद अन्त में चाहे जो करना।"

श्रीरामकृष्ण अब भी भावावेश में हैं। उसी अवस्था में एकाएक मणि से कह रहे हैं - “देखो तुमने जो कुछ विचार किया वह बहुत हो गया है। अब बस करो। कहो, अब तो विचार नहीं करोगे?”

मणि हाथ जोड़कर कह रहे हैं "जी नहीं, अब नहीं करूँगा।"

श्रीरामकृष्ण - बहुत हो चुका! - तुम्हारे आते ही तो मैंने तुम्हें बतला दिया था - तुम्हारा आध्यात्मिक ध्येय। मैं यह सब तो जानता हूँ।

मणि - (हाथ जोड़कर) - जी हाँ।

श्रीरामकृष्ण - तुम्हारा ध्येय, तुम कौन हो, तुम्हारा अन्दर और बाहर, तुम्हारी पहले की बातें, आगे तुम्हारा क्या होगा यह सब मैं तो जानता हूँ।

मणि - (हाथ जोड़े हुए) - जी हाँ।

श्रीरामकृष्ण - तुम्हारे लड़के हुए हैं, सुनकर तुम्हें फटकारा था - अब जाकर घर में रहो - उन्हें दिखाना कि तुम उनके अपने आदमी हो, परन्तु भीतर से समझे रहना, तुम भी उनके अपने नहीं हो और वे भी तुम्हारे अपने नहीं।

मणि चुपचाप बैठे हैं। श्रीरामकृष्ण फिर कहने लगे -

"अपने पिता को सन्तुष्ट रखना। अब उड़ना सीखा हैं तो भी उनसे प्रेम रखना। तुम अपने पिता को साष्टांग प्रणाम कर सकोगे न?

मणि - (हाथ जोड़े हुए) - जी हाँ।

श्रीरामकृष्ण - तुम्हें और क्या कहूँ, तुम तो सब जानते हो - सब समझ गये हो। (मणि चुपचाप बैठे हैं।)

श्रीरामकृष्ण - सब समझ गये हो न?

मणि - जी हाँ, कुछ कुछ समझा हूँ।

श्रीरामकृष्ण - नहीं, तुम्हारी समझ में बहुत कुछ आता है। राखाल यहाँ है, इससे उसके पिता को सन्तोष है।

CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar