Skip to content
SarvaKosh
श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished711 pages

Page 454 of 711

Read in context
Page 454
५ जनवरी, १८८४परिच्छेद ७४४३१

तो उनसे पाप की वृद्धि हो सकती थी। अपने दोषों से मैं पाप कर रहा हूँ – यह ज्ञान अगर उन्होंने न दिया होता तो पाप की और भी वृद्धि होती।

“जिन्होंने उन्हें पा लिया है, वे जानते हैं स्वाधीन इच्छा नाममात्र की है। वास्तव में वे ही यन्त्री हैं, मैं केवल यन्त्र हूँ; वे इंजिनियर हैं, मैं गाड़ी!”

(२)

दिन का पिछला पहर हैं। चार बजे का समय होगा। पंचवटीवाले कमरे में श्रीयुत राखाल तथा और भी दो-एक भक्त मणि का कीर्तन सुन रहे हैं।

गाना सुनकर राखाल को भावावेश हो गया है।

कुछ देर बाद श्रीरामकृष्ण पंचवटी में आये। उनके साथ बाबूराम और हरीश हैं।

राखाल – इन्होंने कीर्तन सुनाकर हम लोगों को खूब प्रसन्न किया।

श्रीरामकृष्ण भावावेश में गा रहे हैं – 'ऐ सखि, कृष्ण का नाम सुनकर मेरे जी में जी आ गया।' श्रीरामकृष्ण ने कहा, यही सब गाना चाहिए – 'सब सखि मिलि बैठला' फिर कहा – बात यही है कि भक्ति और भक्तों को लेकर रहना चाहिए।

“श्रीकृष्ण के मथुरा जाने पर यशोदा राधिका के पास गयी थीं। राधिका उस समय ध्यान में थीं। फिर उन्होंने यशोदा से कहा, मैं आदिशक्ति हूँ। तुम मुझसे वरयाचना करो। यशोदा ने कहा – वर और क्या दोगी, – यही कहो जिससे मन, वचन और कर्मों से उनकी सेवा कर सकूँ – इन्हीं आँखों से उनके भक्तों के दर्शन हों – इस मन से उनका ध्यान और उनका चिन्तन हो और वाणी से उनके नाम और गुणों का कीर्तन हो।

“परन्तु जिनकी भक्ति दृढ़ हो गयी है, उनके लिए भक्तों का संग न होने पर भी कुछ हर्ज नहीं है। कभी कभी तो भक्तों से विरक्ति भी हो जाती है। बहुत चिकनी दीवाल पर से चूनाकारी धस जाती है। अर्थात् वे जिनके अन्तर-बाहर सर्वत्र है, उन्हीं की यह अवस्था है।”

श्रीरामकृष्ण झाऊतल्ले से लौटकर पंचवटी के नीचे मणि से फिर कह रहे है – “तुम्हारी आवाज स्त्रियों जैसी है। तुम इस तरह के गानों का अभ्यास कर सकते हो? – (भावार्थ) सखि, वह बन कितनी दूर है जहाँ मेरे श्यामसुन्दर हैं?

(बाबूराम की ओर देखकर मणि से) “देखो, जो अपने आदमी हैं, वे पराये हो जाते हैं, – रामलाल तथा और सब लोग अब जैसे कोई दूसरे हों। फिर जो लोग दूसरे हैं, वे अपने हो जाते हैं। देखो न, बाबूराम से कहता हूँ, जंगल जा, हाथ-मुँह धो। अब तो भक्त ही अपने आत्मीय हैं।”

मणि – जी हाँ।