श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
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Read in contextपरिच्छेद ७४
मणि के प्रति उपदेश
(१)
कामिनी-काञ्चन-त्याग
श्रीरामकृष्ण दोपहर का भोजन कर चुके हैं। एक बजे का समय होगा। शनिवार, ५ जनवरी १८८४ ई.। मणि को श्रीरामकृष्ण के साथ रहते हुए आज २३ वाँ दिन है।
मणि भोजन करके नौबतखाने में थे, वहीं से किसी को नाम लेकर पुकारते हुए सुना। बाहर आकर उन्होंने देखा कि घर के उत्तरवाले लम्बे बरामदे से श्रीरामकृष्ण स्वयं उन्हें पुकार रहे थे। मणि ने आकर उन्हें प्रणाम किया।
दक्षिण के बरामदे में श्रीरामकृष्ण मणि से वार्तालाप कर रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण – तुम लोग किस तरह ध्यान करते हो? – मैं तो बेल के नीचे कितने ही रूप साफ साफ देखता था। एक दिन देखा, सामने रुपये, दुशाला, एक थाल, सन्देश और दो औरतें! तब मैंने मन से पूछा, मन! तू इनमें से कुछ चाहता है? – फिर सन्देशों को देखा, विष्ठा है! औरतों में एक बुलाक पहने हुए थी। उनका भीतर बाहर सब मुझे दीख पड़ता था – आँतें-मल-मूत्र-हाड़-मांस-खून! मन ने कुछ न चाहा।
“मन उन्हीं के पाद-पद्मों में लगा रहा। निक्ती (काँटेवाला तराजू) के नीचे भी काँटा होता है और ऊपर भी। मन नीचेवाला काँटा है। मुझे सदा ही भय लगा रहता था कि कहीं ऐसा न हो कि ऊपरवाले काँटे से (ईश्वर से) मन विमुख हो जाय। तिस पर एक आदमी सदा ही हाथ में त्रिशूल लिये मेरे पास बैठा रहता था। उसने डराया, कहा, नीचेवाला काँटा ऊपरवाले काँटे से इधर-उधर झुका नहीं कि यही त्रिशूल भोंक दूँगा।
“बात यह है कि कामिनी-कांचन का त्याग हुए बिना कुछ होने का नहीं। मैंने तीन त्याग किये थे – जमीन, जोरू और रुपया। भगवान रघुवीर के नाम की जमीन रजिस्ट्री कराने के लिए मुझे उस देश में (कामारपुकुर में) जाना पड़ा था। मुझसे दस्तखत करने के लिए कहा गया। मैंने दस्तखत नहीं किये। मुझे यह ख्याल था ही नहीं कि यह मेरी जमीन है। रजिस्ट्री आफिसवालों ने केशव सेन का गुरु समझकर मेरा खूब आदर किया था। आम ला दिये, परन्तु घर ले जाने का अख्तियार था ही नहीं, क्योंकि संन्यासी को संचय नहीं