श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
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| २ फरवरी १८८४ | परिच्छेद ७५ | ४३७ |
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“व्याकुलता चाहिए। जब लड़का सम्पत्ति का अपना हिस्सा अलग कर देने के लिए अपने माँ-बाप को परेशान करने लगता है तब माँ-बाप दोनों आपस में सलाह करके लड़के का हिस्सा तुरन्त दे देते हैं। व्याकुल होने से ईश्वर जरूर सुनेंगे। जब उन्होंने हमें पैदा किया है, तब सम्पत्ति में हमारा भी हिस्सा है। वे अपने बाप, अपनी माँ हैं – उन पर अपना जोर चल सकता है। हम उनसे कह सकते हैं, ‘मुझे दर्शन दो, नहीं तो गले में छुरी मार लूँगा'।”
किस तरह माँ को पुकारना चाहिए, श्रीरामकृष्ण बतला रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण – मैं माँ को इस तरह पुकारता था – माँ आनन्दमयी, तुम्हें दर्शन देना होगा।
“फिर कभी कहता था – हे दीनानाथ! जगन्नाथ! मैं जगत् से अलग थोड़े ही हूँ? मैं ज्ञानहीन हूँ, भक्तिहीन हूँ, साधनहीन हूँ, मैं कुछ भी नहीं जानता – कृपा करके दर्शन देना होगा!”
श्रीरामकृष्ण अत्यन्त करुण स्वर में गाने के ढंग पर बतला रहे हैं, किस तरह उन्हें पुकारना चाहिए। वह करुण स्वर सुनकर भक्तों का हृदय द्रवीभूत हो रहा है, महिमाचरण की आँखों से धारा बह रही है।
महिमाचरण को देखकर श्रीरामकृष्ण फिर कह रहे हैं – “मन! जिस तरह पुकारना चाहिए, उसी तरह तुम पुकारो तो सही, फिर देखो, कैसे श्यामा रह सकती है!”
(३)
सदसद्-विचार
कुछ भक्त शिवपुर से आये हैं। वे लोग इतनी दूर से कष्ट उठाकर आये हैं, श्रीरामकृष्ण और अधिक चुप न रह सके। चुनी हुई बातें उनसे कह रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण – (शिवपुर के भक्तों से) – ईश्वर ही सत्य है, और सब अनित्य। बाबू और बगीचा। ईश्वर और उनका ऐश्वर्य। लोग बगीचा ही देख लेते हैं, पर बाबू को कितने लोग देखना चाहते हैं?
भक्त – अच्छा, फिर उपाय क्या है?
श्रीरामकृष्ण – सदसद्-विचार। वे ही सत्य हैं और सब अनित्य, इसका सर्वदा विचार करना, और व्याकुल होकर उन्हें पुकारना।
भक्त – जी, समय कहाँ है?
श्रीरामकृष्ण – जिन्हें समय है वे ध्यान-भजन करेंगे।
“जो लोग बिलकुल कुछ न कर सकें वे दोनों समय भक्तिपूर्वक दो बार प्रणाम करें। वे भी तो अन्तर्यामी हैं, वे समझते हैं कि ये क्या करते हैं। तुम्हें कितने ही काम हैं। तुम्हें