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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished711 pages

About this granth

Sri Ramakrishna Vachanamrita (श्री रामकृष्ण वचनामृत) is the Hindi version of the Sri Sri Ramakrishna Kathamrita, the record of Sri Ramakrishna Paramahamsa's conversations kept by his householder disciple Mahendranath Gupta, who wrote as 'M'. Gupta noted the talks at Dakshineswar and Calcutta between 1882 and 1886 in his diary, with dates, which gives the work the feel of an eyewitness account.

This first part is the translation by the Hindi poet Suryakant Tripathi 'Nirala'. It is arranged in numbered sections, each tied to a date such as 11 March, 16 October or 28 October 1882, and covers Ramakrishna's teaching on God-realisation, devotion and knowledge, spiritual life for householders, maya and the harmony of religions, told through his everyday parables. A foreword and introduction open the volume.

The copy comes from the library of Gurukul Kangri University, Haridwar, and has about 711 pages.

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३७८श्रीरामकृष्णवचनामृत१६ दिसम्बर, १८८३

साथ एक शास्त्रज्ञ ब्राह्म मित्र हैं। मणि, राखाल, लाटू, हरीश, योगीन्द्रादि भक्त भी हैं।

योगीन्द्र दक्षिणेश्वर के सावर्ण चौधरियों के यहाँ के हैं। ये आजकल प्रायः रोज दिन ढलने पर श्रीरामकृष्ण के दर्शन करने आते हैं और रात को चले जाते हैं। योगीन्द्र ने अभी विवाह नहीं किया।

मुखर्जी (प्रणाम करके) – आपके दर्शन से बड़ा आनन्द हुआ।

श्रीरामकृष्ण – वे सभी के भीतर हैं, वही सोना सब के भीतर है, कहीं प्रकाश अधिक है। संसार में उस सोने पर बहुत मिट्टी पड़ी रहती है।

मुखर्जी (सहास्य) – महाराज, ऐहिक और पारमार्थिक में अन्तर क्या है?

श्रीरामकृष्ण – साधना के समय 'नेति' 'नेति' करके त्याग करना पड़ता है। उन्हें पा लेने पर समझ में आता है, सब कुछ वही हुए हैं।

“जब श्रीरामचन्द्र को वैराग्य हुआ, तब दशरथ को बड़ी चिन्ता हुई। वे वशिष्ठजी की शरण में गए, जिससे राम संसार का त्याग न करें। वशिष्ठजी ने श्रीरामचन्द्र के पास जाकर देखा, वे विमनस्क हुए बैठे हैं – अन्तर तीव्र वैराग्य से भरा हुआ है। वशिष्ठजी ने कहा, 'राम, तुम संसार का त्याग क्यों करोगे? संसार क्या कोई उनसे अलग वस्तु है? मेरे साथ विचार करो।' राम ने देखा, संसार भी उसी परब्रह्म से हुआ है, इसलिए चुपचाप बैठे रहे।

“जैसे जिस चीज से मट्ठा होता है, उसी से मक्खन भी होता है। अतएव मट्ठे का ही मक्खन और मक्खन का ही मट्ठा कहना चाहिए। बड़ी कठिनाइयों से मक्खन उठा लेने पर (अर्थात् ब्रह्मज्ञान होने पर) देखोगे, मक्खन रहने से मट्ठा भी है; जहाँ मक्खन है वहीं मट्ठा है। ब्रह्म है, इस ज्ञान के रहने से जीव, जगत्, चतुर्विंशति तत्त्व भी हैं।

“ब्रह्म क्या वस्तु है, यह कोई मुँह से नहीं कह सकता। सब वस्तुएँ जूठी हो गयी हैं, (अर्थात् मुँह से कही जा चुकी हैं) परन्तु ब्रह्म क्या है, यह कोई मुँह से नहीं कह सका, इसीलिए वह जूठा नहीं हुआ। यह बात मैंने विद्यासागर से कही थी। विद्यासागर सुनकर बड़े प्रसन्न हुए।

“विषयबुद्धि का लेशमात्र रहते भी यह ब्रह्मज्ञान नहीं होता। कामिनी-कांचन का भाव जब मन में बिलकुल न रहेगा, तब होगा। पार्वतीजी ने पर्वतराज से कहा, 'पिताजी, अगर आप ब्रह्मज्ञान चाहते हैं तो साधुओं का संग कीजिए।'”

क्या श्रीरामकृष्ण के कहने का तात्पर्य यही है कि मनुष्य चाहे संसारी हो या संन्यासी, कामिनी-कांचन में मग्न रहने पर उसे ब्रह्मज्ञान नहीं होता?

श्रीरामकृष्ण फिर मुखर्जी से कह रहे हैं –

“तुम्हारे धन-सम्पत्ति है फिर भी तुम ईश्वर को भी पुकारते हो, यह बहुत अच्छा है। गीता में है – जो लोग योगभ्रष्ट हो जाते हैं वही भक्त होकर धनी के घर जन्म लेते हैं।”

CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

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१६ दिसम्बर, १८८३ परिच्छेद ६३ ३७९

मुखर्जी (अपने मित्र से सहास्य) – “शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते।”

श्रीरामकृष्ण – वे चाहे तो ज्ञानी को संसार में भी रख सकते हैं। उन्हीं की इच्छा से यह जीव-प्रपंच हुआ है। वे इच्छामय हैं।

मुखर्जी (सहास्य) – उनकी फिर कैसी इच्छा? क्या उन्हें भी कोई अभाव है?

श्रीरामकृष्ण (सहास्य) – इसमें दोष ही क्या है? पानी स्थिर रहे तो भी वह पानी है और जीव-जगत क्या मिथ्या है? तरंगें उठने पर भी वह पानी ही है।

“साँप चुपचाप कुण्डली बाँधकर बैठा रहे, तो भी वह साँप है और तिर्यग्-गति हो, टेढ़ा-मेढ़ा रेंगने से भी वह साँप ही है।

“बाबू जब चुपचाप बैठे रहते हैं, तब वे जो मनुष्य हैं, वही मनुष्य वे उस समय भी हैं जब वे काम करते हैं।

“जीव-प्रपंच को अलग कैसे कर सकते हो? इस तरह वजन तो घट जाएगा! बेल के बीज और खोपड़ा निकाल देने से पूरे बेल का वजन ठीक नहीं उतरता।

“ब्रह्म निर्लिप्त है। सुगन्ध और दुर्गन्ध वायु से मिलती है, परन्तु वायु निर्लिप्त है। ब्रह्म और शक्ति अभेद हैं। उसी आद्याशक्ति से जीव-प्रपंच बना है।”

मुखर्जी – योगभ्रष्ट क्यों होते हैं?

श्रीरामकृष्ण – कहते हैं न ‘जब मैं गर्भ में था तब योग में था, पृथ्वी पर गिरते ही मिट्टी खायी। धाई ने तो मेरा नार काटा; पर यह माया की बेड़ी कैसे काटूँ?’

“कामिनी-कांचन ही माया है। मन से इन दोनों के जाते ही योग होता है। आत्मा – परमात्मा – चुम्बक पत्थर है, जीवात्मा एक सूई है – उनके खींच लेने ही से योग हो गया। परन्तु सूई में अगर मिट्टी लगी हुई हो, तो चुम्बक नहीं खींचता – मिट्टी साफ कर देने से फिर खींचता है। कामिनी-कांचन मिट्टी है, इसे साफ करना चाहिए।”

मुखर्जी – यह किस तरह साफ हो?

श्रीरामकृष्ण – उनके लिए व्याकुल होकर रोओ। वही जल मिट्टी पर गिरने से मिट्टी धुल जाएगी। जब खूब साफ हो जाएगी तब चुम्बक खींच लेगा। योग तभी होगा।

मुखर्जी – अहा! कैसी बात है!

श्रीरामकृष्ण – उनके लिए रो सकने पर उनके दर्शन होते हैं – समाधि होती है। योग में सिद्ध होने से ही समाधि होती है। रोने से कुम्भक आप ही आप होता है। – उसके बाद समाधि।

“एक उपाय और है – ध्यान। सहस्त्रार कमल (मस्तक) में विशेष रूप से शिव का अधिष्ठान है – उसका ध्यान। शरीर आधार है और मन-बुद्धि जल। इस पानी पर उस सच्चिदानन्द सूर्य का बिम्ब गिरता है! उसी बिम्बसूर्य का ध्यान करते करते उनकी कृपा से यथार्थ सूर्य के भी दर्शन होते हैं।

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३८० | श्रीरामकृष्णवचनामृत | १६ दिसम्बर, १८८३

साधुसंग करो और आम-मुखतारी दे दो

“परन्तु संसारी मनुष्यों के लिए तो सदा ही साधुसंग की आवश्यकता है। यह सभी के लिए आवश्यक है; संन्यासियों के लिए भी। परन्तु संसारियों के लिए यह विशेषकर आवश्यक है। उन्हें रोग लगा ही हुआ है – कामिनी-कांचन में सदा ही रहना पड़ता है।”

मुखर्जी – जी हाँ, रोग लगा ही हुआ है।

श्रीरामकृष्ण – उन्हें आम-मुखतारी दे दो – वे जो चाहे सो करें। तुम बिल्ली के बच्चे की तरह उन्हें पुकारते भर रहो – व्याकुल होकर। उसकी माँ उसे चाहे जहाँ रखे – वह कुछ भी नहीं जानता; – कभी बिस्तर पर रखती है तो कभी रसोईघर में!

मुखर्जी – गीता आदि शास्त्र पढ़ना अच्छा है।

श्रीरामकृष्ण – केवल पढ़ने-सुनने से क्या होगा? किसी ने दूध का नाम मात्र सुना है, किसी ने दूध देखा है और किसी ने दूध पिया है। ईश्वर के दर्शन हो सकते हैं और उनसे वार्तालाप भी किया जा सकता है।

“पहले प्रवर्तक है – वह पढ़ता-सुनता है। उसके बाद साधक हैं, – उन्हें पुकारता है, ध्यान-चिन्तन और नामगुण-कीर्तन करता है। इसके बाद सिद्ध – उसे हृदय में उनका अनुभव हुआ है, उनके दर्शन हुए हैं। इसके बाद है सिद्ध का सिद्ध – जैसे चैतन्यदेव की अवस्था – कभी वात्सल्य और कभी मधुर भाव।”

मणि, राखाल, योगीन्द्र, लाटू आदि भक्तगण ये सब देवदुर्लभ तत्त्वपूर्ण कथाएँ आश्चर्यचकित होकर सुन रहे हैं।

अब मुखर्जी और उनके साथवाले विदा होंगे। वे सब प्रणाम करके उठ खड़े हुए। श्रीरामकृष्ण भी, शायद उन्हें सम्मान दिखाने के उद्देश्य से खड़े हो गये।

मुखर्जी (सहास्य) – आपके लिए उठना और बैठना!

श्रीरामकृष्ण (सहास्य) – उठने और बैठने में हानि क्या है? पानी स्थिर होने पर भी पानी है और हिलने-डुलने पर भी पानी ही है। आँधी में जूठी पत्तल, हवा चाहे जिस ओर उड़ा ले जाय। मैं यन्त्र हूँ, वे यन्त्री हैं।

(२)

श्रीरामकृष्ण का दर्शन और वेदान्ततत्त्वों की गूढ़ व्याख्या

जनाई के मुखर्जी चले गए। मणि सोच रहे हैं, वेदान्तदर्शन के मत से सब स्वप्नवत् है। तो क्या जीव, जगत्, मैं – यह सब मिथ्या है?

मणि ने थोड़ा-बहुत वेदान्त पढ़ा है। फिर जिनके विचार मानो वेदान्त की ही अस्फुट प्रतिध्वनि है, उन कान्ट, हेगेल आदि जर्मन पण्डितों के भी कुछ ग्रन्थ पढ़े हैं।

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१६ दिसम्बर, १८८३परिच्छेद ६३३८१

परन्तु श्रीरामकृष्ण ने दुर्बल मानव की तरह विचार के द्वारा ज्ञान प्राप्त नहीं किया है, उन्हें तो स्वयं जगज्जननी ने सब कुछ दर्शन करा दिया है। मणि इसी के बारे में सोच रहे हैं।

कुछ ही देर बाद श्रीरामकृष्ण मणि के साथ अकेले पश्चिमवाले गोल बरामदे में बातचीत कर रहे हैं। सामने गंगाजी कलकल नाद करती हुई दक्षिण की ओर बह रही हैं। शीत ऋतु है। नैऋत्य दिशा में सूर्यनारायण अभी भी दिखायी दे रहे हैं। जिनका जीवन वेदमय है, जिनके श्रीमुख से निकली वाणी वेदान्तवाक्य है, जिनके श्रीमुख से स्वयं भगवान् ही बोलते हैं, जिनके वचनरूपी अमृत से वेद, वेदान्त, श्रीमद्भागवत आदि ग्रन्थों का निर्माण हुआ है, वही अहेतुककृपासिन्धु पुरुष गुरुरूप धारण कर वार्तालाप कर रहे हैं।

मणि – क्या संसार मिथ्या है?

श्रीरामकृष्ण – मिथ्या क्यों है? वह सब विचार की बात है।

“पहले-पहल ‘नेति’ ‘नेति’ विचार करते समय, वे न जीव हैं, न जगत् हैं, न चौबीस तत्त्व हैं, ऐसा हो जाता है, – यह सब स्वप्नवत् हो जाता है। इसके बाद अनुलोम विलोम होता है, तब वही जीव-जगत् हुए हैं, यह ज्ञान हो जाता है।

“तुम एक-एक करके सीढ़ियों से छत पर गए। परन्तु जब तक तुम्हें छत का ज्ञान है, तब तक सीढ़ियों का ज्ञान भी है। जिसे ऊँचे का ज्ञान है उसे नीचे का भी ज्ञान है।

“फिर छत पर चढ़कर तुमने देखा, जिस चीज से छत बनी हुई है – ईंट, चूना, मसाला – उसी चीज से सीढ़ियाँ भी बनी हैं।

“और जैसे बेल की बात कही थी।

“जिसका ‘अटल’ है, उसका ‘टल’ भी है।

“‘मैं’ नहीं जाने का। ‘मैं-घट’ जब तक है, तब तक जीव-प्रपंच भी है। उन्हें प्राप्त कर लेने पर देखा जाता है, जीव-प्रपंच वही हुए हैं। – केवल विचार से ही नहीं होता।

“शिव की दो अवस्थाएँ हैं। जब वे समाधिस्थ हैं – महायोग में बैठे हुए हैं – तब आत्माराम हैं। फिर जब उस अवस्था से उतर आते हैं – थोड़ासा ‘मैं’ रहता है – तब ‘राम राम’ कहकर नृत्य करते हैं।”

क्या शिव की अवस्था का वर्णन कर श्रीरामकृष्ण अपनी ही अवस्था सूचित कर रहे हैं?

शाम हो गयी है। श्रीरामकृष्ण जगन्माता का नाम और उनका चिन्तन कर रहे हैं। भक्तगण भी निर्जन में जाकर अपना अपना ध्यान-जप करने लगे। इधर कालीमाई के मन्दिर में, श्रीराधाकान्तजी के मन्दिर में और बारहौं शिवालयों में आरती होने लगी।

आज कृष्णपक्ष की द्वितीया है। सन्ध्या के कुछ समय बाद चन्द्रोदय हुआ। वह चाँदनी, मन्दिरशीर्ष, चारों ओर के पेड़-पौधे और मन्दिर के पश्चिम ओर भागीरथी के वक्षःस्थल पर पड़कर अपूर्व शोभा धारण कर रही है। इस समय उसी पूर्वपरिचित कमरे

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३८२ श्रीरामकृष्णवचनामृत १६ दिसम्बर, १८८३

में श्रीरामकृष्ण बैठे हुए हैं। फर्श पर मणि बैठे हुए हैं। शाम होते होते वेदान्त के सम्बन्ध की जो बात मणि ने उठायी थी उसी के बारे में श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण (मणि से) – संसार मिथ्या क्यों होने लगा? यह सब विचार की बात है। उनके दर्शन हो जाने पर ही समझ में आता है कि जीव-प्रपंच सब वही हुए हैं।

“मुझे माँ ने कालीमन्दिर में दिखलाया कि माँ ही सब कुछ हुई हैं। दिखाया, सब चिन्मय है। प्रतिमा चिन्मय है! वेदी चिन्मय है! अर्घ्यपात्र चिन्मय है! चौखट, संगमर्मर पत्थर – सब कुछ चिन्मय है!

“मन्दिर के भीतर मैंने देखा, सब मानो रस से सराबोर हैं – सच्चिदानन्द-रस से।

“कालीमन्दिर के सामने एक दुष्ट आदमी को देखा – परन्तु उसके भीतर भी उनकी शक्ति जाज्वल्यमान देखी!

“इसीलिए तो मैंने बिल्ली को उनके भोग की पूड़ियाँ खिलायी थीं। देखा, माँ ही सब कुछ हुई हैं। - बिल्ली भी। तब खजांची ने मथुरबाबू को लिखा कि भट्टाचार्य महाशय भोग की पूड़ियाँ बिल्लियों को खिलाते हैं। मथुरबाबू मेरी अवस्था समझते थे। चिट्ठी के उत्तर में उन्होंने लिखा, ‘वे जो कुछ करें, उसमें कुछ बाधा न देना।’

“उन्हें पा जाने पर यह सब ठीक ठीक दीख पड़ता है; वही जीव, जगत्, चौबीसों तत्त्व – यह सब हुए हैं।

“परन्तु, यदि वे ‘मैं’ को बिलकुल मिटा दें, तब क्या होता है, यह मुँह से नहीं कहा जा सकता। जैसे रामप्रसाद ने कहा है – ‘तब तुम अच्छी हो या मैं अच्छा हूँ यह तुम्हीं समझोगी।’

“वह अवस्था भी मुझे कभी कभी होती है।

“विचार करने से एक तरह का दर्शन होता है और जब वे दिखा देते हैं तब एक दूसरे तरह का।”

परिच्छेद ६४

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परिच्छेद ६४

जीवनोद्देश्य – ईश्वरदर्शन

दूसरे दिन सोमवार, १७ दिसम्बर १८८३, सबेरे आठ बजे का समय होगा। श्रीरामकृष्ण उसी कमरे में बैठे हुए हैं। राखाल, लाटू आदि भक्त भी हैं। मणि फर्श पर बैठे हैं। मधु डाक्टर भी आये हुए हैं। वे श्रीरामकृष्ण के पास उसी छोटी खाट पर बैठे हैं। मधु डाक्टर वयोवृद्ध हैं – श्रीरामकृष्ण को कोई बीमारी होने पर प्रायः ये आकर देख जाया करते हैं। स्वभाव के बड़े रसिक हैं।

श्रीरामकृष्ण – बात है सच्चिदानन्द पर प्रेम। कैसा प्रेम? – ईश्वर को किस तरह प्यार करना चाहिए? गौरी पण्डित कहता था, राम को जानना हो तो सीता की तरह होना चाहिए। भगवान् को जानने के लिए भगवती की तरह होना चाहिए। भगवती ने शिव के लिए जैसी कठोर तपस्या की थी, वैसी ही तपस्या करनी चाहिए। पुरुष को जानने का अभिप्राय हो तो प्रकृतिभाव का आश्रय लेना पड़ता है – सखीभाव, दासीभाव, मातृभाव।

“मैंने सीतामूर्ति के दर्शन किए थे। देखा, सब मन राम में ही लगा हुआ है। योनि, हाथ, पैर, कपड़े-लत्ते, किसी पर दृष्टि नहीं है। मानो जीवन ही राममय है – राम के बिना रहे, राम को बिना पाए, जी नहीं सकती।”

मणि – जी हाँ, जैसे पगली!

श्रीरामकृष्ण – उन्मादिनी! – अहा! ईश्वर को प्राप्त करना हो तो पागल होना पड़ता है।

“कामिनी-कांचन पर मन के रहने से नहीं होता। कामिनी के साथ रमण - इसमें क्या सुख है? ईश्वरदर्शन होने पर रमण सुख से करोड़गुना आनन्द होता है। गौरी कहता था, महाभाव होने पर शरीर के सब छिद्र – रोमकूप भी – महायोनि हो जाते हैं। एक-एक छिद्र में आत्मा के साथ आत्मा का रमण-सुख होता है!

“व्याकुल होकर उन्हें पुकारना चाहिए। गुरु के श्रीमुख से सुन लेना चाहिए कि वे क्या करने से मिलेंगे।

“गुरु तभी मार्ग बतला सकेंगे जब वे स्वयं पूर्णज्ञानी होंगे। पूर्णज्ञान होने पर वासना चली जाती है। पाँच वर्ष के बालक का-सा स्वभाव हो जाता है। दत्तात्रेय और जड़भरत, ये बालस्वभाव के थे।”

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३८४श्रीरामकृष्णवचनामृत१७ दिसम्बर, १८८३

मणि – जी हाँ, इनके बारे में लोगों को ज्ञात है, पर इनके अलावा और भी कितने ही ज्ञानी इनकी तरह के हो गए होंगे।

श्रीरामकृष्ण – हाँ, ज्ञानी की सब वासना चली जाती है। – जो कुछ रह जाती है, उसमें कोई हानि नहीं होती। पारस पत्थर के छू जाने पर तलवार सोने की हो जाती है, फिर उस तलवार से हिंसा का काम नहीं होता। इसी तरह ज्ञानी में कामक्रोध का आकार मात्र रहता है, – नाममात्र – उससे कोई अनर्थ नहीं होता।

मणि – आप जैसा कहा करते हैं, ज्ञानी तीनों गुणों से परे हो जाता है। सत्त्व, रज, और तम – किसी गुण के वश में वह नहीं रहता। ये तीनों गुण डकैत हैं।

श्रीरामकृष्ण – इस बात की धारणा करनी चाहिए।

मणि – पूर्णज्ञानी संसार में शायद तीन-चार मनुष्यों से अधिक न होंगे।

श्रीरामकृष्ण – क्यों? पश्चिम के मठों में तो बहुत से साधुसंन्यासी दीख पड़ते हैं।

मणि – जी, इस तरह का संन्यासी तो मैं भी हो जाऊँ!

इस बात पर श्रीरामकृष्ण कुछ देर तक मणि की ओर देखते रहे।

श्रीरामकृष्ण (मणि से) – क्या? सब त्यागकर?

मणि – माया के बिना गए क्या होगा? माया को जीत न पाया तो केवल संन्यासी होकर क्या होगा?

सब लोग कुछ समय तक चुप रहे।

त्रिगुणातीत भक्त बालक के समान

मणि – अच्छा त्रिगुणातीत भक्ति किसे कहते हैं?

श्रीरामकृष्ण – उस भक्ति के होने पर भक्त सब चिन्मय देखता है। चिन्मय श्याम, चिन्मय धाम – भक्त भी चिन्मय – सब चिन्मय! ऐसी भक्ति कम लोगों की होती है।

डाक्टर मधु (सहास्य) – त्रिगुणातीत भक्ति, अर्थात् भक्त किसी गुण के वश नहीं।

श्रीरामकृष्ण (सहास्य) – हाँ, जैसे पाँच साल का लड़का – किसी गुण के वश नहीं।

दोपहर को, भोजन के बाद, श्रीरामकृष्ण थोड़ा विश्राम कर रहे हैं। श्री मणिलाल मल्लिक ने आकर प्रणाम किया; फिर जमीन पर बैठ गए। मणि भी जमीन पर बैठे हुए हैं। श्रीरामकृष्ण लेटे लेटे ही मणि मल्लिक के साथ बीच बीच में एक एक बात कह रहे हैं।

मणि मल्लिक – आप केशव सेन को देखने गए थे?

श्रीरामकृष्ण – हाँ। अब वे कैसे हैं?

मणि मल्लिक – रोग कुछ घटता हुआ नहीं दीख पड़ता।

श्रीरामकृष्ण – मैंने देखा, बड़ा राजसिक है। मुझे बड़ी देर तक बैठा रखा, तब भेंट

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हुईं।

श्रीरामकृष्ण उठकर बैठ गए और भक्तों के साथ बातचीत करने लगे।

श्रीरामकृष्ण (मणि से) – मैं ‘राम राम’ कहकर पागल हो गया था। संन्यासी के देवता रामलला को लेकर घूमता फिरता था – उसे नहलाता था, खिलाता था, सुलाता था। जहाँ कहीं जाता, साथ ले जाता था। ‘रामलला’ ‘रामलला’ कहकर पागल हो गया था।

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परिच्छेद ६५

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परिच्छेद ६५

भक्तों के साथ

(१)

श्रीकृष्णभक्ति

श्रीरामकृष्ण सदा ही समाधिमग्न रहते हैं; केवल राखाल आदि भक्तों की शिक्षा के लिए उन्हें लेकर व्यस्त रहते हैं - जिससे उन्हें चैतन्य प्राप्त हो।

वे अपने कमरे के पश्चिमवाले बरामदे में बैठे हैं। प्रातःकाल का समय, मंगलवार, १८ दिसम्बर १८८३ ई.। स्वर्गीय देवेन्द्रनाथ ठाकुर की भक्ति और वैराग्य की बात पर वे उनकी प्रशंसा कर रहे हैं। राखाल आदि बालक भक्तों से वे कह रहे हैं, - “वे सज्जन व्यक्ति हैं। परन्तु जो गृहस्थाश्रम में प्रवेश न कर बचपन से ही शुकदेव आदि की तरह दिनरात ईश्वर का चिन्तन करते हैं, कौमार अवस्था में वैराग्यवान् हैं, वे धन्य हैं।

“गृहस्थ की कोई न कोई कामना-वासना रहती ही है, यद्यपि उसमें कभी कभी भक्ति - अच्छी भक्ति - दिखायी देती है। मथुरबाबू न जाने किस एक मुकदमे में फँस गए थे; मन्दिर में माँ काली के पास आकर मुझसे कहते हैं, ‘बाबा, माँ को यह अर्घ्य दीजिए न!’ मैंने उदार मन से दिया। परन्तु कैसा विश्वास है कि मेरे देने से ही ठीक होगा।

“रति की माँ की इधर कितनी भक्ति है! अक्सर आकर कितनी सेवा-टहल करती है! रति की माँ वैष्णव है। कुछ दिनों के बाद ज्योंही देखा कि मैं माँ काली का प्रसाद खाता हूँ - त्योंही उसने आना बन्द कर दिया। कैसा एकांगी दृष्टिकोण है। लोगों को पहले-पहल देखने से पहचाना नहीं जाता।”

श्रीरामकृष्ण कमरे के भीतर पूर्व की ओर के दरवाजे के पास बैठे हैं। जाड़े का समय। बदन पर एक ऊनी चद्दर है। एकाएक सूर्य देखते ही समाधिमग्न हो गये। आँखें स्थिर! बाहर का कुछ भी ज्ञान नहीं।

क्या यही गायत्रीमन्त्र की सार्थकता है - ‘तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि’?

बहुत देर बाद समाधि भंग हुई। राखाल, हाजरा, मास्टर आदि पास बैठे हैं।

श्रीरामकृष्ण (हाजरा के प्रति) - समाधि या भाव-अवस्था की प्रेरणा प्रेम से ही होती है। श्यामबाजार में नटवर गोस्वामी के मकान पर कीर्तन हो रहा था - श्रीकृष्ण और

CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

१८ दिसम्बर, १८८३ | परिच्छेद ६५ | ३८७

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१८ दिसम्बर, १८८३परिच्छेद ६५३८७

गोपियों का दर्शन कर मैं समाधिमग्न हो गया! ऐसा लगा कि मेरा लिंगशरीर (सूक्ष्मशरीर) श्रीकृष्ण के पैरों के पीछे पीछे जा रहा है।

“जोड़ासाँकू हरिसभा में उसी प्रकार कीर्तन के समय समाधिस्थ होकर बाह्यशून्य हो गया था। उस दिन देहत्याग की सम्भावना थी!”

श्रीरामकृष्ण स्नान करने गए। स्नान के बाद उसी गोपीप्रेम की ही बात कर रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण (मणि आदि के प्रति) – “गोपियों के केवल उस आकर्षण को लेना चाहिए। इस प्रकार के गाने गाया करो –

(भावार्थ) – “सखि, वह वन कितनी दूर है, जहाँ मेरे श्यामसुन्दर हैं। मैं तो और चल नहीं सकती।”

(भावार्थ) – “सखि, जिस घर में कृष्णनाम लेना कठिन है उस घर में तो मैं किसी भी तरह नहीं जाऊँगी!”

(२)

यदु मल्लिक के मकान पर

श्रीरामकृष्ण ने राखाल के लिए सिद्धेश्वरी के नाम पर कच्चे नारियल और चीनी की मन्नत की है। मणि से कह रहे हैं, “तुम नारियल और चीनी का दाम दोगे।”

दोपहर के बाद श्रीरामकृष्ण राखाल, मणि आदि के साथ कलकत्ते के श्री सिद्धेश्वरी-मन्दिर की ओर गाड़ी पर सवार होकर आ रहे हैं। रास्ते में सिमुलियाबाजार से कच्चा नारियल और चीनी खरीदी गयी।

मन्दिर में आकर भक्तों से कह रहे हैं, “एक नारियल फोड़कर चीनी मिलाकर माँ को अर्पण करो।”

जिस समय मन्दिर में आ पहुँचे, उस समय पुजारी लोग मित्रों के साथ माँ काली के सामने ताश खेल रहे थे। यह देखकर श्रीरामकृष्ण भक्तों से कह रहे हैं, “देखो, ऐसे स्थानों में भी ताश! यहाँ पर तो ईश्वर का चिन्तन करना चाहिए!”

अब श्रीरामकृष्ण यदु मल्लिक के घर पर पधारे हैं। उनके पास अनेक बाबू लोग बैठे हुए हैं।

यदुबाबू कह रहे हैं, “पधारिए, पधारिए।” आपस में कुशल प्रश्न के बाद श्रीरामकृष्ण बातचीत कर रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण (हँसकर) – तुम इतने चापलूसों को क्यों रखते हो?

यदु (हँसते हुए) – इसलिए कि आप उनका उद्धार करें। (सभी हँसने लगे।)

श्रीरामकृष्ण – चापलूस लोग समझते हैं कि बाबू उन्हें खुले हाथ धन दे देंगे; परन्तु बाबू से धन निकालना बड़ा कठिन काम है। एक सियार एक बैल को देख उसका फिर साथ

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३८८ श्रीरामकृष्णवचनामृत १८ दिसम्बर, १८८३

न छोड़े। बैल चरता फिरता है, सियार भी साथ साथ है। सियार ने समझा कि बैल का जो अण्डकोष लटक रहा है, वह कभी न कभी गिरेगा और उसे वह खायेगा! बैल कभी सोता है तो वह भी उसके पास ही लेटकर सो जाता है और जब बैल उठकर घूम-फिरकर चरता है तो वह भी साथ साथ रहता है। कितनेही दिन इसी प्रकार बीते, परन्तु वह कोष न गिरा, तब सियार निराश होकर चला गया! (सभी हँसने लगे।) इन चापलूसों की ऐसी ही दशा है!

यदुबाबू और उनकी माँ ने श्रीरामकृष्ण तथा भक्तों को जलपान कराया।

□ □ □

CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

परिच्छेद ६६

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परिच्छेद ६६

बिल्ववृक्ष और पंचवटी के नीचे

(१)

निराकार साधना

श्रीरामकृष्ण बेल के पेड़ के पास खड़े हुए मणि से बातचीत कर रहे हैं। दिन के नौ बजे होंगे।

आज बुधवार है, १९ दिसम्बर १८८३ अगहन की कृष्णापंचमी है।

इस बेल के पेड़ के नीचे श्रीरामकृष्ण ने साधना की थी। यह स्थान अत्यन्त निर्जन है। इसके उत्तर तरफ बारूदखाना और चारदीवार है। पश्चिम तरफ झाऊ के पेड़, जो हवा के झोकों से हृदय में उदासीनता भर देनेवाली सनसनाहट पैदा करते हैं। आगे हैं भागीरथी। दक्षिण की ओर पंचवटी दिखायी पड़ रही है। चारों ओर इतने पेड़-पत्ते हैं कि देवालय पूर्ण तरह से दिखायी नहीं आते।

श्रीरामकृष्ण (मणि से) – पर कामिनी-कांचन का त्याग किये बिना कुछ होने का नहीं।

मणि – क्यों? वशिष्ठदेव ने तो श्रीरामचन्द्र से कहा था – राम, संसार अगर ईश्वर से अलग हो तो संसार का त्याग कर सकते हो।'

श्रीरामकृष्ण (जरा हँसकर) – वह रावणवध के लिए कहा था। इसीलिए राम को संसार में रहना पड़ा और विवाह भी करना पड़ा।

मणि काठ की मूर्ति की तरह चुपचाप खड़े रहे।

श्रीरामकृष्ण यह कहकर अपने कमरे में लौट जाने के लिए पंचवटी की ओर जाने लगे।

मणि – साधना करने पर क्या ज्ञान और भक्ति दोनों ही नहीं हो सकते?

श्रीरामकृष्ण – भक्ति लेकर रहने पर दोनों ही होते हैं। जरूरत होने पर वही ब्रह्मज्ञान देते हैं। खूब ऊँचा आधार हुआ तो एक साथ दोनों हो सकते हैं। ईश्वरकोटियों का होता है, – जैसे चैतन्यदेव का। जीवकोटियों की अलग बात है।

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३९० | श्रीरामकृष्णवचनामृत | १९ दिसम्बर, १८८३

“आलोक (ज्योति) पाँच प्रकार के हैं। दीपक का प्रकाश, भिन्न भिन्न प्रकार की अग्नि का प्रकाश, चन्द्रमा का प्रकाश, सूर्य का प्रकाश तथा चन्द्र और सूर्य का सम्मिलित प्रकाश। भक्ति है चन्द्रमा और ज्ञान है सूर्य।

“कभी कभी आकाश में सूर्यास्त होने से पहले ही चन्द्र का उदय हो जाता है, अवतार आदि में भक्तिरूपी चन्द्रमा तथा ज्ञानरूपी सूर्य एकाधार में देखे जाते हैं।

“क्या इच्छा करने से ही सभी को एक ही समय ज्ञान और भक्ति दोनों प्राप्त होते हैं? आधारों की भी विशेषता है। कोई बाँस अधिक पोला रहता है और कोई कम पोला। सभी आधारों में ईश्वर की धारणा थोड़े ही होती है। सेर भर के लोटे में क्या दो सेर दूध आ सकता है?

मणि – क्यों, उनकी कृपा से यदि वे कृपा करें तब तो सूई के छेद से ऊँट भी पार हो सकता है।

श्रीरामकृष्ण – परन्तु कृपा क्या यों ही होती है? भिखारी यदि एक पैसा माँगे तो दिया जा सकता है। परन्तु एकदम यदि रेल का भाड़ा माँग बैठे तो?

मणि चुपचाप खड़े हैं, श्रीरामकृष्ण भी चुप हैं। एकाएक बोल उठे, “हाँ, अवश्य, किसी किसी पर उनकी कृपा होने से हो सकता है, दोनों बातें हो सकती हैं।”

पंचवटी के नीचे आप मणि से फिर वार्तालाप करने लगे। दस बजे का समय होगा।

मणि – अच्छा, क्या निराकार की साधना नहीं होती?

श्रीरामकृष्ण – होती क्यों नही? वह रास्ता बड़ा कठिन है। पहले के ऋषि कठिन तपस्या करके तब कहीं ब्रह्मवस्तु का अनुभव कर पाते थे। ऋषियों को कितनी मेहनत करनी पड़ती थी – अपनी कुटिया से सुबह को निकल जाते थे। दिनभर तपस्या करके सन्ध्या के बाद लौटते थे। तब आकर कुछ फल-मूल खाते थे।

“इस साधना में विषयबुद्धि का लेशमात्र रहते सफलता न होगी। रूप, रस, गन्ध, स्पर्श – ये सब विषय मन में जब बिलकुल न रह जाएँ, तब मन शुद्ध होता है। वह शुद्ध मन जो कुछ है, शुद्ध आत्मा भी वही है। मन में कामिनी-कांचन बिलकुल न रह जाएँ।

“तब एक और अवस्था होती है – ‘ईश्वर ही कर्ता हैं, मैं अकर्ता हूँ।’ ‘मेरे बिना काम नहीं चल सकता’ ऐसा भाव तब बिलकुल नहीं रहता – सुख में भी और दुःख में भी।

“किसी मठ के साधु को दुष्टों ने मारा था। मार खाकर वह बेहोश हो गया। चेतना आने पर जब उससे पूछा गया, ‘तुम्हें कौन दूध पिला रहा है?’ तब उसने कहा था, ‘जिन्होंने मुझे मारा था वे ही मुझे अब दूध पिला रहे हैं।’ ”

मणि – जी हाँ, यह जानता हूँ।

१९ दिसम्बर, १८८३ परिच्छेद ६६ ३९१

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१९ दिसम्बर, १८८३ परिच्छेद ६६ ३९१

स्थित-समाधि और उन्मना-समाधि

श्रीरामकृष्ण – नहीं, सिर्फ जानने से ही न होगा, – धारणा भी होनी चाहिए।

“विषयचिन्तन मन को समाधिस्थ नहीं होने देता। विषयबुद्धि का पूरी तरह त्याग होने पर स्थित-समाधि हो जाती है। मेरी देह स्थित-समाधि में छूट सकती है, परन्तु मुझमें भक्ति और भक्तों के साथ कुछ रहने की वासना है। इसीलिए देह पर भी कुछ दृष्टि है।

“एक और है – उन्मना-समाधि। फैले हुए मन को एकाएक समेट लेना। यह तुम समझे?”

मणि – जी हाँ।

श्रीरामकृष्ण – फैले हुए मन को एकाएक समेट लेना, यह समाधि देर तक नहीं रहती। विषय-वासनाएँ आकर समाधिभंग कर देती हैं - योगी का योग भंग हो जाता है।

“उस देश में दीवार के भीतर बिल में नेवला रहता है। बिल में जब रहता है, खूब आराम से रहता है। कोई कोई उसकी पूँछ में ईंट बाँध देते हैं; तब ईंट के कारण वह बिल से निकल पड़ता है। जब जब वह बिल के भीतर जाकर आराम से बैठने की चेष्टा करता है, तब तब ईंट के प्रभाव से बिल से निकल आना पड़ता है। विषयवासना भी ऐसी ही है, योगी को योगभ्रष्ट कर देती है।

“विषयी मनुष्यों की कभी कभी समाधि की अवस्था हो सकती है। सूर्योदय होने पर कमल खिल जाता है, परन्तु सूर्य मेघों से ढक जाने पर फिर वह मुँद जाता है। विषय मेघ हैं।”

प्रणाम करके मणि बेलतला की ओर जा रहे हैं।

बेलतला से लौटने में दोपहर हो गयी। विलम्ब देखकर श्रीरामकृष्ण बेलतला की ओर आ रहे हैं। मणि दरी, आसन, जल का लोटा लेकर लौट रहे हैं। पंचवटी के पास श्रीरामकृष्ण (मणि के प्रति) – मैं जा रहा था, तुम्हें खोजने के लिए। सोचा दिन इतना चढ़ आया, कहीं दीवार फाँदकर भाग तो नहीं गया! तुम्हारी आँखें उस समय जिस प्रकार देखी थीं उससे सोचा, कहीं नारायण शास्त्री की तरह भाग तो नहीं गया! उसके बाद फिर सोचा, नहीं, वह भागेगा नहीं, वह काफी सोच-समझकर काम करता है।

(२)

भीष्मदेव की कथा। योग कब सिद्ध होता है

फिर रात को श्रीरामकृष्ण मणि के साथ बातें कर रहे हैं। राखाल, लाटू, हरीश आदि हैं।

श्रीरामकृष्ण (मणि के प्रति) – अच्छा कोई कोई कृष्णलीला की आध्यात्मिक

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३९२श्रीरामकृष्णवचनामृत१९ दिसम्बर, १८८३

व्याख्या करते हैं। तुम्हारी क्या राय है?

मणि – विभिन्न मतों के रहने से भी क्या हानि है? भीष्मदेव की कहानी आपने कही है। शरशय्या पर देहत्याग के समय उन्होंने कहा था, 'मैं रो क्यों रहा हूँ? वेदना के लिए नहीं। पर जब सोचता हूँ कि साक्षात् नारायण अर्जुन के सारथि बने थे, परन्तु फिर भी पाण्डवों को इतनी विपत्तियाँ झेलनी पड़ीं, तब लगता है कि उनकी लीला कुछ भी समझ नहीं सका, इसीलिए रो रहा हूँ।'

"फिर हनुमान की कथा आपने सुनायी है। हनुमान कहा करते थे, 'मैं वार, तिथि, नक्षत्र आदि कुछ भी नहीं जानता, मैं केवल एक राम का चिन्तन करता हूँ।'

"आपने तो कहा है, दो चीजों के सिवाय और कुछ भी नहीं है, ब्रह्म और शक्ति। और आपने यह भी कहा है, ज्ञान (ब्रह्मज्ञान) होने पर वे दोनों एक ही जान पड़ते हैं। 'एकमेवाद्वितीयम्।'

श्रीरामकृष्ण – हाँ, ठीक! वस्तु प्राप्त करना है सौ काँटेदार जंगल में से जाकर लो या अच्छे रास्ते से जाकर लो।

"अनेकानेक मत अवश्य हैं। नागा * कहा करता था, मतमतान्तर के कारण साधुसेवा न हुई। एक स्थान पर भण्डारा हो रहा था। अनेक साधु-सम्प्रदाय थे! सभी कहते हैं हमारी सेवा पहले हो, उसके बाद दूसरे सम्प्रदायों की। कुछ भी निश्चित न हो सका। अन्त में सभी चले गए और वेश्याओं को खिलाया गया!"

मणि – तोतापुरी महान् व्यक्ति थे।

श्रीरामकृष्ण – हाजरा कहते हैं मामूली। नहीं भाई, वादविवाद से कोई काम नहीं, सभी कहते हैं, 'मेरी घड़ी ठीक चल रही है।'

"देखो, नारायण शास्त्री को प्रबल वैराग्य हुआ था। उतना बड़ा पण्डित – स्त्री को छोड़कर लापता हो गया। मन से कामिनी-कांचन का सम्पूर्ण त्याग करने से तब योग सिद्ध होता है। किसी किसी में योगी के लक्षण दिखते हैं।

"तुम्हें षट्चक्र के बारे में कुछ बता दूँ। योगी षट्चक्र को भेद कर उनकी कृपा से उनका दर्शन करते हैं। षट्चक्र सुना है न?"

मणि – वेदान्त मत में सप्तभूमि।

श्रीरामकृष्ण – वेदान्त-मत नहीं, वेद-मत! षट्चक्र क्या है जानते हो? सूक्ष्म देह के भीतर ये सब पद्म हैं – योगीगण उन्हें देख सकते हैं। जैसे मोम के बने वृक्ष के फल, पत्ते।

मणि – जी हाँ, योगीगण देख सकते हैं। एक पुस्तक में लिखा है – एक प्रकार की


* तोतापुरी

CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

१९ दिसम्बर, १८८३ | परिच्छेद ६६ | ३९३

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१९ दिसम्बर, १८८३परिच्छेद ६६३९३

काँच होती है, जिसके भीतर से देखने पर बहुत छोटी चीजें भी बड़ी दिखती हैं। इसी प्रकार योग द्वारा वे सब सूक्ष्म पद्म देखे जाते हैं।

श्रीरामकृष्ण ने पंचवटी के कमरे में रहने के लिए कहा है। मणि उसी कमरे में रात बिताते हैं। प्रातःकाल उस कमरे में अकेले गा रहे हैं -

(भावार्थ) - "हे गौर, मैं साधन-भजनहीन हूँ। मैं हीन-दीन हूँ, मुझे छूकर पवित्र कर दो! हे गौर, तुम्हारे श्रीचरणों का लाभ होगा, इसी आशा में मेरे दिन बीत गये। हे गौर, तुम्हारे श्रीचरण तो अभी तक नहीं पा सका!"

एकाएक खिड़की की ओर ताककर देखते हैं, श्रीरामकृष्ण खड़े है। "मैं हीन-दीन हूँ, मुझे छूकर पवित्र कर दो" यह वाक्य सुनकर श्रीरामकृष्ण की आँखो में आँसू आ गए।

फिर दूसरा गाना हो रहा है -

(भावार्थ) - "मैं शंख का कुण्डल पहनकर गेरुआ वस्त्र पहनूँगी। मैं योगिनी के वेष में उसी देश में जाऊँगी जहाँ मेरे निर्दय हरि हैं।"

श्रीरामकृष्ण राखाल के साथ घूम रहे हैं।

(३)

'डुबकी लगाओ'

शुक्रवार, २१ दिसम्बर १८८३। प्रातःकाल श्रीरामकृष्ण अकेले बेल के पेड़ के नीचे मणि के साथ वार्तालाप कर रहे हैं। साधना के सम्बन्ध में अनेक गुप्त बातें तथा कामिनी-कांचन के त्याग की बातें हो रही हैं। फिर कभी कभी मन ही गुरु बन जाता है - ये सब बातें बता रहे हैं।

भोजन के बाद पंचवटी में आए हैं - वे सुन्दर पीताम्बर धारण किए हुए हैं। पंचवटी में दो-तीन वैष्णव बाबाजी आए हैं - एक बाउल साधु भी हैं।

तीसरे पहर एक नानकपन्थी साधु आए हैं। हरीश, राखाल भी हैं। साधु निराकारवादी हैं। श्रीरामकृष्ण उन्हें साकार का भी चिन्तन करने के लिए कह रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण साधु से कह रहे हैं, "डुबकी लगाओ; ऊपर ऊपर तैरने से रत्न नहीं मिलते। ईश्वर निराकार हैं तथा साकार भी; साकार का चिन्तन करने से शीघ्र भक्ति प्राप्त होती है। तब फिर निराकार का चिन्तन किया जा सकता है। - जिस प्रकार चिट्ठी को पढ़कर फेंक देते हैं, और उसके बाद उसमें लिखे अनुसार काम करते हैं।"

<div align="center">☐ ☐ ☐</div>

परिच्छेद ६७

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परिच्छेद ६७

दक्षिणेश्वर में बलराम के पिता आदि के साथ

(१)

'बढ़े चलो।' अवतार-तत्व

शनिवार, २२ दिसम्बर १८८३ ई., सबेरे नौ बजे का समय होगा। बलराम के पिता आए हैं। राखाल, हरीश, मास्टर, लाटू यहाँ पर निवास कर रहे हैं। श्यामपुकुर के देवेन्द्र घोष आए हैं। श्रीरामकृष्ण दक्षिण-पूर्ववाले बरामदे में भक्तों के साथ बैठे हैं।

एक भक्त पूछ रहे हैं – भक्ति कैसे हो?

श्रीरामकृष्ण (बलराम के पिता आदि भक्तों के प्रति) – बढ़े चलो। सात फाटकों के बाद राजा विराजमान हैं। सब फाटक पार हो जाने पर ही तो राजा को देख सकोगे।

“मैंने चानक में अन्नपूर्णा की स्थापना के समय द्वारकाबाबू से कहा था, बड़े तालाब में गम्भीर जल में बड़ी बड़ी मछलियाँ हैं। बंसी में लगाकर चारा डालो, उसकी सुगन्ध से बड़ी बड़ी मछलियाँ आ जाएगी। कभी कभी उछल-कूद भी करेंगी। प्रेमभक्ति मानो चारा!

“ईश्वर नरलीला करते हैं। मनुष्य रूप में वे अवतीर्ण होते हैं, जिस प्रकार श्रीकृष्ण, श्रीरामचन्द्र, श्रीचैतन्यदेव। मैंने केशव सेन से कहा था कि मनुष्य में ईश्वर का अधिक प्रकाश है। मैदान में छोटे छोटे गड्ढे रहते हैं; उन गड्ढों के भीतर मछली, केकड़े रहते हैं। मछली, केकड़े खोजना हो तो उन गड्ढों के भीतर खोजना होता है। ईश्वर को खोजना हो तो अवतारों के भीतर खोजना चाहिए।

“उस साढ़े तीन हाथ की मानवदेह में जगन्माता अवतीर्ण होती हैं। गीत में कहा है –

(भावार्थ) – “'श्यामा माँ ने कैसी कल बनायी है। साढ़े तीन हाथ की कल के भीतर कितने ही तमाशे दिखा रही है। स्वयं कल के भीतर रहकर वह रस्सी पकड़कर उसे घूमाती है। कल कहती है कि मैं अपने आप ही घूम रही हूँ। वह नहीं जानती कि उसे कौन घूमा रहा है।'

'परन्तु ईश्वर को जानना हो, अवतार को पहचानना हो तो साधना की आवश्यकता है। तालाब में बड़ी बड़ी मछलियाँ हैं, उनके लिए चारा डालना पड़ता है। दूध में मक्खन

२२ दिसम्बर, १८८३ | परिच्छेद ६७ | ३९५

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२२ दिसम्बर, १८८३परिच्छेद ६७३९५

है, उसे मन्थन करना पड़ता है। राई में तेल है, उसे पेरना पड़ता है। मेहदी से हाथ लाल होता है, उसे पीसना पड़ता है।'

भक्त (श्रीरामकृष्ण के प्रति) – अच्छा, वे साकार हैं या निराकार?

श्रीरामकृष्ण – ठहरो, पहले कलकत्ता तो जाओ, तभी तो जानोगे कि कहाँ है किले का मैदान, कहाँ एशियाटिक सोसायटी है और कहाँ बंगाल बैंक है।

“खड़दा ब्राह्मण-मुहल्ले में जाने के लिए पहले तो खड़दा पहुँचना ही होगा!

“निराकार साधना होगी क्यों नहीं? परन्तु बड़ी कठिन है। कामिनी-कांचन का त्याग हुए बिना नहीं होता! बाहर त्याग, फिर भीतर त्याग! विषयबुद्धि का लवलेश रहते काम नहीं बनेगा।

“साकार की साधना सरल है – परन्तु उतनी सरल भी नहीं है।

“निराकार साधना, ज्ञानयोग की साधना की चर्चा भक्तों के पास नहीं करनी चाहिए। बड़ी कठिनाई से उसे थोड़ीसी भक्ति प्राप्त हो रही है; उसके पास यह कहने से कि सब कुछ स्वप्नतुल्य है, उसकी भक्ति की हानि होती है।

“कबीरदास निराकारवादी थे। शिव, काली, कृष्ण को नहीं मानते थे। वे कहते थे, काली चावल-केला खाती है, कृष्ण गोपियों के हथेली बजाने पर बन्दर की तरह नाचते थे। (सभी हँस पड़े।)

“निराकार साधक मानो पहले दशभुजा का दर्शन करते हैं, उसके बाद चतुर्भुज का, उसके बाद द्विभुज गोपाल का और अन्त में अखण्ड ज्योति का दर्शन कर उसी में लीन होते हैं।

“कहा जाता है, दत्तात्रेय, जड़भरत ब्रह्मदर्शन के बाद नहीं लौटे।

“कहते हैं कि शुकदेव ने उस ब्रह्मसमुद्र की एक बूँद मात्र का आस्वादन किया था। समुद्र की तरंगों की उछल-कूद देखी थी, गर्जना सुनी थी, परन्तु समुद्र में डूबे न थे।

“एक ब्रह्मचारी ने कहा था, बद्रीकेदार के उस पार जाने से शरीर नहीं रहता। उसी प्रकार ब्रह्मज्ञान के बाद फिर शरीर नहीं रहता। इक्कीस दिनों में मृत्यु हो जाती है।

“दीवाल के उस पार अनन्त मैदान है। चार मित्रों ने दीवाल के उस पार क्या है, यह देखने की चेष्टा की। एक-एक व्यक्ति दीवाल पर चढ़ता है; उस मैदान को देखकर ‘हो हो’ करके हँसता हुआ दूसरी ओर कूद जाता है। तीन व्यक्तियों ने कोई खबर न दी। सिर्फ एक ने खबर दी। ब्रह्मज्ञान के बाद भी उसका शरीर रहा, लोकशिक्षा के लिए – जैसे अवतार आदि का।

“हिमालय के घर में पार्वती ने जन्मग्रहण किया, और अपने अनेक रूप पिता को दिखाने लगीं। हिमालय ने कहा, ‘बेटी, ये सब रूप तो देखे। परन्तु तुम्हारा एक ब्रह्मस्वरूप है – उसे एकबार दिखा दो।’ पार्वती ने कहा, ‘पिताजी, यदि तुम ब्रह्मज्ञान

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३९६श्रीरामकृष्णवचनामृत२२ दिसम्बर, १८८३

चाहते हो तो संसार छोड़कर सत्संग करना पड़ेगा।'

“पर हिमालय किसी भी तरह संसार नहीं छोड़ते थे। तब पार्वतीजी ने एक बार अपना ब्रह्मस्वरूप दिखाया। देखते ही गिरिराज एकदम मूर्छित हो गए।

भक्तियोग

“यह जो कुछ कहा, सब तर्क-विचार की बातें हैं। ‘ब्रह्म सत्य जगत् मिथ्या’ यही विचार है। सब स्वप्न की तरह है बड़ा कठिन मार्ग है। इस पथ में उनकी लीला स्वप्न जैसी मिथ्या बन जाती है। फिर ‘मैं’ भी उड़ जाता है। इस पथ में अवतार भी नहीं माना जाता। बड़ा कठिन है। ये सब विचार की बातें भक्तों को अधिक सुननी नहीं चाहिए।

“इसीलिए ईश्वर अवतीर्ण होकर भक्ति का उपदेश देते हैं – शरणागत होने के लिए कहते हैं। भक्ति से, उनकी कृपा से सभी कुछ हो जाता है – ज्ञान, विज्ञान सब कुछ होता है।

“वे लीला कर रहे हैं – वे भक्त के अधीन हैं। ‘माँ भक्त की भक्तिरूपी रस्सी से स्वयं बँधी हुई हैं।’

“ईश्वर कभी चुम्बक बनते हैं, भक्त सूई होता है। फिर कभी भक्त चुम्बक और वे सूई होते हैं। भक्त उन्हें खींच लेते हैं – वे भक्तवत्सल, भक्ताधीन हैं।

“एक मत यह है कि यशोदा तथा अन्य गोपीगण पूर्वजन्म में निराकारवादी थीं। उससे उनकी तृप्ति न हुई, इसीलिए उन्होंने वृन्दावनलीला में श्रीकृष्ण को लेकर आनन्द किया। श्रीकृष्ण ने एक दिन कहा, ‘तुम्हें नित्यधाम का दर्शन कराऊँगा, चलो, यमुना में स्नान करने चलें!’ ज्योंही उन्होंने डुबकी लगायी – एकदम गोलोक का दर्शन! फिर उसके बाद अखण्ड ज्योति का दर्शन! तब यशोदा बोलीं, ‘कृष्ण, ये सब और अधिक देखना नहीं चाहती, अब तेरे उसी मानवरूप का दर्शन करूँगी, तुझे गोदी में लूँगी, खिलाऊँगी!!’

“इसीलिए अवतार में उनका अधिक प्रकाश है। अवतार का शरीर रहते उनकी पूजा-सेवा करनी चाहिए। ‘वह जो कोठरी के भीतर चोर-कोठरी है, भोर होते ही वह उसमें छिप जाएगा रे!’

“अवतार को सभी लोग नहीं पहचान सकते। देहधारण करने पर रोग, शोक, क्षुधा, तृष्णा सभी कुछ होता है, ऐसा लगता है मानो वे हमारी ही तरह हैं! राम सीता के शोध में रोये थे - ‘पंचभूत के फन्दे में पड़कर ब्रह्म भी रोते हैं।’

“पुराण में कहा है, हिरण्याक्ष-वध के बाद वराह-अवतार बच्चों को लेकर रहने लगे – उन्हें स्तनपान करा रहे थे। (सभी हँसे।) स्वधाम में जाने का नाम तक नहीं। अन्त में शिव ने आकर त्रिशूल द्वारा उनके शरीर का विनाश किया, तब वे हँसते हुए स्वधाम में पधारे।”

२२ दिसम्बर, १८८३ | परिच्छेद ६७ | ३९७

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२२ दिसम्बर, १८८३परिच्छेद ६७३९७

(२)

गोपियों का प्रेम

तीसरा प्रहर है। भवनाथ आए हैं। कमरे में राखाल, मास्टर, हरीश आदि हैं।

श्रीरामकृष्ण (भवनाथ के प्रति) – अवतार पर प्रेम होने से ही हो गया। अहा, गोपियों का कैसा प्रेम था!

यह कहकर आप गोपियों के भाव में गाना गा रहे हैं –

(१) (भावार्थ) – “श्याम तुम प्राणों के प्राण हो ...।”
(२) (भावार्थ) – “सखि, मैं घर बिलकुल नहीं जाऊँगी ...।”
(३) (भावार्थ) – “उस दिन, जिस समय तुम वन जा रहे थे, मैं द्वार पर खड़ी थी। प्रिय, इच्छा होती है, गोपाल बनकर तुम्हारा भार अपने सिर पर उठा लूँ! ...”

श्रीरामकृष्ण – रास के बीच में जिस समय श्रीकृष्ण छिप गए, गोपिकाएँ एकदम पागल बन गयीं। एक वृक्ष को देखकर कहती हैं, ‘तुम कोई तपस्वी होगे! श्रीकृष्ण को तुमने अवश्य ही देखा होगा! नहीं तो समाधिमग्न होकर क्यों खड़े हो?’ तृणों से ढकी हुई पृथ्वी को देखकर कहती हैं, ‘हे पृथ्वी, तुमने अवश्य ही उनके दर्शन किये हैं; नहीं तो तुम्हारे रोंगटे क्यों खड़े हुए हैं? अवश्य ही तुमने उनके स्पर्शसुख का उपभोग किया होगा! फिर माधवीलता को देखकर कहती हैं, ‘हे माधवी, मुझे माधव ला दे!’ गोपियों का कैसा प्रेमोन्माद है!

“जब अक्रूर आए और श्रीकृष्ण तथा बलराम मथुरा जाने के लिए रथ पर बैठे, तो गोपीगण रथ के पहिये पकड़कर कहने लगीं, ‘जाने नहीं देंगे।’ ”

इतना कहकर श्रीरामकृष्ण फिर गाना गा रहे हैं –

(भावार्थ) – “रथचक्र को न पकड़ो, न पकड़ो, क्या रथ चक्र से चलता है? इस चक्र के चक्री हरि हैं, जिनके चक्र से जगत् चलता है।”

श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं – ‘ “क्या रथ चक्र से चलता है’ – ये बातें मुझे बहुत ही हृदयस्पर्शी लगती हैं। ‘जिस चक्र से ब्रह्माण्ड घूमता है!’ रथी की आज्ञा से सारथि चलता है!’ ”


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