Skip to content
SarvaKosh
श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished711 pages

Page 414 of 711

Read in context
Page 414

१९ दिसम्बर, १८८३ परिच्छेद ६६ ३९१

स्थित-समाधि और उन्मना-समाधि

श्रीरामकृष्ण – नहीं, सिर्फ जानने से ही न होगा, – धारणा भी होनी चाहिए।

“विषयचिन्तन मन को समाधिस्थ नहीं होने देता। विषयबुद्धि का पूरी तरह त्याग होने पर स्थित-समाधि हो जाती है। मेरी देह स्थित-समाधि में छूट सकती है, परन्तु मुझमें भक्ति और भक्तों के साथ कुछ रहने की वासना है। इसीलिए देह पर भी कुछ दृष्टि है।

“एक और है – उन्मना-समाधि। फैले हुए मन को एकाएक समेट लेना। यह तुम समझे?”

मणि – जी हाँ।

श्रीरामकृष्ण – फैले हुए मन को एकाएक समेट लेना, यह समाधि देर तक नहीं रहती। विषय-वासनाएँ आकर समाधिभंग कर देती हैं - योगी का योग भंग हो जाता है।

“उस देश में दीवार के भीतर बिल में नेवला रहता है। बिल में जब रहता है, खूब आराम से रहता है। कोई कोई उसकी पूँछ में ईंट बाँध देते हैं; तब ईंट के कारण वह बिल से निकल पड़ता है। जब जब वह बिल के भीतर जाकर आराम से बैठने की चेष्टा करता है, तब तब ईंट के प्रभाव से बिल से निकल आना पड़ता है। विषयवासना भी ऐसी ही है, योगी को योगभ्रष्ट कर देती है।

“विषयी मनुष्यों की कभी कभी समाधि की अवस्था हो सकती है। सूर्योदय होने पर कमल खिल जाता है, परन्तु सूर्य मेघों से ढक जाने पर फिर वह मुँद जाता है। विषय मेघ हैं।”

प्रणाम करके मणि बेलतला की ओर जा रहे हैं।

बेलतला से लौटने में दोपहर हो गयी। विलम्ब देखकर श्रीरामकृष्ण बेलतला की ओर आ रहे हैं। मणि दरी, आसन, जल का लोटा लेकर लौट रहे हैं। पंचवटी के पास श्रीरामकृष्ण (मणि के प्रति) – मैं जा रहा था, तुम्हें खोजने के लिए। सोचा दिन इतना चढ़ आया, कहीं दीवार फाँदकर भाग तो नहीं गया! तुम्हारी आँखें उस समय जिस प्रकार देखी थीं उससे सोचा, कहीं नारायण शास्त्री की तरह भाग तो नहीं गया! उसके बाद फिर सोचा, नहीं, वह भागेगा नहीं, वह काफी सोच-समझकर काम करता है।

(२)

भीष्मदेव की कथा। योग कब सिद्ध होता है

फिर रात को श्रीरामकृष्ण मणि के साथ बातें कर रहे हैं। राखाल, लाटू, हरीश आदि हैं।

श्रीरामकृष्ण (मणि के प्रति) – अच्छा कोई कोई कृष्णलीला की आध्यात्मिक