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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished711 pages

Page 408 of 711

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Page 408
१७ दिसम्बर, १८८३परिच्छेद ६४३८५

हुईं।

श्रीरामकृष्ण उठकर बैठ गए और भक्तों के साथ बातचीत करने लगे।

श्रीरामकृष्ण (मणि से) – मैं ‘राम राम’ कहकर पागल हो गया था। संन्यासी के देवता रामलला को लेकर घूमता फिरता था – उसे नहलाता था, खिलाता था, सुलाता था। जहाँ कहीं जाता, साथ ले जाता था। ‘रामलला’ ‘रामलला’ कहकर पागल हो गया था।

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