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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

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DevanagariHindipublished711 pages

Page 406 of 711

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Page 406

परिच्छेद ६४

जीवनोद्देश्य – ईश्वरदर्शन

दूसरे दिन सोमवार, १७ दिसम्बर १८८३, सबेरे आठ बजे का समय होगा। श्रीरामकृष्ण उसी कमरे में बैठे हुए हैं। राखाल, लाटू आदि भक्त भी हैं। मणि फर्श पर बैठे हैं। मधु डाक्टर भी आये हुए हैं। वे श्रीरामकृष्ण के पास उसी छोटी खाट पर बैठे हैं। मधु डाक्टर वयोवृद्ध हैं – श्रीरामकृष्ण को कोई बीमारी होने पर प्रायः ये आकर देख जाया करते हैं। स्वभाव के बड़े रसिक हैं।

श्रीरामकृष्ण – बात है सच्चिदानन्द पर प्रेम। कैसा प्रेम? – ईश्वर को किस तरह प्यार करना चाहिए? गौरी पण्डित कहता था, राम को जानना हो तो सीता की तरह होना चाहिए। भगवान् को जानने के लिए भगवती की तरह होना चाहिए। भगवती ने शिव के लिए जैसी कठोर तपस्या की थी, वैसी ही तपस्या करनी चाहिए। पुरुष को जानने का अभिप्राय हो तो प्रकृतिभाव का आश्रय लेना पड़ता है – सखीभाव, दासीभाव, मातृभाव।

“मैंने सीतामूर्ति के दर्शन किए थे। देखा, सब मन राम में ही लगा हुआ है। योनि, हाथ, पैर, कपड़े-लत्ते, किसी पर दृष्टि नहीं है। मानो जीवन ही राममय है – राम के बिना रहे, राम को बिना पाए, जी नहीं सकती।”

मणि – जी हाँ, जैसे पगली!

श्रीरामकृष्ण – उन्मादिनी! – अहा! ईश्वर को प्राप्त करना हो तो पागल होना पड़ता है।

“कामिनी-कांचन पर मन के रहने से नहीं होता। कामिनी के साथ रमण - इसमें क्या सुख है? ईश्वरदर्शन होने पर रमण सुख से करोड़गुना आनन्द होता है। गौरी कहता था, महाभाव होने पर शरीर के सब छिद्र – रोमकूप भी – महायोनि हो जाते हैं। एक-एक छिद्र में आत्मा के साथ आत्मा का रमण-सुख होता है!

“व्याकुल होकर उन्हें पुकारना चाहिए। गुरु के श्रीमुख से सुन लेना चाहिए कि वे क्या करने से मिलेंगे।

“गुरु तभी मार्ग बतला सकेंगे जब वे स्वयं पूर्णज्ञानी होंगे। पूर्णज्ञान होने पर वासना चली जाती है। पाँच वर्ष के बालक का-सा स्वभाव हो जाता है। दत्तात्रेय और जड़भरत, ये बालस्वभाव के थे।”