श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
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Read in context| १९ दिसम्बर, १८८३ | परिच्छेद ६६ | ३९३ |
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काँच होती है, जिसके भीतर से देखने पर बहुत छोटी चीजें भी बड़ी दिखती हैं। इसी प्रकार योग द्वारा वे सब सूक्ष्म पद्म देखे जाते हैं।
श्रीरामकृष्ण ने पंचवटी के कमरे में रहने के लिए कहा है। मणि उसी कमरे में रात बिताते हैं। प्रातःकाल उस कमरे में अकेले गा रहे हैं -
(भावार्थ) - "हे गौर, मैं साधन-भजनहीन हूँ। मैं हीन-दीन हूँ, मुझे छूकर पवित्र कर दो! हे गौर, तुम्हारे श्रीचरणों का लाभ होगा, इसी आशा में मेरे दिन बीत गये। हे गौर, तुम्हारे श्रीचरण तो अभी तक नहीं पा सका!"
एकाएक खिड़की की ओर ताककर देखते हैं, श्रीरामकृष्ण खड़े है। "मैं हीन-दीन हूँ, मुझे छूकर पवित्र कर दो" यह वाक्य सुनकर श्रीरामकृष्ण की आँखो में आँसू आ गए।
फिर दूसरा गाना हो रहा है -
(भावार्थ) - "मैं शंख का कुण्डल पहनकर गेरुआ वस्त्र पहनूँगी। मैं योगिनी के वेष में उसी देश में जाऊँगी जहाँ मेरे निर्दय हरि हैं।"
श्रीरामकृष्ण राखाल के साथ घूम रहे हैं।
(३)
'डुबकी लगाओ'
शुक्रवार, २१ दिसम्बर १८८३। प्रातःकाल श्रीरामकृष्ण अकेले बेल के पेड़ के नीचे मणि के साथ वार्तालाप कर रहे हैं। साधना के सम्बन्ध में अनेक गुप्त बातें तथा कामिनी-कांचन के त्याग की बातें हो रही हैं। फिर कभी कभी मन ही गुरु बन जाता है - ये सब बातें बता रहे हैं।
भोजन के बाद पंचवटी में आए हैं - वे सुन्दर पीताम्बर धारण किए हुए हैं। पंचवटी में दो-तीन वैष्णव बाबाजी आए हैं - एक बाउल साधु भी हैं।
तीसरे पहर एक नानकपन्थी साधु आए हैं। हरीश, राखाल भी हैं। साधु निराकारवादी हैं। श्रीरामकृष्ण उन्हें साकार का भी चिन्तन करने के लिए कह रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण साधु से कह रहे हैं, "डुबकी लगाओ; ऊपर ऊपर तैरने से रत्न नहीं मिलते। ईश्वर निराकार हैं तथा साकार भी; साकार का चिन्तन करने से शीघ्र भक्ति प्राप्त होती है। तब फिर निराकार का चिन्तन किया जा सकता है। - जिस प्रकार चिट्ठी को पढ़कर फेंक देते हैं, और उसके बाद उसमें लिखे अनुसार काम करते हैं।"
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