श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
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Read in context३८२ श्रीरामकृष्णवचनामृत १६ दिसम्बर, १८८३
में श्रीरामकृष्ण बैठे हुए हैं। फर्श पर मणि बैठे हुए हैं। शाम होते होते वेदान्त के सम्बन्ध की जो बात मणि ने उठायी थी उसी के बारे में श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण (मणि से) – संसार मिथ्या क्यों होने लगा? यह सब विचार की बात है। उनके दर्शन हो जाने पर ही समझ में आता है कि जीव-प्रपंच सब वही हुए हैं।
“मुझे माँ ने कालीमन्दिर में दिखलाया कि माँ ही सब कुछ हुई हैं। दिखाया, सब चिन्मय है। प्रतिमा चिन्मय है! वेदी चिन्मय है! अर्घ्यपात्र चिन्मय है! चौखट, संगमर्मर पत्थर – सब कुछ चिन्मय है!
“मन्दिर के भीतर मैंने देखा, सब मानो रस से सराबोर हैं – सच्चिदानन्द-रस से।
“कालीमन्दिर के सामने एक दुष्ट आदमी को देखा – परन्तु उसके भीतर भी उनकी शक्ति जाज्वल्यमान देखी!
“इसीलिए तो मैंने बिल्ली को उनके भोग की पूड़ियाँ खिलायी थीं। देखा, माँ ही सब कुछ हुई हैं। - बिल्ली भी। तब खजांची ने मथुरबाबू को लिखा कि भट्टाचार्य महाशय भोग की पूड़ियाँ बिल्लियों को खिलाते हैं। मथुरबाबू मेरी अवस्था समझते थे। चिट्ठी के उत्तर में उन्होंने लिखा, ‘वे जो कुछ करें, उसमें कुछ बाधा न देना।’
“उन्हें पा जाने पर यह सब ठीक ठीक दीख पड़ता है; वही जीव, जगत्, चौबीसों तत्त्व – यह सब हुए हैं।
“परन्तु, यदि वे ‘मैं’ को बिलकुल मिटा दें, तब क्या होता है, यह मुँह से नहीं कहा जा सकता। जैसे रामप्रसाद ने कहा है – ‘तब तुम अच्छी हो या मैं अच्छा हूँ यह तुम्हीं समझोगी।’
“वह अवस्था भी मुझे कभी कभी होती है।
“विचार करने से एक तरह का दर्शन होता है और जब वे दिखा देते हैं तब एक दूसरे तरह का।”