श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
Public domain in India · Report a copyright issue
Page 415 of 711
Read in contextDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri
| ३९२ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | १९ दिसम्बर, १८८३ |
|---|
व्याख्या करते हैं। तुम्हारी क्या राय है?
मणि – विभिन्न मतों के रहने से भी क्या हानि है? भीष्मदेव की कहानी आपने कही है। शरशय्या पर देहत्याग के समय उन्होंने कहा था, 'मैं रो क्यों रहा हूँ? वेदना के लिए नहीं। पर जब सोचता हूँ कि साक्षात् नारायण अर्जुन के सारथि बने थे, परन्तु फिर भी पाण्डवों को इतनी विपत्तियाँ झेलनी पड़ीं, तब लगता है कि उनकी लीला कुछ भी समझ नहीं सका, इसीलिए रो रहा हूँ।'
"फिर हनुमान की कथा आपने सुनायी है। हनुमान कहा करते थे, 'मैं वार, तिथि, नक्षत्र आदि कुछ भी नहीं जानता, मैं केवल एक राम का चिन्तन करता हूँ।'
"आपने तो कहा है, दो चीजों के सिवाय और कुछ भी नहीं है, ब्रह्म और शक्ति। और आपने यह भी कहा है, ज्ञान (ब्रह्मज्ञान) होने पर वे दोनों एक ही जान पड़ते हैं। 'एकमेवाद्वितीयम्।'
श्रीरामकृष्ण – हाँ, ठीक! वस्तु प्राप्त करना है सौ काँटेदार जंगल में से जाकर लो या अच्छे रास्ते से जाकर लो।
"अनेकानेक मत अवश्य हैं। नागा * कहा करता था, मतमतान्तर के कारण साधुसेवा न हुई। एक स्थान पर भण्डारा हो रहा था। अनेक साधु-सम्प्रदाय थे! सभी कहते हैं हमारी सेवा पहले हो, उसके बाद दूसरे सम्प्रदायों की। कुछ भी निश्चित न हो सका। अन्त में सभी चले गए और वेश्याओं को खिलाया गया!"
मणि – तोतापुरी महान् व्यक्ति थे।
श्रीरामकृष्ण – हाजरा कहते हैं मामूली। नहीं भाई, वादविवाद से कोई काम नहीं, सभी कहते हैं, 'मेरी घड़ी ठीक चल रही है।'
"देखो, नारायण शास्त्री को प्रबल वैराग्य हुआ था। उतना बड़ा पण्डित – स्त्री को छोड़कर लापता हो गया। मन से कामिनी-कांचन का सम्पूर्ण त्याग करने से तब योग सिद्ध होता है। किसी किसी में योगी के लक्षण दिखते हैं।
"तुम्हें षट्चक्र के बारे में कुछ बता दूँ। योगी षट्चक्र को भेद कर उनकी कृपा से उनका दर्शन करते हैं। षट्चक्र सुना है न?"
मणि – वेदान्त मत में सप्तभूमि।
श्रीरामकृष्ण – वेदान्त-मत नहीं, वेद-मत! षट्चक्र क्या है जानते हो? सूक्ष्म देह के भीतर ये सब पद्म हैं – योगीगण उन्हें देख सकते हैं। जैसे मोम के बने वृक्ष के फल, पत्ते।
मणि – जी हाँ, योगीगण देख सकते हैं। एक पुस्तक में लिखा है – एक प्रकार की
* तोतापुरी
CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar