श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
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Read in context१६ दिसम्बर, १८८३ परिच्छेद ६३ ३७९
मुखर्जी (अपने मित्र से सहास्य) – “शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते।”
श्रीरामकृष्ण – वे चाहे तो ज्ञानी को संसार में भी रख सकते हैं। उन्हीं की इच्छा से यह जीव-प्रपंच हुआ है। वे इच्छामय हैं।
मुखर्जी (सहास्य) – उनकी फिर कैसी इच्छा? क्या उन्हें भी कोई अभाव है?
श्रीरामकृष्ण (सहास्य) – इसमें दोष ही क्या है? पानी स्थिर रहे तो भी वह पानी है और जीव-जगत क्या मिथ्या है? तरंगें उठने पर भी वह पानी ही है।
“साँप चुपचाप कुण्डली बाँधकर बैठा रहे, तो भी वह साँप है और तिर्यग्-गति हो, टेढ़ा-मेढ़ा रेंगने से भी वह साँप ही है।
“बाबू जब चुपचाप बैठे रहते हैं, तब वे जो मनुष्य हैं, वही मनुष्य वे उस समय भी हैं जब वे काम करते हैं।
“जीव-प्रपंच को अलग कैसे कर सकते हो? इस तरह वजन तो घट जाएगा! बेल के बीज और खोपड़ा निकाल देने से पूरे बेल का वजन ठीक नहीं उतरता।
“ब्रह्म निर्लिप्त है। सुगन्ध और दुर्गन्ध वायु से मिलती है, परन्तु वायु निर्लिप्त है। ब्रह्म और शक्ति अभेद हैं। उसी आद्याशक्ति से जीव-प्रपंच बना है।”
मुखर्जी – योगभ्रष्ट क्यों होते हैं?
श्रीरामकृष्ण – कहते हैं न ‘जब मैं गर्भ में था तब योग में था, पृथ्वी पर गिरते ही मिट्टी खायी। धाई ने तो मेरा नार काटा; पर यह माया की बेड़ी कैसे काटूँ?’
“कामिनी-कांचन ही माया है। मन से इन दोनों के जाते ही योग होता है। आत्मा – परमात्मा – चुम्बक पत्थर है, जीवात्मा एक सूई है – उनके खींच लेने ही से योग हो गया। परन्तु सूई में अगर मिट्टी लगी हुई हो, तो चुम्बक नहीं खींचता – मिट्टी साफ कर देने से फिर खींचता है। कामिनी-कांचन मिट्टी है, इसे साफ करना चाहिए।”
मुखर्जी – यह किस तरह साफ हो?
श्रीरामकृष्ण – उनके लिए व्याकुल होकर रोओ। वही जल मिट्टी पर गिरने से मिट्टी धुल जाएगी। जब खूब साफ हो जाएगी तब चुम्बक खींच लेगा। योग तभी होगा।
मुखर्जी – अहा! कैसी बात है!
श्रीरामकृष्ण – उनके लिए रो सकने पर उनके दर्शन होते हैं – समाधि होती है। योग में सिद्ध होने से ही समाधि होती है। रोने से कुम्भक आप ही आप होता है। – उसके बाद समाधि।
“एक उपाय और है – ध्यान। सहस्त्रार कमल (मस्तक) में विशेष रूप से शिव का अधिष्ठान है – उसका ध्यान। शरीर आधार है और मन-बुद्धि जल। इस पानी पर उस सच्चिदानन्द सूर्य का बिम्ब गिरता है! उसी बिम्बसूर्य का ध्यान करते करते उनकी कृपा से यथार्थ सूर्य के भी दर्शन होते हैं।