श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
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Read in contextपरिच्छेद ६७
दक्षिणेश्वर में बलराम के पिता आदि के साथ
(१)
'बढ़े चलो।' अवतार-तत्व
शनिवार, २२ दिसम्बर १८८३ ई., सबेरे नौ बजे का समय होगा। बलराम के पिता आए हैं। राखाल, हरीश, मास्टर, लाटू यहाँ पर निवास कर रहे हैं। श्यामपुकुर के देवेन्द्र घोष आए हैं। श्रीरामकृष्ण दक्षिण-पूर्ववाले बरामदे में भक्तों के साथ बैठे हैं।
एक भक्त पूछ रहे हैं – भक्ति कैसे हो?
श्रीरामकृष्ण (बलराम के पिता आदि भक्तों के प्रति) – बढ़े चलो। सात फाटकों के बाद राजा विराजमान हैं। सब फाटक पार हो जाने पर ही तो राजा को देख सकोगे।
“मैंने चानक में अन्नपूर्णा की स्थापना के समय द्वारकाबाबू से कहा था, बड़े तालाब में गम्भीर जल में बड़ी बड़ी मछलियाँ हैं। बंसी में लगाकर चारा डालो, उसकी सुगन्ध से बड़ी बड़ी मछलियाँ आ जाएगी। कभी कभी उछल-कूद भी करेंगी। प्रेमभक्ति मानो चारा!
“ईश्वर नरलीला करते हैं। मनुष्य रूप में वे अवतीर्ण होते हैं, जिस प्रकार श्रीकृष्ण, श्रीरामचन्द्र, श्रीचैतन्यदेव। मैंने केशव सेन से कहा था कि मनुष्य में ईश्वर का अधिक प्रकाश है। मैदान में छोटे छोटे गड्ढे रहते हैं; उन गड्ढों के भीतर मछली, केकड़े रहते हैं। मछली, केकड़े खोजना हो तो उन गड्ढों के भीतर खोजना होता है। ईश्वर को खोजना हो तो अवतारों के भीतर खोजना चाहिए।
“उस साढ़े तीन हाथ की मानवदेह में जगन्माता अवतीर्ण होती हैं। गीत में कहा है –
(भावार्थ) – “'श्यामा माँ ने कैसी कल बनायी है। साढ़े तीन हाथ की कल के भीतर कितने ही तमाशे दिखा रही है। स्वयं कल के भीतर रहकर वह रस्सी पकड़कर उसे घूमाती है। कल कहती है कि मैं अपने आप ही घूम रही हूँ। वह नहीं जानती कि उसे कौन घूमा रहा है।'
'परन्तु ईश्वर को जानना हो, अवतार को पहचानना हो तो साधना की आवश्यकता है। तालाब में बड़ी बड़ी मछलियाँ हैं, उनके लिए चारा डालना पड़ता है। दूध में मक्खन