ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
About this granth
The Rigveda (ऋग्वेद) is the oldest of the four Vedas and the earliest surviving text of the Indian tradition. Its Samhita is arranged in ten mandalas containing more than a thousand hymns (suktas) addressed to Agni, Indra, Varuna, Mitra, Soma, Ushas, the Maruts, the Ribhus, the Vishvedevas and other deities, along with reflections on creation, generosity, marriage and society. Hymns such as the Nasadiya and the Purusha Sukta are often taken as the starting points of Indian philosophy.
This edition is by Dr. Ganga Sahay Sharma, a scholar with degrees in Hindi and Sanskrit and the title of Vyakaranacharya, published by Sanskrit Sahitya Prakashan, New Delhi, as part of a four-Veda set. Each hymn is headed by its number and deity, followed by the Sanskrit mantras and a simple Hindi rendering of their sense. A list of hymns, their subjects and the number of mantras is given at the front.
The Hindi is plain and close to everyday speech, which makes this edition a good first approach to the meaning of the mantras for readers not ready for a traditional commentary. The complete text, about 1,855 pages, can be read here page by page.
इंद्र सच्चे धनदाता हैं, इसलिए पात्रों को पूरा भरकर मधुर सोमरस दो. इंद्र धरती से भी
अधिक विस्तृत हैं. मानव हितकारी इंद्र अपने कार्यों और पुरुषार्थ से बढ़ते हैं. (७)
व्यानळिन्द्रः पृतनाः स्वोजा आस्मै यतन्ते सख्याय पूर्वीः.
आ स्मा रथं न पृतनासु तिष्ठ यं भद्रया सुमत्या चोदयासे.. (८)
शोभन शक्ति वाले इंद्र ने शत्रुसेना को घेर लिया. शत्रुओं के श्रेष्ठ सैनिक इंद्र से मित्रता
करने का यत्न करते हैं. हे इंद्र! तुम जिस प्रकार पूर्वकाल में बुद्धिमान् आदमी के समान युद्ध
के लिए रथ पर चढ़ते रहे हो, उसी प्रकार आज भी इस यज्ञ में आने के लिए आदर के साथ
अपने रथ पर बैठो. (८)
सूक्त—३० देवता—जल
प्र देवत्रा ब्रह्मणे गातुरेत्वपो अच्छा मनसो न प्रयुक्ति.
महीं मित्रस्य वरुणस्य धासिं पृथुञ्जयसे रीरधा सुवृक्तिम्.. (१)
यज्ञ के समय सोमरस देवों के निमित्त उस प्रकार शीघ्र जल की ओर जावें, जिस प्रकार
मन तेज चलता है. हे अध्वर्युजनो! मित्र एवं विस्तृत गति इंद्र के लिए महान् सोम को शुद्ध
करो. (१)
अध्वर्यवो हविष्मन्तो हि भूताच्छाप इतोषतीरुशन्तः.
अव याश्चष्टे अरुणः सुपर्णस्तमास्यध्वमूर्मिमद्य सुहस्ताः.. (२)
हे हव्य धारण करने वाले अध्वर्युजनो! तुम सोम से युक्त हो जाओ. सोमरस निचोड़ने
की अभिलाषा करने वाले तुम सोमरस की कामना करने वाले जलों की ओर जाओ. हे सुंदर
हाथों वाले अध्वर्युजनो! यह सोम लाल रंग के पक्षी की तरह नीचे गिरता है, उसे तरंग के रूप
में दशापवित्र पर डालो. (२)
अध्वर्यवोऽप इता समुद्रमपां नपातं हविषा यजध्वम्.
स वो दददूर्मिमद्य सुपूर्तं तस्मै सोमं मधुमन्तं सुनोत.. (३)
हे अध्वर्युजनो! यहां से जलपूर्ण सागर में जाओ तथा जलों के नाती अर्थात् अग्नि देव
का होम करो. वे अग्नि आज तुम्हें अत्यंत शुद्ध जल की लहरें प्रदान करें तुम उनके लिए मधुर
सोमरस निचोड़ो. (३)
यो अनिध्मो दीदयदप्स्व१न्तर्यं विप्रास ईळते अध्वरेषु.
अपां नपान्मधुमतीरपो दा याभिरिन्द्रो वावृधे वीर्याय.. (४)
जो जल के नाती अग्नि देव जलों के भीतर काष्ठों के बिना भी जलते हैं एवं ब्राह्मण
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यज्ञों में जिनकी स्तुति करते हैं, वे हमें ऐसा मधुर जल दें, जिसे पीकर इंद्र वीरता के कर्म करने
के लिए बढ़ें. (४)
याभिः सोमो मोदते हर्षते च कल्याणीभिर्युवतिभिर्न मर्यः.
ता अध्वर्यो अपो अच्छा परेहि यदासिश्चा ओषधीभिः पुनीतात्.. (५)
हे अध्वर्युजनो! जिस प्रकार सुंदरी युवतियों से मिलकर पुरुष हर्षित और प्रसन्न होते हैं,
उसी प्रकार जिन जलों से मिलकर सोम मुदित होते हैं, उन्हीं जलों को लाने के लिए जाओ.
लाए हुए जलों से सोम को धोओ और सोम के साथ-साथ दशापवित्र को शुद्ध करो. (५)
एवेद्शूने युवतयो नमन्त यदीमुशनूशतीरेत्यच्छ.
सं जानते मनसा सं चिकित्रेऽध्वर्यवो धिषणापश्च देवीः.. (६)
जिस प्रकार अभिलाषापूर्ण युवक, पुरुष की कामना करने वाली युवती को पाकर नम्र
हो जाता है, उसी प्रकार जल सोम की ओर अनुकूल बनकर बहते हैं. अध्वर्युजनों एवं उनकी
स्तुतियों से जलदेव का विशेष परिचय है. दोनों एक-दूसरे के उपकार को देखते हैं. (६)
यो वो वृताभ्यो अकृणोदु लोकं यो वो मह्या अभिशस्तेरमुञ्चत्.
तस्मा इन्द्राय मधुमन्तमूर्मिं देवमादनं प्र हिणोतनापः.. (७)
हे जलो! जिस इंद्र ने तुम्हारे मेघ द्वारा घिरे होने पर निकलने के लिए मार्ग बनाया एवं
जिसने तुम्हें मेघ की कठिन पकड़ से छुड़ाया, उसी इंद्र के लिए मधुरतापूर्ण तथा देवों को
प्रमुदित करने वाली अपनी लहर भेजो. (७)
प्रास्मै हिनोत मधुमन्तमूर्मिं गर्भो यो वः सिन्धवो मध्व उत्सः.
घृतपृष्ठमीड्यमध्वरेष्वापो रेवतीः शृणुता हवं मे.. (८)
हे बहने वाले जलो! तुम्हारे गर्भ के समान मधुर रस वाला जो झरना है, उसकी मधुर
तरंग को इंद्र के लिए भेजो. हे धनयुक्त जलो! मेरी पुकार सुनो. तुम्हारी तरंग यज्ञों में घृतयुक्त
एवं प्रशंसनीय है. (८)
तं सिन्धवो मत्सरमिन्द्रपानमूर्मिं प्र हेत य उभे इयर्ति.
मदच्युतमौशानं नभोजां परि त्रितन्तुं विचरन्तमूत्सम्.. (९)
हे बहने वाले जलो! तुम्हारी जो तरंग इस लोक और परलोक—दोनों के लिए लाभ
करती है, उसी मदकारिणी तरंग को इंद्र के पान के लिए भेजो. तुम्हारी तरंग नशा करने
वाली, सोम के साथ मिलने की इच्छुक, अंतरिक्ष में उत्पन्न एवं तीनों लोकों में घूमने के लिए
ऊपर जाती है. (९)
आवर्वततीरध नु द्विधारा गोषुयुधो न नियवं चरन्तीः.
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ऋषे जनित्रीर्भुवनस्य पत्नीरपो वन्दस्व सवृधः सयोनीः.. (१०)
हे अध्वर्यु! ऐसे जलों की वंदना करो, जो जल के लिए युद्ध करने वाले इंद्र की आज्ञा से
अनेक धाराओं में गिरकर सोमरस में मिलना चाहते हैं, जो संसार को उत्पन्न करने वाले एवं
रक्षक हैं तथा जो सोम के साथ एक ही स्थान में बढ़ते हैं. (१०)
हिनोता नो अध्वरं देवयज्जा हिनोत ब्रह्म सनये धनानाम्.
ऋतस्य योगे वि ष्यध्वमूधः शृष्टीवरीर्भूतनास्मभ्यमापः.. (११)
हे ऋत्विजो! देवपूजा के लिए हमारे यज्ञ को प्रेरित करो, धनप्राप्ति के लिए हमारे पास
स्तुतियां भेजो एवं यज्ञ के अवसर पर हमारे लिए सोमरस से भरा हुआ चर्मपात्र खोलो. हे
ऋत्विजों द्वारा छोड़े जाते हुए जल! तुम हमारे लिए सुखकर बनो. (११)
आपो रेवतीः क्षयथा हि वस्वः क्रतुं च भद्रं बिभृथामृतं च.
रायश्च स्थ स्वपत्यस्य पत्नीः सरस्वती तद्गृणते वयो धात्.. (१२)
हे धनयुक्त जल! तुम धन के निवास हो. हमारे इस कल्याणकारी यज्ञ को पूरा करके
हमारे लिए अमृत लाओ. तुम हमारे धन एवं शोभन संतान के पालक बनो. सरस्वती स्तोता
को धन दें. (१२)
प्रति यदापो अदृशमायतीर्घृतं पयांसि बिभ्रतीर्मधूनि.
अध्वर्युभिर्मनसा संविदाना इन्द्राय सोमं सुषुतं भरन्तीः.. (१३)
हे जल! मैं देखता हूं कि तुम मेरे यज्ञ की ओर आते हुए घृत, दूध एवं शहद लाते हो.
अध्वर्यु हमारे साथ सच्चे मन से बात करते हैं तथा तुम भली प्रकार निचोड़ा हुआ सोम इंद्र के
लिए धारण करते हो. (१३)
एमा अग्मन्नेवतीर्जीवधन्या अध्वर्यवः सादयता सखायः.
नि बर्हिषि धत्तन सोम्यासोऽपां नप्त्रा संविदानास एनाः.. (१४)
हे अध्वर्यु मित्रो! धन से युक्त व जीवों के लिए लाभकारी जल हमारे यज्ञ की ओर आ
रहे हैं. तुम जल को स्थापित करो. इन जलों का वर्षा के देव अर्थात् अपांनपात् से परिचय है.
सोमरस से मिलाने योग्य इस जल को कुशों पर स्थापित करो. (१४)
आगमन्नाप उशतीर्बर्हिरिदं न्यध्वरे असदन्देवयन्तीः.
अध्वर्यवः सुनुतेन्द्राय सोममभूदु वः सुशका देवयज्या.. (१५)
कामना करता हुआ जल हमारे यज्ञ की वेदी पर बिछे कुशों पर आता है एवं देवों को
प्रसन्न करने की अभिलाषा से स्थित होता है. हे अध्वर्युजनो! ऐसा जानकर तुम इंद्र के लिए
सोमरस निचोड़ो. जल के आने के कारण ही इस समय तुम्हारा देवयज्ञ सरल हो सका है.
सूक्त—३१ देवता—विश्वेदेव
(१५)
सूक्त—३१ देवता—विश्वेदेव
आ नो देवानामुप वेतु शंसो विश्वेभिस्तुरैरवसे यजत्रः.
तेभिर्वयं सुसखायो भवेम तरन्तो विश्वा दुरिता स्याम.. (१)
हम स्तोताओं के स्तुतियोग्य एवं यज्ञपात्र इंद्र शीघ्रगामी मरुतों के साथ हमारी रक्षा के
लिए आवें. हम उन देवों के शोभन सखा बनें एवं सभी पापों से पार हो जावें. (१)
परि चिन्मर्तो द्रविणं ममन्यादृतस्य पथा नमसा विवासेत्.
उत स्वेन क्रतुना सं वदेत श्रेयांसं दक्षं मनसा जगृभ्यात्.. (२)
मनुष्य सभी प्रकार से देवयज्ञ के लिए धन की अभिलाषा करें एवं धन पाकर हव्य द्वारा
यज्ञ के मार्ग से देवों की सेवा करें. वे अपने ज्ञान से देवों का ध्यान करें एवं अति प्रशंसनीय
तथा सर्वव्यापक अंतरात्मा को मन से ग्रहण करें. (२)
अधायि धीतिरसमृग्रमंशास्तीर्थे न दस्ममुप यन्त्यूमाः.
अभ्यानशम सुवितस्य शूंषं नवेदसो अमृतानामभूम.. (३)
देवयज्ञ की क्रिया आरंभ हो गई है. जिस प्रकार तीर्थ में तर्पण वाले जल के अंश देवों के
पास जाते हैं, उसी प्रकार हमारे दिए हुए तृप्तिकारक हव्य दर्शनीय एवं छोटे-बड़े देवों के पास
जाते हैं. हमने विस्तृत स्वर्ग का सुख पाया है और हम देवों का स्वरूप जानने वाले बनें. (३)
नित्यश्चाकन्यात् स्वपतिर्दमूना यस्मा उ देवः सविता जजान.
भगो वा गोभिर्यमेमनज्यात्सो अस्मै चारुश्छदयदुत स्यात्.. (४)
अपनी प्रजाओं के स्वामी प्रजापति दानोत्सुक होकर फल देने की अभिलाषा करें.
यज्ञकर्त्ता को सविता देव ने फल दिया है. स्तुति द्वारा प्रसन्न इंद्र एवं अर्यमा मुझे फल दें. सुंदर
रूप वाले सभी देव मुझे फल दें. (४)
इयं सा भूया उषासामिव क्षा यद्ध क्षुमन्तः शवसा समायन्.
अस्य स्तुतिं जरितुर्भिक्षमाणा आ नः शग्मास उपयन्तु वाजाः.. (५)
जिस समय स्तुति अभिलाषी देवगण शब्द करते हुए तेज चाल से मेरे पास आए, उस
समय यह धरती प्रातःकाल के प्रकाश से भर गई. सुखकारक अन्न हमारे पास आवे. (५)
अस्येदेषा सुमतिः पप्रथानाभवत्पूर्व्या भूमना गौः.
अस्य सनीळा असुरस्य योनौ समान आ भरणे बिभ्रमाणाः.. (६)
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इस समय हमारी देवस्तुति देवों के पास जाने के लिए पहले के समान विस्तृत हो रही है.
मुझ शक्ति के यज्ञ में सब देव अपने अनुकूल स्थान ग्रहण करें एवं मेरे लिए उत्तम फल दें. मेरा
यज्ञ सब देवों का पोषक है. (६)
किं स्विद्वनं क उ स वृक्ष आस यतो द्यावापृथिवी निष्टतक्षुः.
संतस्थाने अजरे इतऊती अहानि पूर्वीरुषसो जरन्त.. (७)
वह कौन सा वन अथवा कौन सा वृक्ष है, जिससे सामग्री लेकर देवों ने द्यावा-पृथिवी को
बनाया है? देवों द्वारा सुरक्षित द्यावा-पृथिवी ठीक से स्थित एवं जरारहित हैं, जबकि प्राचीन
दिन एवं उषाएं जीर्ण हो गई हैं. (७)
नैतावदेना परो अन्यदस्त्युक्षा स द्यावापृथिवी बिभर्ति.
त्वचं पवित्रं कृणुत स्वधावान्यदीं सूर्य न हरितो वहन्ति.. (८)
द्यावा-पृथिवी ही सबसे बढ़कर नहीं हैं. उनसे बढ़कर भी कोई है. वह प्रजाओं को बनाने
वाला और द्यावा-पृथिवी का रक्षक है. उस अन्न के स्वामी ने उस समय अपने शरीर का
निर्माण किया था, जिस समय सूर्य के घोड़ों ने उनका रथ खींचना भी आरंभ नहीं किया था.
(८)
स्तेगो न क्षामत्येति पृथ्वीं मिहं न वातो वि ह वाति भूम.
मित्रो यत्र वरुणो अज्यमानोऽग्निर्वने न व्यसृष्ट शो कम्.. (९)
रश्मिसमूह वाले सूर्य विस्तृत धरती का अतिक्रमण करके नहीं जाते और वायु भी समर्थ
होते हुए वर्षा को छिन्न-भिन्न नहीं करते. मित्र एवं वरुण प्रकट होकर इस प्रकार प्रकाश करते
हैं, जिस प्रकार अग्नि वन को प्रकाशित कर सकते हैं. (९)
स्तरीर्यत्सूत सद्यो अज्यमाना व्यथिरव्यथीः कृणुत स्वगोपा.
पुत्रो यत्पूर्वः पित्रोर्जनिष्ट शम्यां गौर्जगार यद्ध पृच्छान्.. (१०)
बूढ़ी गाय जिस प्रकार वीर्य से सिंचित होकर शीघ्र ही बच्चा पैदा करती है, उसी प्रकार
दुःख नष्ट करने वाली एवं अपनी रक्षा करने वाली अरणियां अग्नि को उत्पन्न करती हैं. अग्नि
माता-पिता के समान दोनों अरणियों से प्राचीनकाल में उत्पन्न हुए थे, इसलिए उनके पुत्र हैं.
शमी वृक्ष पर जन्म लेने वाली अरणिरूप गाय की खोज की जाती है. (१०)
उत कण्वं नृषदः पुत्रमाहुरुत श्यावो धनमादत्त वाजी.
प्र कृष्णाय रुशदपिन्वतोधर्ऋतम्त्र नकिरस्मा अपीपेत्.. (११)
वेदवाही लोग कण्व को नृषद का पुत्र कहते हैं. काले रंग वाले एवं हव्यान्न धारक कण्व
ने धन प्राप्त किया. अग्नि ने कण्व के लिए अपना शोभनरूप प्रकट किया. कण्व के
अतिरिक्त अग्नि के लिए वैसा यज्ञ कोई नहीं कर सकता. (११)
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सूक्त—३२ देवता—विश्वेदेव
सूक्त—३२ देवता—विश्वेदेव
प्र सु ग्मन्ता धियसानस्य सक्षणि वरेभिर्वरॉ अभि षु प्रसीदतः.
अस्माकमिन्द्र उभयं जुजोषति यत्सोम्यस्यान्धसो बुबोधति.. (१)
इंद्र अपने घोड़े इंद्रागमन की चिंता करने वाले मुझ यजमान के यज्ञ में आने के लिए
हांकते हैं. उत्तम मार्गों से हवि देने वाले यजमान के हव्य और स्तुतियों को लक्ष्य करके इंद्र
आवें. इंद्र आकर हमारा हव्य भक्षण करें एवं स्तुतियां सुनें. इंद्र मेरे सोमरस और हव्य का
स्वाद लेते हैं. (१)
वीन्द्र यासि दिव्यानि रोचना वि पार्थिवानि रजसा पुरुष्टुत.
ये त्वा वहन्ति मुहुरध्वराँ उप ते सु वन्वन्तु वग्वनाँ अराधसः.. (२)
हे बहुतों द्वारा प्रशंसित इंद्र! तुम दिव्य प्रकाश को धरती पर फैलाते हुए जाते हो. तुम्हारे
घोड़े तुम्हें बार-बार ढोकर हमारे यज्ञ की ओर लावें. वे घोड़े हम धनहीन स्तोताओं को
धनसंपन्न करें. (२)
तदिन्मे छन्त्सद्वपुषो वपुष्टरं पुत्रो यज्जानं पित्रोरधीयति.
जाया पतिं वहति वग्नुना सुमत्पुंस इद्भद्रो वहतुः परिष्कृतः.. (३)
इंद्र मुझे वही चमत्कारपूर्ण एवं धन के समान जन्म देने की कृपा करें, जिसे पाकर पुत्र
पिता का धन प्राप्त करता है. यजमान की पत्नी यजमान को भले शब्दों द्वारा अपने पास
बुलाती है. सोमरस उस उत्तम पुरुष के पास भली प्रकार जावे. (३)
तदित्सधस्थमभि चारु दीधय गावो यच्छासन्वहतुं न धेनवः.
माता यन्मन्तुर्यूथस्य पूर्व्याभि वाणस्य सप्तधातुरीज्जनः.. (४)
हे इंद्र! उस स्थान को अपने तेज से प्रकाशित करो, जहां स्तुतिरूप धारिणी गाएं मिलती
हैं. स्तुतियों की प्राचीन एवं पूजा योग्य माता गायत्री के सातों छंद उसी स्थान पर हैं. (४)
प्र वोऽच्छा रिरिचे देवयुष्पदमेको रुद्रेभिर्याति तुर्वणिः.
जरा वा येष्वमृतेषु दावने परि व ऊमेभ्यः सिञ्चता मधु.. (५)
हे यजमानो! देवों की अभिलाषा करते हुए अग्नि तुम्हारे स्थान पर जाते हैं. अकेले इंद्र
रुद्रों के साथ होताओं के पास से तुम्हारे यज्ञ में शीघ्र आते हैं. स्तुति भी इन मरणरहित देवों से
धन दिलाने में समर्थ होती है. तुम अपने रक्षक देवों के लिए सोमरस पिलाओ. (५)
निधीयमानमपगूहह्मप्सु प्र मे देवानां व्रतपा उवाच.
इन्द्रो विद्वाँ अनु हि त्वा चचक्ष तेनाहमग्ने अनुशिष्ट आगाम्.. (६)
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देवों में उत्तम एवं यज्ञों की रक्षा करने वाले इंद्र ने अध्वर्यु द्वारा जल में निहित अग्नि के
विषय में बताया है. हे अग्नि! विद्वान् इंद्र ने तुम्हें बाद में देखा था, मैं उसी इंद्र के उपदेश के
अनुसार तुम्हारे पास आया हूं. (६)
अक्षेत्रवित्क्षेत्रविदं ह्यप्राट् स प्रैति क्षेत्रविदानुशिष्टः.
एतद्वै भद्रमनुशासनस्योत स्रुतिं विन्दत्यञ्जसीनाम्.. (७)
मार्ग न जानने वाले लोग जानने वालों से पूछते हैं. मार्ग जानने वाले के निर्देश के
अनुसार वह इच्छित स्थान पर पहुंच जाता है. इसी अनुशासन के द्वारा खोजने पर जल का
मार्ग प्राप्त हो सकता है. (७)
अद्येदु प्राणीदममन्निमाहापीवृतो अध्यन्मातुरूथः.
एमेनमाप जरिमा युवानमहेळन्वसुः सुमना बभूव.. (८)
ये अग्नि आज ही अरणिमंथन से उत्पन्न हुए हैं. सोमरस निचोड़ने वाले इन्हें अन्यत्र ले
जाना चाहते हैं. तेज से ढके हुए अग्नि, धरतीमाता के दूध के समान सोमरस पीते हैं. नित्य
युवा अग्नि को हव्यों से मिली हुई स्तुति प्राप्त होती है. इस हेतु अग्नि क्रोधरहित, धन देने
वाले एवं शोभन मनयुक्त हुए हैं. (८)
एतानि भद्रा कलश क्रियाम कुरुश्रवण ददतो मघानि.
दान इद्धो मघवानः सो अस्त्वयं च सोमो हृदि यं बिभर्मि.. (९)
हे कलावान् एवं स्तोताओं की स्तुतियां सुनने वाले इंद्र! तुम स्तोताओं को धन देते हो. हे
स्तोत्ररूपी धन वाले स्तोताओ! यह इंद्र तुम्हारे प्रति दाता ही रहें. जिस सोम को मैं पेट में
रखता हूं, वे भी तुम्हारे लिए दाता रहें. (९)
सूक्त—३३ देवता—कुरुश्रवण
प्र मा युयुज्रे प्रयुजो जनानां वहामि स्म पूषणमन्तरेण.
विश्वे देवासो अध मामरक्षन्दुःशासुरागादिति घोष आसीत्.. (१)
यजमानों को यज्ञकर्मों में नियुक्त करने वाले देवों ने मुझ कषव ऋषि को कुरुश्रवण के
प्रति नियुक्त किया है. मैंने पूषा को मार्ग से वहन किया है. सभी देवों ने मेरी रक्षा की. चारों
ओर यह हल्ला मचा हुआ था कि कठिनता से वश में आने वाला ऋषि आ गया है. (१)
सं मा तपन्त्यभितः सपत्निरिव पर्शवः.
नि बाधते अमतिर्नग्नता जसुर्वेर्न वेवीयते मतिः.. (२)
मेरी पसलियां मुझे सौत स्त्रियों के समान बहुत दुःख दे रही हैं. बुद्धिहीनता, नग्नता और
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दुर्बलता मुझे पीड़ित कर रही हैं. मेरी बुद्धि उसी प्रकार कांपती है, जिस प्रकार शिकारी को
देखकर पक्षी कांपते हैं. (२)
मूषो न शिश्ना व्यदन्ति माध्यः स्तोतारं ते शतक्रतो.
सकृत्सु नो मघवन्निन्द्र मृळयाधा पितेव नो भव.. (३)
हे इंद्र! चूहे जिस प्रकार तांत को खाते हैं, उसी प्रकार मेरी मानसिक चिंताएं मुझे खाए
जा रही हैं. हे शतक्रतु इंद्र! मैं तुम्हारा स्तोता हूं. हे धनस्वामी इंद्र! एक बार मेरी रक्षा करो एवं
मेरे पिता के समान बनो. (३)
कुरुश्रवणमावृणि राजानं त्रासदस्यवम्. मंहिष्ठं वाघतामृषिः.. (४)
मैं कवष ऋषि यजमानों को देने के लिए श्रेष्ठ धनदाता एवं त्रसदस्यु के पुत्र कुरुश्रवण के
पास धन मांगने गया था. (४)
यस्य मा हरितो रथे तिस्रो वहन्ति साधुया. स्तवै सहस्रदक्षिणे.. (५)
जब मैं रथ में बैठता था, तब हरे रंग के तीन घोड़े मुझे भली प्रकार ढोते थे. यज्ञ में
हजारों स्वर्ण मुद्राएं पाने वाला मैं लोगों द्वारा प्रशंसित होता था. (५)
यस्य प्रस्वादसो गिर उपमश्रवसः पितुः. क्षेत्रं न रण्वमूचुषे.. (६)
हे राजन्! यश की चर्चा चलने पर लोग तुम्हारे पिता का दृष्टांत देते थे. उनकी बातें मुझे
इस प्रकार रुचिकर लगती थीं, जिस प्रकार सेवकों को इनाम में दिया हुआ खेत लगता है.
(६)
अधि पुत्रोपमश्रवो नपान्मित्रातिथेरिहि. पितुष्टे अस्मि वन्दिता.. (७)
हे दृष्टांतयोग्य कीर्ति वाले मित्रातिथि के पुत्र! तुम मेरे पास आओ. मैं तुम्हारे पिता का
स्तोता हूं. (७)
यदीशीयामृतानामुत वा मर्त्यानाम्. जीवेदिन्मघवा मम.. (८)
यदि मैं मरणरहित देवों और मरणशील मानवों का स्वामी होता तो मुझे धन देने वाले
अर्थात् तुम्हारे पिता जीवित रहते. (८)
न देवानामति व्रतं शतात्मा चन जीवति. तथा युजा वि वावृते.. (९)
सौ आत्माओं वाला व्यक्ति भी देवों की मर्यादा लांघकर जीवित नहीं रह सकता. इसी
कारण साथियों से हमारा वियोग होता है. (९)
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सूक्त—३४ देवता—अक्ष अर्थात् पासे
प्रावेपा मा बृहतो मादयन्ति प्रवातेजा इरिणे वर्वृतानाः.
सोमस्येव मौजवतस्य भक्षो विभीदको जागृविर्मह्यमच्छान्.. (१)
प्रवण देश में उत्पन्न बड़े-बड़े पासे जुआ खेलने के तख्ते पर इधर-उधर बिखरते हुए
मुझे आनंदित करते हैं. जीत-हार में हर्ष-शोक जगाने वाला पासा मुझे उसी प्रकार सुख देता
है, जिस प्रकार मुंजवान् पर्वत पर उत्पन्न सोमलता का रस पीकर सुख मिलता है. (१)
न मा मिमेथ न जिहीळ एषा शिवा सखिभ्य उत मह्यमासीत्.
अक्षस्याहमेकपरस्य हेतोरनुव्रतामप जायामरोधम्.. (२)
यह पत्नी न मुझसे कभी अप्रसन्न हुई और न इसने कभी मुझसे लज्जा की. यह मेरे
मित्रों और मेरे प्रति सुखकारी थी. इस प्रकार सर्वथा अनुकूल पत्नी को भी मैंने एकमात्र पासों
के कारण त्याग दिया. (२)
द्वेष्टि श्वश्रूरप जाया रुणद्धि न नाथितो विन्दते मर्डितारम्.
अश्वस्येव जरतो वस्न्यस्य नाहं विन्दामि कितवस्य भोगम्.. (३)
सास जुआ खेलने वाले की निंदा करती है एवं पत्नी उसे छोड़ जाती है. यदि वह धन
मांगे तो उसे कोई देने वाला नहीं मिलता. जिस प्रकार बूढ़े घोड़े का कुछ भी मूल्य नहीं लगता,
उसी प्रकार मुझ जुआरी का कहीं आदर नहीं होता. (३)
अन्ये जायां परि मृशन्त्यस्य यस्यागृधद्वेदने वाज्य१क्षः.
पिता माता भ्रातर एनमाहुर्न जानीमो नयता बद्धमेतम्.. (४)
शक्तिशाली पासे जिस जुआरी के धन को लालच की दृष्टि से देखते हैं, उसकी
व्यभिचारिणी पत्नी का दूसरे लोग स्पर्श करते हैं. जुआरी के माता, पिता एवं भाई कर्ज मांगने
वालों से कहते हैं—"हम इसे नहीं जानते. इसे बांधकर ले जाओ." (४)
यदादीध्ये न दविषाण्येभिः परायद्भ्योऽव हीये सखिभ्यः.
न्युप्ताश्च बभ्रवो वाचमक्रतं एमीदेषां निष्कृतं जारिणीव.. (५)
जब मैं निश्चय कर लेता हूं कि जुआ नहीं खेलूंगा, तब मैं आए हुए जुआरी मित्रों को
त्याग देता हूं. किंतु जब जुआ खेलने के तख्ते पर फेंके हुए पीले रंग वाले पासे शब्द करते हैं,
तब मैं उस स्थान की ओर ऐसे चला जाता हूं, जैसे व्यभिचारिणी स्त्री संकेतस्थान पर पहुंच
जाती है. (५)
सभामेति कितवः पृच्छमानो जेष्यामीति तन्वा३ शूशुजानः.
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अक्षासो अस्य वि तिरन्ति कामं प्रतिदीव्ने दधत आ कृतानि.. (६)
जुआरी शरीर से दीप्त होकर एवं यह कहता हुआ जुआघर में जाता है कि कौन धन
वाला आया है? मैं उसे जीतूंगा. कभी-कभी पासे जुआरी की कामना पूरी करते हैं और कभी
उसके विरोधी जुआरी के अनुकूल कर्म धारण करके उसकी इच्छा पूरी करते हैं. (६)
अक्षास इदङ्कुशिनो नितोदिनो निकृत्वानस्तपनास्तापयिष्णवः.
कुमारदेष्णा जयतः पुनर्हणो मध्वा सम्पृक्ताः कितवस्य बर्हणा.. (७)
कभी-कभी पासे अंकुश के समान चुभने वाले, हृदय को टुकड़े-टुकड़े करने वाले एवं
गरम पदार्थ के समान जलाने वाले बन जाते हैं. पासे जीतने वाले जुआरी के लिए पुत्रजन्म के
समान आनंददाता एवं मधु से लिपटे हुए लगते हैं, पर हारने वाले की तो जान निकाल लेते हैं.
(७)
त्रिपञ्चाशः क्रीळति व्रात एषां देवइव सविता सत्यधर्मा.
उग्रस्य चिन्मन्यवे ना नमन्ते राजा चिदेभ्यो नम इत्कृणोति.. (८)
सच्चे धर्म वाले सविता देव जिस प्रकार आकाश में विचरण करते हैं, उसी प्रकार
तिरेपन पासे जुआ खेलने के तख्ते पर क्रीड़ा करते हैं. ये पासे उग्र एवं क्रोधी के भी वश में
नहीं आते. राजा तक इन पासों के सामने झुकता है. (८)
नीचा वर्तन्त उपरि स्फुरन्त्यहस्तासो हस्तवन्तं सहन्ते.
दिव्या अङ्गारा इरिणे न्युप्ताः शीताः सन्तो हृदयं निर्दहन्ति.. (९)
पासे कभी नीचे गिरते हैं और कभी ऊपर उछलते हैं. ये बिना हाथ के होकर भी
हाथवालों को पराजित करते हैं. ये दिव्य पासे जुआ खेलने के तख्ते पर फेंके जाते समय
अंगार बन जाते हैं. ये छूने में ठंडे हैं, पर हारने वाले के मन को जलाते हैं. (९)
जाया तप्यते कितवस्य हीना माता पुत्रस्य चरतः क्व स्वित्.
ऋणावा बिभ्यद्धनमिच्छमानोऽन्येषामस्तमुप नक्तमेति.. (१०)
अनिश्चित स्थान में घूमने वाले जुआरी की पत्नी उसके बिना दुःखी होती है एवं माता
परेशान रहती है. दूसरों का कर्ज चढ़ जाने से जुआरी डरता है. वह दूसरों के धन को चुराने
की इच्छा करता है. रात में घर आता है. (१०)
स्त्रियं दृष्ट्वाय कितवं ततापान्येषां जायां सुकृतं च योनिम्.
पूर्वाह्णे अश्वान्युयुजे हि बभ्रूनत्सो अग्नेरन्ते वृषलः पपाद.. (११)
जुआरी दूसरों की सुखी पत्नियों और अच्छी प्रकार बने हुए घरों को देखकर दुःखी
होता है. जो जुआरी सवेरे के समय पीले रंग के घोड़े पर बैठता है, वही शाम को कपड़ों के
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अभाव में शीत से व्याकुल होकर आग के पास सोता है. (११)
यो वः सेनानीर्महतो गणस्य राजा व्रातस्य प्रथमो बभूव.
तस्मै कृणोमि न धना रुणध्मि दशां प्राचीस्तदृतं वदामि.. (१२)
हे पासो! तुम्हारे समूह का जो सेनापति राजा एवं प्रमुख है, मैं उसके लिए नमस्कार
करता हूं. मैं दसों उंगलियों से हाथ जोड़कर सत्य कहता हूं कि भविष्य में मैं जुए से धन नहीं
कमाऊंगा. (१२)
अक्षैर्मा दीव्यः कृषिमित्कृषस्व वित्ते रमस्व बहु मन्यमानः.
तत्र गावः कितव तत्र जाया तन्मे वि चष्टे सवितायमर्यः.. (१३)
हे जुआरी! मेरी बात को महत्त्वपूर्ण समझकर तुम पासों से मत खेलो. खेती से जो धन
मिले, उसीको बहुत मानकर प्रसन्न रहो. खेती से बहुत सी गाएं एवं पत्नी प्राप्त होगी, सविता
स्वामी ने मुझसे ऐसा कहा है. (१३)
मित्रं कृणुध्वं खलु मृळता नो मा नो घोरेण चरताभि धृष्णु.
नि वो नु मन्युर्विशतामरातिर्न्यो बभ्रूणां प्रसितौ न्वस्तु.. (१४)
हे पासो! हमें अपना मित्र बना लो एवं हमें सुखी करो. तुम हमारे ऊपर अपने भयंकर
तथा असह्य प्रभाव का प्रयोग मत करो. तुम्हारा क्रोध हमारे शत्रुओं में प्रवेश करे. शत्रु तुम
पीले रंग वाले पासों के बंधन में शीघ्र आ जावें. (१४)
सूक्त—३५ देवता—विश्वेदेव
अबुध्रमु त्य इन्द्रवन्तो अग्नयो ज्योतिर्भरन्त उषसो व्युष्टिषु.
मही द्यावापृथिवी चेततामपोऽद्या देवानाभव आ वृणीमहे.. (१)
इंद्र से संबंधित अग्नियां उषाओं द्वारा अंधकारनाश के समय तेज धारण करते हुए जाग
गई हैं. विस्तृत द्यावा एवं पृथिवी भी चेतनायुक्त हों. आज मैं देवों की रक्षा का वरण करता हूं.
(१)
दिवस्पृथिव्योरव आ वृणीमहे मातृन्सिन्धून्पर्वताञ्छर्यणावतः.
अनागास्त्वं सूर्यमुषासमीमहे भद्रं सोमः सुवानो अद्या कृणोतु नः.. (२)
हम द्यावा-पृथिवी से अपनी रक्षा की प्रार्थना करते हैं. मैं माता तुल्य नदियों एवं कुरुक्षेत्र
में स्थित पर्वतों से भी रक्षा की याचना करता हूं. हे सूर्य एवं उषा! मैं तुम दोनों से प्रार्थना
करता हूं कि मुझे पापरहित रखो. जाने जाते हुए सोम आज हमारा मंगल करें. (२)
द्यावा नो अद्य पृथिवी अनागसो मही त्रायेतां सुविताय मातरा.
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उषा उच्छन्त्यप बाधतामघं स्वस्त्य१ग्निं समिधानमीमहे.. (३)
विस्तृत एवं माता-पिता के समान द्यावा-पृथिवी से हम प्रार्थना करते हैं कि वे सुख पाने
के लिए हम निष्पाप लोगों की रक्षा करें. अंधकार का विनाश करती हुई उषा हमारे पापों को
समाप्त करे. हम प्रज्वलित अग्नि से सुख की याचना करते हैं. (३)
इयं न उसा प्रथमा सुदेव्यं रेवत्सनिभ्यो रेवती व्युच्छतु.
आरे मन्युं दुर्विदत्रस्य धीमहि स्वस्त्य१ग्निं समिधानमीमहे.. (४)
धन की स्वामिनी, मुख्या एवं पापों का नाश करने वाली उषा हमें दान योग्य धन दे. हम
बुरे धन वाले व्यक्ति के क्रोध से दूर रहना चाहते हैं. हम प्रज्वलित अग्नि से कल्याण की
याचना करते हैं. (४)
प्र या: सिस्रते सूर्यस्य रश्मिभिर्ज्योतिर्भरन्तीरुषसो व्युष्टिषु.
भद्रा नो अद्य श्रवसे व्युच्छत स्वस्त्य१ग्निं समिधानमीमहे.. (५)
जो उषाएं सूर्यकिरणों के साथ मिलती हैं एवं प्रकाश को धारण करके अंधकार का नाश
करती हैं, वे आज हमें अन्न देने के लिए अनुकूल हों एवं अंधकार का नाश करें. हम प्रज्वलित
अग्नि से कल्याण की याचना करते हैं. (५)
अनमीवा उषस आ चरन्तु न उदग्नयो जिहतां ज्योतिषा बृहत्.
आयुक्षातामश्विना तूतुजिं रथं स्वस्त्य१ग्निं समिधानमीमहे.. (६)
रोगरहित उषाएं हमारे पास आवें एवं विस्तृत अग्नि तेज से मिलकर ऊपर उठें.
अश्विनीकुमार हमारे पास आने के लिए अपने तेज चलने वाले रथ में घोड़े जोतें. हम
प्रज्वलित अग्नि से कल्याण की याचना करते हैं. (६)
श्रेष्ठं नो अद्य सवितर्वरेण्यं भागमा सुव स हि रत्नधा असि.
रायो जनित्रीं धिषणामुप ब्रुवे स्वस्त्य१ग्निं समिधानमीमहे.. (७)
हे सविता देव! आज हमें श्रेष्ठ एवं वरण करने योग्य धन दो. तुम उत्तम रत्न देने वाले
हो. हम धन उत्पन्न करने वाली स्तुतियां बोलते हैं. हम प्रज्वलित अग्नि से कल्याण की याचना
करते हैं. (७)
पिपर्तु मा तद्ॠतस्य प्रवाचनं देवानां यन्मनुष्या३ अमन्महि.
विश्वा इदुस्राः स्पळुदेति सूर्यः स्वस्त्य१ग्निं समिधानमीमहे.. (८)
यज्ञों का देवस्तुतिरूपी भाग हमारी रक्षा करे. हम उसे जानते हैं. सूर्य प्रत्येक प्रभात में
सभी वस्तुओं को स्पष्ट करते हुए आते हैं. हम प्रज्वलित अग्नि से कल्याण की याचना करते
हैं. (८)
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अद्वेषो अद्य बर्हिषः स्तरीमणि ग्राव्णां योगे मन्मनः साध ईमहे.
आदित्यानां शर्मणि स्था भुरण्यसि स्वस्त्य१ग्निं समिधानमीमहे.. (९)
आज यज्ञ में कुश बिछाए जा चुके हैं एवं सोमरस निचोड़ने का एक पत्थर दूसरे पर रख
दिया गया है. इस समय मेरा मन अभिलषित वस्तु पाने के लिए द्वेषरहित देवों की शरण
जाता है. हम प्रज्वलित अग्नि से कल्याण की याचना करते हैं. (९)
आ नो बर्हिः सधमादे बृहद्दिवि देवाँ ईळे सादया सप्त होतॄन्.
इन्द्रं मित्रं वरुणं सातये भगं स्वस्त्य१ग्निं समिधानमीमहे.. (१०)
हे अग्नि! हमारे विस्तृत एवं दीप्त यश में तुम सात होताओं व इंद्र, मित्र, वरुण, भग
आदि देवों को भली प्रकार बुलाओ. हम धनप्राप्ति के लिए देवों की स्तुति करेंगे. हम
प्रज्वलित अग्नि से कल्याण की याचना करते हैं. (१०)
त आदित्या आ गता सर्वतातये वृधे नो यज्ञमवता सजोषसः.
बृहस्पतिं पूषणमश्विना भगं स्वस्त्य१ग्निं समिधानमीमहे.. (११)
हे प्रसिद्ध आदित्यो! तुम हमारे यज्ञ के लिए आओ एवं हमारे कल्याण के लिए संयत
होकर यज्ञ में बैठो. हम बृहस्पति, पूषा, अश्विनीकुमारों, भग एवं प्रज्वलित अग्नि से कल्याण
की याचना करते हैं. (११)
तन्नो देवा यच्छत सुप्रवाचनं छर्दिरदित्याः सुभरं नृपाय्यम्.
पश्वे तोकाय तनयाय जीवसे स्वस्त्य१ग्निं समिधानमीमहे.. (१२)
हे आदित्य देवो! तुम अपना यज्ञ पूर्ण करो एवं हमें मानवों की रक्षा करने वाला
मनपसंद घर दो. हम प्रज्वलित अग्नि से अपने पशुओं, संतान एवं जीवन के विषय में
कल्याण की याचना करते हैं. (१२)
विश्वे अद्य मरुतो विश्व ऊती विश्वे भवन्त्वग्नयः समिद्धाः.
विश्वे नो देवा अवसा गमन्तु विश्वमस्तु द्रविणं वाजो अस्मे.. (१३)
आज सभी मरुत् सब प्रकार से हमारी रक्षा करें एवं सभी अग्नियां प्रज्वलित हों. सभी
देव हमारी रक्षा के लिए आवें तथा सब प्रकार के अन्न व संपत्ति हमें प्राप्त हों. (१३)
यं देवासोऽवथ वाजसातौ यं त्रायध्वे यं पिपृथात्यंहः.
यो वो गोपीथे न भयस्य वेद ते स्याम देववीतये तुरासः.. (१४)
हे देवो! हम यज्ञ के ऐसे आतुर व्यक्ति बनें, जिसकी तुम युद्ध में रक्षा करते हो, जिनका
त्राण करते हो एवं जिन्हें पापरहित करके उनकी अभिलाषा पूर्ण करते हो एवं जो तुम्हारा
सहारा पाकर भय को जानते भी नहीं. (१४)
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सूक्त—३६ देवता—विश्वेदेव
सूक्त—३६ देवता—विश्वेदेव
उषासानक्ता बृहती सुपेशसा द्यावाक्षामा वरुणो मित्रो अर्यमा.
इन्द्रं हुवे मरुतः पर्वताँ अप आदित्यान्द्यावापृथिवी अपः स्वः.. (१)
मैं महान् एवं शोभनरूप वाली उषा व रात्रि और द्यावा-पृथिवी, वरुण, मित्र, अर्यमा, इंद्र,
मरुद्गण, पर्वतसमूह, जलों, आदित्यों, अंतरिक्ष एवं अन्य देवों को यज्ञ में बुलाता हूं. (१)
द्यौश्च नः पृथिवी च प्रचेतस ऋतावरी रक्षतामंहसे रिषः.
मा दुर्विदत्रा निर्ऋतिर्न ईशत तद्देवानामवो अद्या वृणीमहे.. (२)
शोभन बुद्धि वाली एवं यज्ञ के योग्य द्यावा-पृथिवी हमें हिंसकों एवं पाप से बचावें. बुरी
बुद्धि वाली मृत्यु हम पर अधिकार न कर सके. हम आज देवों की उसी रक्षा की याचना करते
हैं. (२)
विश्वस्मान्नो अदितिः पात्वंहसो माता मित्रस्य वरुणस्य रेवतः.
स्वर्वज्ज्योतिरवृकं नशीमहि तद्देवानामवो अद्या वृणीमहे.. (३)
धन के स्वामी मित्र और वरुण की माता अदिति पाप से हमारी रक्षा करें. हम
विनाशरहित ज्योति को पूर्णरूप से शीघ्र प्राप्त करें. देवों से आज हम उसी रक्षा की याचना
करते हैं. (३)
ग्रावा वदन्नप रक्षांसि सेधतु दुष्ष्वप्न्यं निर्ऋतिं विश्वमत्रिणम्.
आदित्यं शर्म मरुतामशीमहि तद्देवानामवो अद्या वृणीमहे.. (४)
सोमरस निचोड़ने के काम आने वाले दोनों पत्थर शब्द करते हुए राक्षसों को दूर भगावें
एवं बुरे सपनों, मृत्यु और सबको खाने वाले राक्षसों को हमसे हटावें. हम आदित्यों एवं मरुतों
से संबंधित सुख प्राप्त करें. हम आज देवों की उसी प्रसिद्ध रक्षा की याचना करते हैं. (४)
इन्द्रो बर्हिः सीदतु पिन्वतामिळा बृहस्पतिः सामभिर्ऋक्क्वौ अर्चतु.
सुप्रकेतं जीवसे मन्म धीमहि तद्देवानामवो अद्या वृणीमहे.. (५)
इंद्र भली प्रकार कुश पर बैठें. स्तुतिवचन विशेषरूप से बोले जावें. साममंत्रों द्वारा
प्रशंसित बृहस्पति हमारी अभिलाषा पूरी करें. हम जीवन के लिए शोभन ज्ञान एवं धन प्राप्त
करें. आज हम देवों से उसी प्रसिद्ध रक्षा की याचना करते हैं. (५)
दिविस्पृशं यज्ञमस्माकमश्विना जीराध्वरं कृणुतं सुम्नमिष्टये.
प्राचीनरश्मिमाहुतं घृतेन तद्देवानामवो अद्या वृणीमहे.. (६)
हे अश्विनीकुमारो! तुम हमारे यज्ञ को स्वर्ग छूने वाला, शीघ्र गतियुक्त व हिंसारहित
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बनाओ. तुम हमारी अभिलाषापूर्ति के लिए हमें सुख दो तथा घृत द्वारा आहुति दी गई अग्नि
को देवों के प्रति अभिमुख बनाओ. आज हम देवों से उसी प्रसिद्ध रक्षा की याचना करते हैं.
(६)
उप ह्वये सुहवं मारुतं गणं पावकम्ऋष्वं सख्याय शंभुवम्.
रायस्पोषं सौश्रवसाय धीमहि तद्देवानामवो अद्या वृणीमहे.. (७)
मैं शोभन आह्वान वाले, शुद्धिकर्त्ता, दर्शनीय, सुखदाता व धन के पोषक मरुद्गण को
मित्रता पाने के लिए बुलाता हूं तथा विशेषरूप से अन्न पाने के लिए मैं उनका ध्यान करता हूं.
हम आज देवों से विशेष रक्षा की याचना करते हैं. (७)
अपां पेरुं जीवधन्यं भरामहे देवाव्यं सुहवमध्वरश्रियम्.
सुरश्मिं सोममिन्द्रियं यमीमहि तद्देवानामवो अद्या वृणीमहे.. (८)
हम जल का पालन करने वाले, जीवों को धन्य करने वाले, देवों को तृप्ति देने वाले,
शोभन स्तुति वाले, यज्ञ की शोभा व शोभन दीप्तियुक्त सोम को धारण करते हैं एवं उनसे
शक्ति की याचना करते हैं. आज हम देवों से वही प्रसिद्ध रक्षा मांगते हैं. (८)
सनेम तत्सुसनिता सनित्वभिर्वयं जीवा जीवपुत्रा अनागसः.
ब्रह्मद्विषो विष्वगेनो भरेरत तद्देवानामवो अद्या वृणीमहे.. (९)
हम और हमारे पुत्र दीर्घजीवी तथा अपराधरहित बनकर एवं अपनी संतान के साथ
बांटकर सोमरस का पान करें. हम ब्राह्मणों से द्वेष करने वाले लोग सब प्रकार के पापों से
पूर्ण हों. आज हम देवों से उसी रक्षा की याचना करते हैं. (९)
ये स्था मनोर्यज्ञियास्ते शृणोतन यद्वो देवा ईमहे तद्ददातन.
जैत्रं क्रतुं रयिमद्वीरवद्यशस्तद्देवानामवो अद्या वृणीमहे.. (१०)
हे मनुष्यों का यज्ञ पाने के योग्य देवो! तुम हमारी स्तुति सुनो. हम तुमसे जो कुछ मांगते
हैं, वह हमें दो. हमें जय प्रदान करने वाला ज्ञान व धन एवं संतान से युक्त यश दो. आज हम
देवों से उसी प्रसिद्ध रक्षा की याचना करते हैं. (१०)
महदद्य महतामा वृणीमहेऽवो देवानां बृहतामनर्वणाम्.
यथा वसु वीरजातं नशामहै तद्देवानामवो अद्या वृणीमहे.. (११)
हम आज श्रेष्ठ, महान् और अद्वितीय देवों से अधिक रक्षा की प्रार्थना करते हैं. आज
हम देवों से उसी विशेष रक्षा की प्रार्थना करते हैं, जिससे हमें धन एवं संतान प्राप्त हो सके.
(११)
महो अग्नेः समिधानस्य शर्मण्यनागा मित्रे वरुणे स्वस्तये.
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श्रेष्ठे स्याम सवितुः सवीमनि तद्देवानांमवो अद्या वृणीमहे.. (१२)
हम महान् एवं प्रज्वलित अग्नि से सुख व मित्रवरुण से पापहीनता तथा कल्याण प्राप्त
करें. हम सूर्य से सर्वोत्तम सुख प्राप्त करें. आज हमें देवों से उसी विशेष रक्षा की याचना करते
हैं. (१२)
ये सवितुः सत्यसवस्य विश्वे मित्रस्य व्रते वरुणस्य देवाः.
ते सौभगं वीरवद्गोमदप्नो दधातन द्रविणं चित्रमस्मे.. (१३)
जो देव सत्य स्वभाव वाले सविता, मित्र और वरुण के यज्ञ में उपस्थित रहते हैं, वे हमें
सौभाग्य, संतान एवं गायों से युक्त अन्न, पूजनीय धन एवं पुण्यकर्म दें. (१३)
सविता पश्चात्तात्सविता पुरस्तात्सवितोत्तरात्तात्सविताधरात्तात्.
सविता नः सुवतु सर्वतातिं सविता नो रासतां दीर्घमायुः.. (१४)
सूर्य देव हमें पश्चिम, पूर्व, उत्तर एवं दक्षिण दिशाओं में सभी अभिलषित धन प्रदान करें
एवं दीर्घ आयु दें. (१४)
सूक्त—३७ देवता—सूर्य
नमो मित्रस्य वरुणस्य चक्षसे महो देवाय तदृतं सपर्यत.
दूरेदृशे देवजाताय केतवे दिवस्पुत्राय सूर्याय शंसत.. (१)
हे ऋत्विजो! तुम मित्र और वरुण को देखने वाले महान्, दीप्तिशाली, दूर रहते हुए भी
सबको देखने वाले, देवों के वंश में उत्पन्न, संसार का ज्ञान कराने वाले एवं स्वर्ग के पुत्रतुल्य
सूर्य को नमस्कार करके यज्ञ आदि से उनकी पूजा तथा प्रशंसा करो. (१)
सा मा सत्योक्तिः परि पातु विश्वतो द्यावा च यत्र ततनन्नहानि च.
विश्वमन्यन्नि विशते यदेजति विश्वाहापो विश्वाहोदेति सूर्यः.. (२)
ये सत्यवचन मेरी सभी प्रकार से रक्षा करें, जिनके सहारे आकाश एवं दिन स्थित हैं,
सभी प्राणी जिनके आश्रित हैं, जिनके प्रभाव से प्राणिसमूह गति करता है, जल बहता है एवं
सदा सूर्य उगता है. (२)
न ते अदेवः प्रदिवो नि वासते यदेतशेभिः पतरै रथर्यसि.
प्राचीनमन्यदनु वर्तते रज उदन्येन ज्योतिषा यासि सूर्य.. (३)
हे सूर्य देव! जब तुम अपने गतिशील घोड़ों को रथ में जोड़ने की इच्छा करते हो, तब
कोई भी प्राचीन राक्षस तुम्हारे समीप नहीं रहता. तुम्हारी वह प्रसिद्ध ज्योति जल के पीछे
चलती है, जिसके साथ तुम उदित होते हो. (३)
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येन सूर्य ज्योतिषा बाधसे तमो जगच्च विश्वमुदियर्षि भानुना.
तेनास्मद्विश्वामनिरामनाहुतिमपामीवामप दुष्ष्वप्न्यं सुव.. (४)
हे सूर्य देव! तुम जिस ज्योति से अंधकार का नाश करते हो एवं जिस किरण से सारे
संसार को चमकाते हो, उसी के द्वारा हमारा अन्नाभाव, यज्ञहीनता, रोगसमूह एवं बुरे स्वप्न नष्ट
करो. (४)
विश्वस्य हि प्रेषितो रक्षसि व्रतमहेळयन्नुच्चरसि स्वधा अनु.
यदद्य त्वा सूर्योपब्रवामहै तं नो देवा अनु मसीरत क्रतुम्.. (५)
हे प्रेरित सूर्य देव! तुम क्रोध न करते हुए सभी यजमानों के यज्ञों की रक्षा करते हो एवं
प्रातःकाल के यज्ञ के बाद उदित होते हो. आज जब हम तुम्हारा नाम लें, तभी देव हमारे यज्ञ
को स्वीकार करें. (५)
तं नो द्यावापृथिवी तन्न आप इन्द्रः शृण्वन्तु मरुतो हवं वचः.
मा शूने भूम सूर्यस्य सन्दृशि भद्रं जीवन्तो जरणामशीमहि.. (६)
द्यावा-पृथिवी, इंद्र, जल एवं मरुत् हमारा आह्वान एवं स्तुतिवचन सुनें. हम सूर्य की
कृपादृष्टि पाकर दुःख प्राप्त न करें, अपितु चिरकाल तक प्राण धारण करते हुए कल्याण एवं
यौवन का भोग करें. (६)
विश्वाहा त्वा सुमनसः सुचक्षसः प्रजावन्तो अनमीवा अनागसः.
उद्यन्तं त्वा मित्रमहो दिवेदिवे ज्योग्जीवाः प्रति पश्येम सूर्य.. (७)
हे सूर्य देव! हम प्रसन्नमन, सुदर्शन, संतानयुक्त, रोगरहित एवं निष्पाप होकर सदा
तुम्हारा यज्ञ करें. हे मित्रों का आदर करने वाले सूर्य! हम चिरंजीवी बनकर तुम्हें प्रतिदिन
उदित होता हुआ देखें. (७)
महि ज्योतिर्बिभ्रतं त्वा विचक्षण भास्वन्तं चक्षुषेचक्षुषे मयः.
आरोहन्तं बृहतः पाजसस्परि वयं जीवाः प्रति पश्येम सूर्य.. (८)
हे विशेष दृष्टि वाले सूर्य! हम चिरंजीवी बनकर प्रतिदिन तुम्हारा दर्शन करें. तुम महान्
ज्योति धारण करने वाले, दीप्तिशाली, सब देखने वालों की आंखों के लिए सुखकर एवं
महान् सागर के ऊपर आरोहण करते हो. (८)
यस्य ते विश्वा भुवनानि केतुना प्र चेरते नि च विशन्ते अक्तुभिः.
अनागास्त्वेन हरिकेश सूर्याह्नाह्ना नो वस्यसावस्यसोदिहि.. (९)
हे हरे बालों वाले सूर्य! तुम्हारी जिस पहचान के कारण सभी प्राणी विशेष रूप से गति
करते हैं और रात के समय विश्राम करते हैं, तुम अपनी पहचान को लेकर प्रतिदिन उगो एवं
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हम तुम्हें देखें. (९)
शं नो भव चक्षसा शं नो अह्ना शं भानुना शं हिमा शं घृणेन.
यथा शमध्वञ्छमसद् दुरोणे तत्सूर्य द्रविणं धेहि चित्रम्.. (१०)
हे सूर्य! तुम अपने तेज, दिवस, किरण, शीतलता एवं उष्णता के द्वारा हमारे लिए
कल्याणकारी बनो. हम चाहे मार्ग में हों या अपने घर में, तुम हमें यह विचित्र संपत्ति दो. (१०)
अस्माकं देवा उभयाय जन्मने शर्म यच्छत द्विपदे चतुष्पदे.
अदत्पिबदूर्जयमानमाशितं तदस्मे शं योररपो दधातन.. (११)
हे देवो! तुम हमारे द्विपद और चतुष्पद दोनों प्रकार के प्राणियों को सुख दो. सब प्राणी
खाते-पीते एवं शक्तिशाली बनें. तुम प्राणियों को सुख एवं पापहीनता प्रदान करो. (११)
यद्वो देवाश्चकृम जिह्वया गुरु मनसो वा प्रयुती देवहेळनम्.
अरावा यो नो अभि दुच्छुनायते तस्मिन्तदेनो वसवो नि धेतन.. (१२)
हे निवासस्थान देने वाले देवो! हमने वचन अथवा मन के प्रयोग से तुम्हारा जो अपमान
किया है, उस पाप को तुम उस पर डालो जो हम पर आक्रमण करके हमारे प्रति पाप का
आचरण करता है. (१२)
सूक्त—३८ देवता—इंद्र
अस्मिन्न इन्द्र पृत्सुतौ यशस्वति शिमीवति क्रन्दसि प्राव सातये.
यत्र गोषाता धृषितेषु खादिषु विष्वक्पतन्ति दिद्यवो नृषाह्ये.. (१)
हे इंद्र! तुम यश देने वाले व परस्पर प्रहारों से युक्त युद्ध में सिंहनाद करते हो एवं धन
पाने के लिए हमारी रक्षा करते हो. गायों का लाभ कराने वाले एवं मानवों को पराजित करने
वाले युद्ध में योद्धा एक-दूसरे को नष्ट करते हैं एवं दीप्त आयुध चारों ओर गिरते हैं. (१)
स नः क्षुमन्तं सदने व्यूर्णुहि गोअर्णसं रयिमिन्द्र श्रवाय्यम्.
स्याम ते जयतः शक्र मेदिनो यथा वयमुशमसि तद्वसो कृधि.. (२)
हे प्रसिद्ध इंद्र! तुम हमारे घर में इतनी प्रशंसनीय संपत्ति भर दो कि गाएं सागर के जल
के समान पर्याप्त मात्रा में हों. हे शक्र! हम तुम्हारी विजय पर शक्तिशाली बनें. हे वासदाता
इंद्र! हम जो कामना करें, उसे पूरा करो. (२)
यो नो दास आर्यो वा पुरुष्टुतादेव इन्द्र युधये चिकेतति.
अस्माभिषे सुसहाः सन्तु शत्रवस्त्वया वयं तान्वनुयाम सङ्गमे.. (३)
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हे बहुतों द्वारा प्रशंसित इंद्र! जो दास, आर्य अथवा राक्षस हमारे साथ युद्ध करना चाहते
हैं. वे सब शत्रु तुम्हारी कृपा से हमारे द्वारा सरलता से हार जावें. हम तुम्हारी कृपा से उन्हें
युद्ध में मार डालें. (३)
यो दभ्रेभिर्हव्यो यश्च भूरिभिर्यो अभीके वरिवोविन्नृषाह्ये.
तं विखादे सस्निमद्य श्रुतं नरमर्वाञ्चमिन्द्रमवसे करामहे.. (४)
जो इंद्र मानव संहारक युद्ध में धन प्राप्त करते हैं, वे चाहे थोड़े मनुष्यों द्वारा पुकारे जावें
अथवा बहुतों द्वारा उन पर शुद्ध, सर्वत्र प्रसिद्ध एवं यज्ञ के नेता इंद्र को आज हम अपने
अनुकूल बनाते हैं. (४)
स्ववृजं हि त्वामहमिन्द्र शुश्रवानानुदं वृषभ रध्रचोदनम्.
प्र मुञ्चस्व परि कुत्सादिहा गहि किमु त्वावान्मुष्कयोर्बद्ध आसते.. (५)
हे अभिलाषापूरक इंद्र! हमने सुना है कि तुम स्वयं अपने बंधन काटने वाले, आशातीत
बल देने वाले एवं अपने भक्त के प्रेरक हो. तुम यहां आओ और कुत्स के बंधन से स्वयं को
बनते हो. लोग तुम्हें अंधे और दुर्बलों का ही नहीं, यज्ञ का वैद्य भी कहते हैं. (३)
युवं च्यवानं सनयं यथा रथं पुनर्युवानं चरथाय तक्षथुः.
निष्टौग्र्यमूहथुरद्भ्यस्परि विश्वेत्ता वां सवनेषु प्रवाच्या.. (४)
हे अश्विनीकुमारो! जिस प्रकार बढ़ई पुराने रथ को नया बनाकर चलने योग्य कर देता
है, उसी प्रकार तुमने वृद्ध च्यवन ऋषि को जवान बनाकर चलने-फिरने लायक कर दिया था.
तुमने तुग्र के पुत्र भुज्यु को जल के ऊपर तैराकर किनारे पर लगा दिया था. तुम्हारे वे कार्य
यज्ञ के समय विशेषरूप से वर्णन करने योग्य हैं. (४)
पुराणा वां वीर्या३ प्र ब्रवा जनेऽथो हासथुर्भिषजा मयोभुवा.
ता वां नु नव्याववसे करामहेऽयं नासत्या श्रदरिर्यथा दधत्.. (५)
हे अश्विनीकुमारो! मैं लोगों के सामने तुम्हारे सभी पुराने वीर कर्मों का वर्णन करती हूं.
तुम दोनों सुख देने वाले वैद्य हो. मैं तुमसे रक्षा पाने के लिए तुम्हारी स्तुति करती हूं. मेरी
स्तुति पर यजमान श्रद्धा करते हैं. (५)
इयं वामह्वे शृणुतं मे अश्विना पुत्रायेव पितरा मह्यं शिक्षतम्.
अनापिरज्ञा असजात्यामतिः पुरा तस्या अभिशस्तेरव स्पृतम्.. (६)
हे अश्विनीकुमारो! मैं तुम्हें बुलाता हूं. तुम मेरी पुकार सुनो. जिस प्रकार पिता पुत्र को
सीख देता है, उसी प्रकार तुम मुझे सिखाओ. मैं बंधुरहित, ज्ञानशून्य जातिरहित एवं बुद्धिहीन
हूं. तुम दुर्गति से पहले ही मेरी रक्षा करो. (६)
युवं रथेन विमदाय शुन्ध्युवं न्यूहथुः पुरुमित्रस्य योषणाम्.
युवं हवं वध्रिमत्या अगच्छतं युवं सुषुतिं चक्रथुः पुरन्धये.. (७)
हे अश्विनीकुमारो! तुम पुरुमित्र की कन्या शुंध्युव को विमद के साथ विवाह करने के
लिए रथ द्वारा ले गए थे. तुम वध्रिमती द्वारा बुलाए जाने पर आए थे एवं तुमने उस बुद्धिमती
के लिए शोभन ऐश्वर्य दिया था. (७)
युवं विप्रस्य जरणामुपेयुषः पुनः कलेरकृणुतं युवद्वयः.
युवं वन्दनमृश्यदादुदूपथुर्युवं सद्यो विश्पलामेतवे कृथः.. (८)
हे अश्विनीकुमारो! तुमने बुढ़ापे को प्राप्त एवं मेधावी कलि ऋषि को दुबारा जवान बना
दिया था. तुमने वंदन नामक ऋषि को कुएं से निकाला था एवं लंगड़ी विश्पला को लोहे का
पैर लगाकर चलने योग्य बना दिया था. (८)
युवं ह रेभं वृषणा गुहा हितमुदैरयतं ममृवांसमश्विना.
युवमृबीसमुत तप्तमत्रय ओमन्वन्तं चक्रथुः सप्तवध्रये.. (९)
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