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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 1617 of 1855

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Page 1617

अद्वेषो अद्य बर्हिषः स्तरीमणि ग्राव्णां योगे मन्मनः साध ईमहे.
आदित्यानां शर्मणि स्था भुरण्यसि स्वस्त्य१ग्निं समिधानमीमहे.. (९)
आज यज्ञ में कुश बिछाए जा चुके हैं एवं सोमरस निचोड़ने का एक पत्थर दूसरे पर रख
दिया गया है. इस समय मेरा मन अभिलषित वस्तु पाने के लिए द्वेषरहित देवों की शरण
जाता है. हम प्रज्वलित अग्नि से कल्याण की याचना करते हैं. (९)
आ नो बर्हिः सधमादे बृहद्दिवि देवाँ ईळे सादया सप्त होतॄन्.
इन्द्रं मित्रं वरुणं सातये भगं स्वस्त्य१ग्निं समिधानमीमहे.. (१०)
हे अग्नि! हमारे विस्तृत एवं दीप्त यश में तुम सात होताओं व इंद्र, मित्र, वरुण, भग
आदि देवों को भली प्रकार बुलाओ. हम धनप्राप्ति के लिए देवों की स्तुति करेंगे. हम
प्रज्वलित अग्नि से कल्याण की याचना करते हैं. (१०)
त आदित्या आ गता सर्वतातये वृधे नो यज्ञमवता सजोषसः.
बृहस्पतिं पूषणमश्विना भगं स्वस्त्य१ग्निं समिधानमीमहे.. (११)
हे प्रसिद्ध आदित्यो! तुम हमारे यज्ञ के लिए आओ एवं हमारे कल्याण के लिए संयत
होकर यज्ञ में बैठो. हम बृहस्पति, पूषा, अश्विनीकुमारों, भग एवं प्रज्वलित अग्नि से कल्याण
की याचना करते हैं. (११)
तन्नो देवा यच्छत सुप्रवाचनं छर्दिरदित्याः सुभरं नृपाय्यम्.
पश्वे तोकाय तनयाय जीवसे स्वस्त्य१ग्निं समिधानमीमहे.. (१२)
हे आदित्य देवो! तुम अपना यज्ञ पूर्ण करो एवं हमें मानवों की रक्षा करने वाला
मनपसंद घर दो. हम प्रज्वलित अग्नि से अपने पशुओं, संतान एवं जीवन के विषय में
कल्याण की याचना करते हैं. (१२)
विश्वे अद्य मरुतो विश्व ऊती विश्वे भवन्त्वग्नयः समिद्धाः.
विश्वे नो देवा अवसा गमन्तु विश्वमस्तु द्रविणं वाजो अस्मे.. (१३)
आज सभी मरुत् सब प्रकार से हमारी रक्षा करें एवं सभी अग्नियां प्रज्वलित हों. सभी
देव हमारी रक्षा के लिए आवें तथा सब प्रकार के अन्न व संपत्ति हमें प्राप्त हों. (१३)
यं देवासोऽवथ वाजसातौ यं त्रायध्वे यं पिपृथात्यंहः.
यो वो गोपीथे न भयस्य वेद ते स्याम देववीतये तुरासः.. (१४)
हे देवो! हम यज्ञ के ऐसे आतुर व्यक्ति बनें, जिसकी तुम युद्ध में रक्षा करते हो, जिनका
त्राण करते हो एवं जिन्हें पापरहित करके उनकी अभिलाषा पूर्ण करते हो एवं जो तुम्हारा
सहारा पाकर भय को जानते भी नहीं. (१४)
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