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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 1615 of 1855

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Page 1615

अभाव में शीत से व्याकुल होकर आग के पास सोता है. (११)
यो वः सेनानीर्महतो गणस्य राजा व्रातस्य प्रथमो बभूव.
तस्मै कृणोमि न धना रुणध्मि दशां प्राचीस्तदृतं वदामि.. (१२)
हे पासो! तुम्हारे समूह का जो सेनापति राजा एवं प्रमुख है, मैं उसके लिए नमस्कार
करता हूं. मैं दसों उंगलियों से हाथ जोड़कर सत्य कहता हूं कि भविष्य में मैं जुए से धन नहीं
कमाऊंगा. (१२)
अक्षैर्मा दीव्यः कृषिमित्कृषस्व वित्ते रमस्व बहु मन्यमानः.
तत्र गावः कितव तत्र जाया तन्मे वि चष्टे सवितायमर्यः.. (१३)
हे जुआरी! मेरी बात को महत्त्वपूर्ण समझकर तुम पासों से मत खेलो. खेती से जो धन
मिले, उसीको बहुत मानकर प्रसन्न रहो. खेती से बहुत सी गाएं एवं पत्नी प्राप्त होगी, सविता
स्वामी ने मुझसे ऐसा कहा है. (१३)
मित्रं कृणुध्वं खलु मृळता नो मा नो घोरेण चरताभि धृष्णु.
नि वो नु मन्युर्विशतामरातिर्न्यो बभ्रूणां प्रसितौ न्वस्तु.. (१४)
हे पासो! हमें अपना मित्र बना लो एवं हमें सुखी करो. तुम हमारे ऊपर अपने भयंकर
तथा असह्य प्रभाव का प्रयोग मत करो. तुम्हारा क्रोध हमारे शत्रुओं में प्रवेश करे. शत्रु तुम
पीले रंग वाले पासों के बंधन में शीघ्र आ जावें. (१४)
सूक्त—३५ देवता—विश्वेदेव
अबुध्रमु त्य इन्द्रवन्तो अग्नयो ज्योतिर्भरन्त उषसो व्युष्टिषु.
मही द्यावापृथिवी चेततामपोऽद्या देवानाभव आ वृणीमहे.. (१)
इंद्र से संबंधित अग्नियां उषाओं द्वारा अंधकारनाश के समय तेज धारण करते हुए जाग
गई हैं. विस्तृत द्यावा एवं पृथिवी भी चेतनायुक्त हों. आज मैं देवों की रक्षा का वरण करता हूं.
(१)
दिवस्पृथिव्योरव आ वृणीमहे मातृन्सिन्धून्पर्वताञ्छर्यणावतः.
अनागास्त्वं सूर्यमुषासमीमहे भद्रं सोमः सुवानो अद्या कृणोतु नः.. (२)
हम द्यावा-पृथिवी से अपनी रक्षा की प्रार्थना करते हैं. मैं माता तुल्य नदियों एवं कुरुक्षेत्र
में स्थित पर्वतों से भी रक्षा की याचना करता हूं. हे सूर्य एवं उषा! मैं तुम दोनों से प्रार्थना
करता हूं कि मुझे पापरहित रखो. जाने जाते हुए सोम आज हमारा मंगल करें. (२)
द्यावा नो अद्य पृथिवी अनागसो मही त्रायेतां सुविताय मातरा.
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